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प्रथमः सर्गः - गीतम् २

गीतगोविन्दम् - प्रथमः सर्गः - गीतम् २

गीतगोविन्दम्

प्रथमः सर्गः - गीतम् २

श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए । कलितललितवनमाल जय जयदेव हरे ॥१॥

दिनमणीमण्दलमण्डन भवखण्डन ए । मुनिजनमानसहंस जय जयदेव हरे ॥२॥

कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन ए । यदुकुलनलिनदिनेश जय जयदेव हरे ॥३॥

मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए । सुरकुलकेलिनिदान जय जयदेव हरे ॥४॥

अमलकमलदललोचन भवमोचन् ए । त्रिभुवनभवननिधान जय जयदेव हरे ॥५॥

जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए । समरशमितदशखण्ठ जय जयदेव हरे ॥६॥

अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए । श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जयदेव हरे ॥७॥

श्रीजयदेवकवेरिदं कुरुते मुदम् ए । मङ्गलमुज्ज्वलगीतं जय जयदेव हरे ॥८॥

पद्मापयोधरतटीपरिरम्भलग्न- काश्मीरमुद्रितमुरो मधुसूदनस्य ।

व्यक्तानुरागमिव खेलदनङ्गखेद- स्वेदाम्बुपूरमनुपूरयतु प्रियं वः ॥६॥

वसन्ते वासन्तीकुसुमसुकुमारैरवयवै- र्भ्रमन्तीं कान्तारे बहुविहितकृष्णानुसरणाम् ।

अमन्दं कन्दर्पज्वरजनितचिन्ताकुलतया वलद्बाधां राधां सरसमिदमुचे सहचरी ॥७॥॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2008-04-11T05:46:48.0700000

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बाभ्रव्य (पांचाल)

  • n. एक आचार्य, जो दक्षिण पांचाल देश के ब्रह्मदत्त राजा के दो मंत्रियों में से एक था [ह.वं.१.२०.१३] । इसका संपूर्ण नाम ‘सुबालक (गालव) बाभ्रव्य पांचाल’ था । इसे ‘बहु‌वृच’ एवं ‘आचार्य’ ये उपाधियॉं प्राप्त थी [ह.वं.१.२३.२१] । यह सर्वशास्त्रविद्‍ एवं योगशास्त्र का परम अभ्यासक था [मत्स्य.२०.२४,२१.३०] । इसने ऋग्वेद की शिक्षा तैयार कर उसका प्रचार किया । इसने वेदमंत्रों का क्रम निश्चित किया, एवं उसका प्रचार भी किया [पद्म.पा.१०];[ ह.वं.१.२४.३२];[ म.शां.३३०.३७-३८]; पांचाल ३ देखिये । ऋक् संहित के क्रमपाठ के रचना का श्रेय वैदिक ग्रंथों में भी बाभ्रव्य पांचाल को दिया गया है । पाणिनि ने भी बाभ्रव्य एवं इसके द्वारा रचित क्रम का निर्देश किया है [पा. सृ.४.१.१०६,२.६१] । ब्रह्मदत्त राजा के कंडरिक (पुंडरिक) एवं बाभ्रव्य नामक दो मंत्रियों ने समस्त वैदिक ऋचाओं को एकत्र कर उनको ऋग्वेद, सामवेद एवं यजुर्वेद इन संहिताओं में विभाजित किया । उन संहिताओं का अंतीम एकत्रीकरण एवं संस्करण ने किया । 
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