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तुज कृष्णे अधि नमिते शांत...

मानसगीत सरोवर - तुज कृष्णे अधि नमिते शांत...

भगवंताच्या लीला, त्याचे स्वरूप, अवतारकृत्ये व प्रत्येक अवतारातील अनेकविध प्रसंग, यावर आधारीत भजनांचा संग्रह, म्हणजेच मानसगीत सरोवर.


कृष्णेचे स्तवन

तुज कृष्णे अधि नमिते शांतवाहिनी ॥

गुणसरिते भवहरिते पापनाशिनी ॥तुज०॥धृ०॥

स्नान तुझ्या जळि करिते ॥

ध्यान तुझे मनि धरिते ॥

षड्‌विकार झणि हरि ते ॥

त्रिगुण त्यागुनी ॥तुज०॥१॥

पाहुनि तव वेग रूप ॥

हरिले मम त्रिविध ताप ॥

चुकलि जनन मरण खेप ॥

भासते मनी ॥तुज०॥२॥

कुणि जाती इंद्रपदी ॥

कुणि म्हणति मोक्ष अधी ॥

साधु शीघ्र स्नान-विधि ॥

करुनिया क्षणी ॥तुज०॥३॥

मंत्र-क्रिया-भक्तिहीन ॥

करु कैसे तव मी ध्यान ॥

म्हणे कृष्णा देइ ज्ञान ॥

जननि मज झणी ॥तुज०॥४॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2007-12-30T21:33:27.7370000

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सुषेण (वानर)

  • n. एक सुविख्यात वानरप्रमुख, जो धर्म नामक वानर का पुत्र, एवं वानरराज वालि का श्र्वशुर था । यह एक सुविख्यात युद्धविशारद ही नहीं, बल्कि वैद्यक शास्त्रज्ञ भी था । सीता शोध के लिए, पश्चिम दिशा में गये हुए वानरदल का यह प्रमुख था । 
  • राम-रावण युद्ध में n. इस युद्ध में लक्षावधि वानर सैनिकों को ले कर, यह राम के पक्ष में शामिल हुआ था । [म. व. २६७.२] । विद्युन्मालिन् राक्षस से युद्ध कर, इसने उसका वध किया था [वा. रा. यु. ४३.१४] । रावणपुत्र इंद्रजित का वध होने के पश्चात्, रावण ने लक्ष्मण वपर अमोघ शक्ति फेंकी, जिस कारण लक्ष्मण मूर्च्छित हो गया, एवं हजारों वानर आहत हो गये। उस समय, इसने विशल्यकरिणी, सावर्ण्यकारिणी, संजीवनी संधानी आदि औषधियों का उपयोग कर, लक्ष्मण की मूर्च्छा भंग की। उसी समय, मूर्च्छना लानेवाली औषधियों का उपयोग कर आहत वानर सैनिकों के शरीर में घुसे हुए शस्त्र बाहर निकाले [वा. रा. यु. ९१.२४-२७] । लक्ष्मण के लिए आवश्यक औषधियाँ महादेव पर्वत से लाने की आज्ञा इसने हनुमत् को दी थी, किंतु उन औषधियों का ज्ञान न होने के कारण, हनुमत् उस पर्वत को ही अपने हाथ पर उठा कर ले आया [वा. रा. यु. १०१] । राम के राज्याभिषेक के समय यह उपस्थित था, उस समय दक्षिण समुद्र का पानी इसने राज्याभिषेके के लिए इसने उन्हें अर्पित किया था [वा. रा. यु. १२८.५४] 
  • परिवार n. इसकी कन्या का नाम तारा था, जिसका विवाह वानरराज वालिन् से हुआ था । इसके मैंद एवं द्विविद अन्य नामक दो पुत्र भी थे [वा. रा. कि. ४२.१] 
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