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संस्कृत सूची|संस्कृत साहित्य|पुस्तकं|धर्मसिंधु|तृतीयः परिच्छेदः : उत्तरार्ध ३|
अत्रायंविशेषः

धर्मसिंधु - अत्रायंविशेषः

हिंदूंचे ऐहिक, धार्मिक, नैतिक अशा विषयात नियंत्रण करावे आणि त्यांना इह-परलोकी सुखाची प्राप्ती व्हावी ह्याच अत्यंत उदात्त हेतूने प्रेरित होउन श्री. काशीनाथशास्त्री उपाध्याय यांनी ’धर्मसिंधु’ हा ग्रंथ रचला आहे.

This 'Dharmasindhu' grantha was written by Pt. Kashinathashastree Upadhyay, in the year 1790-91.


अत्रायंविशेषः

अत्रायंविशेषः नक्षत्रान्तरेमृतस्यपञ्चकेदाहप्राप्तौपुत्तलाविधिरेवनशान्तिकम्

पञ्चकमृतस्याश्विन्यांदाहप्राप्तौशान्तिकमेवनपुत्तलविधिः शान्तिश्वलक्षहोमरुद्रजपान्यतररुपायथावि भवंकार्या

अथवाकुम्भेयमप्रतिमांसंपूज्यस्वगृह्योक्तविधिनाग्निप्रतिष्ठापनान्वाधानादिचरुश्रपणान्तंकृत्वाज्यभागान्तेनामभिश्चतुर्दशचर्वाहुतीर्जुहुयात्

यमायस्वाहा १ धर्मराजाय २ मृत्यवे ३ अन्तकाय ४ वैवस्वताय ५ कालाय ६ सर्वभूतक्षयाय ७ औदुम्बराय

८ दध्नाय ९ नीलाय १० परमेष्ठिने ११ वृकोदराय १२ चित्नाय १३ चित्नगुप्ताय १४

एवंहुत्वाहोमशेषंसमाप्य कृष्णांगांकृष्णवस्त्रांचहेमनिष्कसमन्विताम् । दद्याद्विप्रायशान्ताययमोमेप्रीयतामिति ॥

त्रिपादृक्षेप्येतदेवशान्तिकं यदिभद्रातिथीनांस्याद्भानुभौमशनैश्चरैः ।

त्निपादृक्षैश्चसंयोगस्तदांयोगस्त्रिपुष्करः १ द्विपुष्करोद्वयोर्योगेथवायंस्याद्द्विपादभैः ।

त्निपादनक्षत्नाणितु पुनर्वसूत्तराषाढाकृत्तिकोत्तरफाल्गुनी ।

पूर्वभाद्राविशाखाचज्ञेयमेतत्रिपादभम् १ मृगाचित्नाधनिष्ठाचज्ञेयमेतद्विपादभम् ।

त्रिपुष्करयोगेद्विपुष्करयोगेचमृतौकृच्छ्रत्नयंप्रायश्चित्तंकृत्वायवपिष्टमयपुरुषत्रयेणसहप्रेतदाहः

पुरुषत्रयस्यप्रेतेन्यासआज्याहुतयश्चपूर्ववत् कनकहीरकनीलपद्मरागमौक्तिकेतिपञ्चरत्नस्यमुखेप्रक्षेपोपि रत्नाभावेकर्षार्धस्वर्णम्

स्वर्णाभावेघृतम् एवंपूर्वत्नापि दहनेमरणेत्निद्विपुष्करेत्निगुणंफलम् ।

द्विगुणंखननेप्येवमेतद्दोषोपशान्तये १ सुवर्णदक्षिणांदद्यात्कृष्णवस्त्रमथापिवा । शान्तिंकुर्यात्सूतकान्तेपूर्वोक्तांतेनमङ्गलम् ॥

त्रिपादृक्षेप्येतदेवशान्तिकं यदिभद्रातिथीनांस्याद्भानुभौमशनैश्चरैः ।

त्निपादृक्षैश्चसंयोगस्तदांयोगस्त्रिपुष्करः १ द्विपुष्करोद्वयोर्योगेथवायंस्याद्द्विपादभैः ।

त्निपादनक्षत्नाणितु पुनर्वसूत्तराषाढाकृत्तिकोत्तरफाल्गुनी ।

पूर्वभाद्राविशाखाचज्ञेयमेतत्रिपादभम् १ मृगाचित्नाधनिष्ठाचज्ञेयमेतद्विपादभम् ।

त्रिपुष्करयोगेद्विपुष्करयोगेचमृतौकृच्छ्रत्नयंप्रायश्चित्तंकृत्वायवपिष्टमयपुरुषत्रयेणसहप्रेतदाहः

पुरुषत्रयस्यप्रेतेन्यासआज्याहुतयश्चपूर्ववत् कनकहीरकनीलपद्मरागमौक्तिकेतिपञ्चरत्नस्यमुखेप्रक्षेपोपि

रत्नाभावेकर्षार्धस्वर्णम् स्वर्णाभावेघृतम् एवंपूर्वत्नापि दहनेमरणेत्निद्विपुष्करेत्निगुणंफलम् ।

द्विगुणंखननेप्येवमेतद्दोषोपशान्तये १ सुवर्णदक्षिणांदद्यात्कृष्णवस्त्रमथापिवा ।

शान्तिंकुर्यात्सूतकान्तेपूर्वोक्तांतेनमङ्गलम् ॥

मृतस्यस्मशानेनयनोत्तरंपुनर्जीवनेसतियस्यगृहेसप्रविशतितस्यमरणम्

तत्नसक्षीरघृताक्तौदम्बरसमिधांसावित्र्यष्टसहस्त्रेणहोमः अन्तेकपिलादानंतिलपूर्णकांस्यपात्नदानंच

एकाशीतिपलंकांस्यंतदर्धवातदर्धकम् । नवषटत्निपलंवापिदद्याद्विप्रायशक्तितः ॥

Translation - भाषांतर
N/A

References : N/A
Last Updated : 2009-03-05T04:41:10.3200000

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माधव IV.

  • n. एक राजा, जो तालध्वज नगर के विक्रम राजा का पुत्र था । इसकी चमत्कृतिपूर्ण जीवनकथा पद्म में प्राप्त है । यह चन्द्रकला नामक क्षत्रिय स्त्री को अत्यधिक चाहता था, किंतु वह इससे विवाह न करना चाहती थी । अतएव उसने माधव से कहा, ‘सुलोचना नामक एक सुंदर राजकन्या की जानकारी मै तुम्हे बताती हूँ, जो मुझसे कही अधिक सुंदर, तथा तुम्हारी जीवनसंगिनी बनने योग्य है । 
  • प्लक्षद्वीप में n. चंद्रकला के कथनानुसार, माधव अपने दिव्य अश्व की सहायता से समुद्र को लॉंघ कर प्लक्ष द्वीप गया, जहॉं सुलोचना रहती था । वहॉं जाकर इसे पता चला कि, उसकी शादी एक ‘विद्याधर’ से होने वाली है । अतएव इसने तुरन्त ही सुलोचना को एक प्रेमपत्र भेजा, एवं अपनी जानकारी बताते हुए उससे शादी की इच्छा व्यक्त की । सुलोचना ने पत्रोत्तर देकर इसे आश्वासन दिया कि, विवाह मण्डप में विद्याधर का वरण न कर के, वह इसका ही वरण करेगी । दूसरे दिन पाणिग्रहण के समय विवाहमण्डप में इसे नींद आ गयी । यह देखकर इसके प्रचेष्ट नामक सेवक ने सुलोचना का हरण किया, तथा यह सोता ही रहा । सुलोचना ने माधव से शादी करने का प्रण किया था । अतएव वह प्रचेष्ट के यहॉं से भाग कर, सुषेण नामक राज के यहॉं वीरवर नामक पुरुष का वेष धारण कर के नौकरी करने लगी । एक दिन वहॉं उसने एक गेंडा मारा, जो पूर्वज्न्म में धर्मबुद्धि नामक राजा था (धर्मबुद्धि देखिये) । 
  • सुलोचना से विवाह n. सुलोचना के वियोग में पीडित होकर, एक दिन विद्याधर एवं प्रचेष्ट गंगा में प्राण देने के लिए जा रहे थे । किंतु वे दोनो सुलोचना के द्वारा बचा लिए गये । बाद में सुलोचना को ढूँढते ढूँढते एकाएक वहॉं माधव भी आ पहुँचा, जो सुलोचना से निराश होकर गंगा के तट पर आत्महत्या के लिए आया था । सुलोचना को देखकर, इसने अपनी सारी कथा उसे कह सुनायी, एवं उसके साथ विवाह किया । आगे चल कर यही माधव प्रख्यात विष्णु-भक्त बना [पद्म.क्रि.५.६] 
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