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अवधींच कैशीं जालींत कठीण ...

संत तुकाराम - अवधींच कैशीं जालींत कठीण ...

संत तुकाराम गाथेत समाविष्ट न केलेले अप्रसिद्ध अभंग.


अभंग २९२.

अवधींच कैशीं जालींत कठीण । माझा भागशीण कोण सांगे ॥१॥

येती मायबापें लोकांचीं भेटाया । तुम्ही माझी माया सांडियेली ॥२॥

बापें नारायणें धरिला अबोला । काय राग धरिला न कळे मज ॥३॥

तुका म्हणे रात्रंदिवस कटे खंती । नये तुमची चितीं कृपा कांहीं ॥४॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2008-03-21T23:08:16.6330000

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और्व II.

  • n. इसका पिता भृगुवंशीय ऊर्व, जब तप कर रहा था, तब सब देव एवं ऋषि इससे मिलने आये । तदनंतर विवाह कर से प्रजोत्पादन करने की प्रार्थना ऋषियों ने इससे की । तब इसे ऐसा लगा, ‘इन ऋषियों के मत में मेरे जैसा तपस्वी, बिना विवाह के प्रजोत्पादन करने में असमर्थ रहेगा ।’ इसलिये इसने कहा, ‘यह देखो, मैं पुत्र उत्पन्न करता हूँ किन्तु वह भयंकर होगा । ’ ऋषियों को ऐसा बताकर इसने अपनी जंघा अग्नि में डाली । तदनंतर एक दर्भ से उसका मंथन करके उस जंघ से एक पुत्र निर्माण किया । उसीका नाम और्व है [मत्स्य. १७५] । पुत्र के साथ उत्पन्न माया, ऊर्व ने हिरण्यकश्यपु को दी [पद्म. सृ. ३८];[ ब्रह्मांड. ३.१.७४-१००] । जन्मतः यह खाने के लिये मांगने लगा । तथा इसने संसार का दाह करना आरंभ कर दिया । इस प्रकार तीन दाह करने के बाद ब्रह्मदेव ने स्वयं आकर इससे प्रार्थना की । जहॉं मैं स्वयं रहता हूँ उसी समुद्र में इस बालक को स्थान देना मान्य किया तथा कहा कि, मैं स्वयं एवं यह बालक युग कें अंत में संसार का नाश करेंगे । ऐसा कहने पर अपना तेज पितरों में डाल कर यह और्वाग्नि समुद्र में रहने के लिये गया [मत्स्य. १७५];[पद्म. सृ.३८-४१] । यह विष्णु ही था [म. व. १८९];[ ब्रह्मांड. ३.७२] । इसी युग के अंत में प्रलयकारक, पाताल का विषाग्नि, विष्णु के मुख से निकला हुआ तथा शंकर के तृतीय नेत्र में रहने बाला है [मत्स्य.२] । इसके वडवामुख वडवानल, संवर्तक तथा समुद्रप नाम हैं [वायु. ४७] इसका पुत्र संवर्तक अग्नि है [मत्स्य. ५२] । यही और्वाग्नि कहलाता है । 
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