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नहान

सुमित्रानंदन पंत - नहान

ग्रामीण लोगोंके प्रति बौद्धिक सहानुभूती से ओतप्रोत कविताये इस संग्रह मे लिखी गयी है। ग्रामों की वर्तमान दशा प्रतिक्रियात्मक साहित्य को जन्म देती है।


नहान

जन पर्व मकर संक्रांति आज

उमड़ा नहान को जन समाज

गंगा तट पर, सब छोड़ काज ।

नारी नर कई कोस पैदल

आरहे चले लो, दल के दल,

गंगा दर्शन को पुण्योज्वल !

लड़के, बच्चे, बूढे, जवान,

रोगी, भोगी, छोटे, महान,

क्षेत्रपति, महाजन औ' किसान ।

दादा, नानी, चाचा, ताई,

मौसा, फूफी, मामा, माई,

मिल ससुर, बहू, भावज, भाई ।

गा रही स्त्रियाँ मंगल कीर्तन,

भर रहे तान नव युवक मगन,

हँसते, बतलाते बालक गण ।

अतलस, सिंगी, केला औ' सन

गोटे गोखुरू टँगे, - स्त्री जन

पहनी छीटें, फुलवर, साटन

बहु काले, लाल, हरे, नीले,

बैंगनी, गुलाबी, पट पीले,

रँग रँग के हलके, चटकीले ।

सिर पर है चँदवा शीशफूल,

कानों में झुमके रहे झूल,

बिरिया, गलचुमनी, कर्णफूल ।

माथे के टीके पर जन मन,

नासा में नथिया, फुलिया, कन,

बेसर, बुलाक, झुलनी, लटकन ।

गल में कटवा, कंठा, हँसली,

उर में हुमेल, कल चंपकली,

जुगनी, चौकी, मूँगे नकली ।

बाँहो में बहु बहुँटे, जोशन,

बाजूबँद, पट्टी, बाँक सुषम,

गहने ही गँवारिनों के धन !

कँगने, पहुँची, मृदु पहुँचो पर

पिछला, मँझुवा, अगला क्रमतर

चूड़ियाँ, फूल की मठियाँ वर ।

हथफूल पीथ पर कर के धर,

उँगलियाँ मुँदरियों से सब भर,

आरसि अँगूठे में देकर-

वे कटि में चल करधनी पहन,

पाँवों में पायजेब, झाँझन,

बहु छड़े, कड़े, बिछिया, शोभन, -

यों सोने चाँदी से झंकृत,

जातीं वे पीतल गिलट खचित,

बहु भाँति गोदना से चित्रित ।

ये शत, सहस्त्र नर नारी जन

लगते प्रह्रष्ट सब मुक्त, प्रमन,

है आज न नित्य कर्म बंधन !

विश्वास मूढ, निःसंशय मन,

करने आए ये पुण्यार्जन,

युग युग से मार्ग भ्रष्ट जनगण ।

इनमें विश्वास अगाध, अटल,

इनको चाहिए प्रकाश नवल,

भर सके नया जो इनमें बल !

ये छोटी बस्ती में कुछ क्षण

भर गए आज जीवन स्पंदन-

प्रिय लगता जनगण सम्मेलन ।

Translation - भाषांतर
N/A

References :

कवी - श्री सुमित्रानंदन पंत

फरवरी' ४०

Last Updated : 2012-10-11T13:06:00.3900000

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कणाळी

  • स्त्री. ( पोत्यास भोंक पडले असतां त्यांतून गळणारी ) धान्याची धार , ओळ ; ( पाटांतून वाहणारा ) पाण्याचा ; प्रवाह . ( क्रि० लागणें ; पडणें ). ( सं . कण + आवली ) 
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