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संस्कृत सूची|संस्कृत साहित्य|पुस्तकं|धर्मसिंधु|तृतीय परिच्छेद : पूर्वार्ध ४|
हन्त्यर्थहिनाकर्ता

धर्मसिंधु - हन्त्यर्थहिनाकर्ता

हिंदूंचे ऐहिक, धार्मिक, नैतिक अशा विषयात नियंत्रण करावे आणि त्यांना इह-परलोकी सुखाची प्राप्ती व्हावी ह्याच अत्यंत उदात्त हेतूने प्रेरित होउन श्री. काशीनाथशास्त्री उपाध्याय यांनी ’धर्मसिंधु’ हा ग्रंथ रचला आहे.

This 'Dharmasindhu' grantha was written by Pt. Kashinathashastree Upadhyay, in the year 1790-91.


हन्त्यर्थहिनाकर्ता

हन्त्यर्थहिनाकर्तारं मंत्रहीनातुऋत्विजम् । स्त्रियंलक्षणहीनातुनप्रतिष्ठासमोरिपुः १ ब्रह्मातुब्राह्मणैःस्थाप्योगायत्रीसहितःप्रभुः ।

सर्ववर्णैस्तथाविष्णुः प्रतिष्ठाप्यःसुखार्थिभि २ मातृभैरवाद्याःसर्वैः शिवलिङ्गंयतिनापि

पुराणप्रसिद्धजीर्णलिङ्गंस्त्रीशूद्रैरपिपूज्यम् नूतनस्थापितंलिङ्गंस्त्रीशूद्रोवापिनस्पृशेत ।

शिवादिप्रतिष्ठायास्त्रीशूद्रादेनाधिकारःशूद्रोवाऽनुपनीतोवास्त्रियोवापतितोपिवा ।

केशववाशिवंवापिस्पृष्ट्वानरकमश्नुते १ स्थिरप्रतिमाःप्राङ्मुखीरुदङमुखोयजेत् चलप्रतिमासुप्राङ्‌मुखः

सौवर्नीराजतीताम्रीमृन्मयीप्रतिमाभवेत् । पाषाणधातुमुक्तावाकांस्यपित्तलयोरपि १

अङ्गुष्ठपर्वमानात्सावितास्तिंयावदेवतु । श्रीमद्भागवतेशैलीदारुमयीलोहीलेप्यालेयाचसैकती ।

मनोमयीमणिमयीप्रतिमाऽष्टविधास्मृता १

लौहीसौवर्णी दारुमधूकवृक्षस्यैवसप्ताङ्गुलाधिकाद्वादशाङ्गुलपर्यन्ताग्रुहेप्रतिमेतिदेवीपुराणे

अर्चकस्यतपोयोगादर्चनस्यातिशायनात् । आभ्रूप्याचाबिम्बानांदेवःसान्निध्यमृच्छति १

प्रतिमापट्टयंत्राणांनित्यंस्नानंनकारयेत । कारयेत्पर्वदिवसेयदाचसलधारणम् २ पार्थिवलिङ्गपूजादिविचाराद्वितीयपरिच्छेदेउक्तः ॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2008-06-24T21:24:32.9830000

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आग्रेय (अगलस्सी, अगिरि, अगेसिनेई) (गणराज्य)

  • n. (सिकंदर आक्रमणकालीन - उत्तर पश्चिम भारतीय लोकसमूह एवं गणराज्य)
    दक्षिण पंजाब का एक जनपद, जो शिबि जनपद के पूर्व भाग में स्थित था । यह देश आधुनिक झंग - मघियाना प्रदेश में बसा हुआ था । अपने देश वापस जाते समय शिबि जनपद के पश्चात् सिकंदर ने इन लोगों के साथ युद्ध किया था । इस आग्रेय गण का प्रवर्तक अग्रसेन था, एवं इनकी प्रधान नगरी का नाम ही अग्रोदक था, जो सतलज नदी के पूर्वदक्षिण में बसी हुई थी । सिकंदर के समय यह गण अत्यंत शक्तिशाली था, एवं ग्रीक लेखको के अनुसार इनकी जिस सेना ने सिकंदर के साथ युद्ध किया था, उसमें चालिस हजार पदाति, एवं तीन हजार अश्वारोंही सैनिक थे । इन लोगों को जीत कर सिकंदर ने मालव गण के लोगों को जीता था, जिससे प्रतीत होता है कि, ये दोनों गण एक दूसरे के पडोस में थे । महाभारत के कर्णदिग्विजय में भी इन दोनों गणों का एकत्र निर्देश प्राप्त है [म. व. परि. १.२४.६७]
     
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