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चैत्र कृष्णपक्ष व्रत - आरंभ

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


आरंभ

आरम्भका निवेदन -

प्रत्येक प्रयोजनके सभी व्रत मास, पक्ष और तिथि - वारादिके सहयोगसे सम्पन्न होते हैं । मास चार प्रकारके माने गये हैं । वे सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र नामोंसे प्रसिद्ध हैं । उनमें सूर्यसंक्रान्तिके आरम्भसे उसकी समाप्तिपर्यन्तका ' सौर ', सूर्योदयसे सूर्योदय - पर्यन्तके एक दिन - जैसे ३० दिनका ' सावन', शुक्ल और कृष्णपक्षका ' चान्द्र ' और अश्विनीके आरम्भसे रेवतीके अन्तनकके चन्द्रभोगका ' नाक्षत्र ' मास होता है । ये सब प्रयोजनके अनुसार पृथक् - पृथक् लिये जाते हैं - यथा विवाहादिमें ' सौर ', यज्ञादिमें ' सावन ', श्राद्ध आदिमें ' चान्द्र ' और नक्षत्रसत्र ( नक्षत्र - सम्बन्धी यज्ञ, यथा श्लेषा - मूलदिजन्मशान्ति ) में ' नाक्षत्र ' लिया जाता है । ........ मास - गणनामें वैशाख आदिकी अपेक्षा सर्वप्रथम चैत्र क्यों लिया गया ? इसका कारण यह है कि सृष्टिके आरम्भ ( अथवा ज्योतिर्गणनाके प्रारम्भ ) में चन्द्रमा चित्रापर था - ( और चित्रा चैत्रीको प्रायः होती ही है; ) इस कारण अन्य महीनोंकी अपेक्षा चैत्र पहला महीना माना गया है और इसके पीछे वैशाख आदि आते है । इस सम्बन्धमे यह भी ज्ञातव्य है कि जिस प्रकार चैत्रीको चित्रा होना सम्भव माना गया है, उसी प्रकार वैशाखीको विशाखा, ज्येष्ठीको ज्येष्ठा, आषाढ़ीको पूर्वाषाढ़ा, श्रावणीको श्रवण, भाद्रीको पूर्वा - भाद्रपद, आश्विनीको अश्विनी, कार्तिकीको कृत्तिका, मार्गशीर्षीको मृगशिरा, पौषीको पुष्य, माघीको मघा और फाल्गुनीको पूर्वाफाल्गुनी होना भी सम्भव सुचित किया गया है । ..........प्रत्येक मासके शुक्ल और कृष्ण दो पक्ष हैं । इनका उपयोग लोकव्यवहारमें दक्षिण प्रान्तमें शुक्ल और कृष्ण और अन्य प्रान्तोंमे कृष्ण और शुक्लके क्रमसे करते है । वास्तवमें वह व्रतोत्सवादिमे शुक्लसे और तिथिकृत्यादिमे कृष्णसे प्रारम्भ किया जाता है । .........

१. मस्यन्ते परिमीयन्ते चन्द्रवृद्धिक्षयादिना । ( मदनरत्न )

२. अर्कसंक्रान्त्यवधिः सौरः ।

३. त्रिंशाद्दिनः सावनः ।

४. पक्षयुक्तश्चानद्रः । ( माधवीय )

५. सर्वर्क्षपरिवर्तैंस्तु नाक्षत्रो मास उच्यते । ( विष्णु )

६. सौरो मासो विवाहादौ ।

७. यज्ञादौ सावनः स्मृतः ।

८. आब्दिके पितृकार्ये च चान्द्रो मासः प्रशस्यते । ( गर्ग )

९. नक्षत्रसत्राणयन्यानि नाक्षत्रे च प्रशस्यते । ( विष्णु )

१०. ' चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि । ( बृहन्नारदीप )

११. व्रतोत्सवे च शुक्लादि ।

१२. कृष्णादि तिथिकर्मणि । ( ब्रह्म )

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2009-01-16T00:36:56.8730000

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