मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष व्रत - गौरीतपव्रत

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


गौरीतपव्रत

( अङ्गिरा ) -

यह व्रत मार्गशीर्षकी अमावास्यासे आरम्भ किया जाता है । उस दिन प्रातःस्त्रान करके हाथमें गन्ध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा और जल लेकर

' ईशार्द्धाङहरे देवि करिष्येऽहं व्रतं तव । पतिपुत्रसुखावाप्तिं देहि देवि नमोऽस्तु ते ॥'

से संकल्प करके मध्याह्नमें सूर्यनारायणको अर्घ्य देकर

' अहं देवि व्रतमिदं कर्तुमिच्छामि शाश्वतम् । तवाज्ञया महादेवि निर्विघ्रं कुरु तत्र वै ॥'

से प्रार्थना करे । पीछे अपने निवासस्थानमें जाकर गौरीका पूजन और उपवास करे । पूजनमें आवाहनादि छः उपचारोंके पीछे -

१ पार्वत्यै नमः ( पादौ ), २ हैमवत्यै ( जानुनी ), ३ अम्बिकायै ( जङ्घे ), ४ गिरिशवल्लभायै ( गुह्यम् ), ५ गम्भीरनाभ्यै ( नाभिम् ), ६ अपर्णायै ( उदरम् ), ७ महादेव्यै ( हदयम् ), ८ कण्ठकामिन्यै ( कण्ठम् ), ९ षण्मुखायै ( मुखम् ), १० लोकमोहिन्यै ( ललाटम् ) , ११ मेनकाकुक्षिरत्नायै ( शिरः पूजयामि ) -

इस प्रकार अङ्गपूजा करनेके अनन्तर गन्ध - पुष्पादि शेष दस उपचारोंसे पूजन करे और गौरीके दक्षिण भागमें गणेशजीका और वामभागमें स्कन्द ( स्वामिकार्तिकेय ) का पूजन करे । तत्पश्चात् ताँबे अथवा मिट्टीके दीपकको गौके घीसे पूर्ण करके उसमें आठ बत्ती जलाये और ( सूर्योदय होनेतक ) रात्रिभर प्रज्वलित रखे । फिर ब्राह्म - मुहूर्त ( प्रतिपदाके प्रभात ) में स्त्रानादि करनेके अनन्तर द्विजदम्पती ( ब्राह्मण - ब्राह्मणी ) का पूजन करके तीन धातुओं ( ताँबे, पीतल और शीशे ) के बने हुए पात्रमें गुड़, पक्कान्न ( हलुआ - पूरी - पूआ ) तिल - तण्डुल और सौभाग्यद्रव्य रखकर उनपर उपर्युक्त दीपक रखे और जबतक बक - काकादि पक्षीगण अपना कलरव करते हुए उसको ग्रहण न करें तबतक वहीं बैठी रहे । यदि उठ खड़ी हो तो उससे सौभाग्यकी हानि तीसरेमें द्वितीयासे - इस क्रमसे चौथे - पाँचवें आदि वर्षोंमें तृतीया - चतुर्थी आदि तिथियोंको व्रत करके सोलहवें वर्षके मार्गशीर्षकी पूर्णिमाको आठ द्विजदम्पती बुलवाकर मध्याह्नके समय अक्षतोंके अष्टदलपर ( सुपूजित गौरीके समीप ) सोम और शिवका पूजन करे और नैवेद्यमें सुहाली, कसार, पूआ, पूरी, खीर, घी, शर्करा और मोदक - इन आठ पदार्थोंका भोग भरकर उपर्युक्त आठ दम्पती ( जोड़ा - जोड़ी ) को भोजन करवाकर वस्त्रालङ्कारादिसे भूषितकर एक - एक करके आठों कटोरदान दान करे । यह व्रत स्त्रियोंके करनेका है - इससे सभी स्त्रियोंको सुतादिकी प्राप्ति हो सकती है और उनके सम्पूर्ण अभीष्ट सिद्ध हो सकते है ।

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Last Updated : January 22, 2009

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