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येणे जाणें दोनी खुंटले मा...

संत वंका - येणे जाणें दोनी खुंटले मा...

संत वंकाच्या अभंगातून विठ्ठलाची भक्ती करून मोक्ष साधण्याचा मार्ग सापडतो.


अभंग

येणे जाणें दोनी खुंटले मारग । अवघा केला त्याग इंद्रियांचा ॥१॥

एक धरिला मनीं पंढरीचा राणा । वेदशास्त्र पुराण अकळ तो ॥२॥

आगमनाची आटी निगमा नकळे । बहुत शीणले वाखाणितां ॥३॥

वंका म्हणे तो हा पहा विटेवरी । पाउलें गोजिंरी कर कटी ॥४॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2014-07-10T22:57:03.1000000

Comments | अभिप्राय

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सत्यकाम (जावाल)

  • n. एक सुविख्यात तत्त्वज्ञ, जो जबाला नामक स्त्री का पुत्र था । मन को ही परब्रह्म माननेवाला यह आचार्य याज्ञवल्क्य वाजसनेय ऋषि का समकालीन था [वृ. उ. ४.१.६. काण्व.] 
  • जन्म n. जबाला नामक दासी से किसी अज्ञात पुरुष से यह उत्पन्न हुआ था । इसके जन्म से संबंधित एक सविस्तृत कथा छांदोग्य उपनिषद में प्राप्त है, जहाँ उच्च कुल में जन्म होने की अपेक्षा श्रद्धा एवं तप अधिक श्रेष्ठ है, यह तत्त्व प्रतिपादित किया गया है । यह अपनी माता से उस पुरुष के द्वारा उत्पन्न हुआ, जिसका नाम उसे ज्ञात न था । लज्जा के कारण, उसने कभी भी उसका नाम न पूछा था । इसके जन्म के पश्चात् थोडे ही दिनों में इसका पिता मृत हो गया, जिस कारण इसे अपने पिता का नाम सदैव अज्ञात ही रहा। आगे चल कर यह गौतम हरिद्रुमत नामक आचार्य के पास शिक्षा पाने के लिए गया । वहाँ गौतम ऋषि के द्वारा इसका गोत्र आदि पूछे जाने पर इसने उसे अपनी सारी हकीकत कह सुनायी, एवं कहा, ‘मेरा जन्म ऐसे पिता से हुआ है, जिसका नाम मुझसे अज्ञात है । मेरी माता का जबाला नाम ही केवल मुझे ज्ञात है’। इसके सत्यभाषण के कारण गौतम ऋषि अत्यधिक प्रसन्न हुए, एवं उसने इसका उपनयन कर इसे ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा दी। 
  • शिक्षा n. तदुपरान्त यह गौतम ऋषि के आश्रम में ही रह कर अध्ययन करने लगा। इसी कार्य में यह अनेक वर्षों तक अरण्य में रहा। छांदोग्य-उपनिषद में प्राप्त रूपकात्मक निर्देश से प्रतीत होता है कि, यह चारसौं गायें ले कर अरण्य में गया, एवं उनकी संख्या एक सहस्त्र होने के काल तक यह अरण्य में रहा। 
  • ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति n. इसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हुई, इसकी सविस्तृत जानकारी छांदोग्य-उपनिषद में प्राप्त है । वायु देवता के अंश से उत्पन्न हुए एक वृषभ ने इसे ब्रह्मज्ञान का चौथा हिस्सा सिखाया । आगे चल कर गौतम ऋषि के आश्रम में स्थित अग्नि ने इसे ब्रह्मज्ञान का अन्या चौथा हिस्या सिखाया ब्रह्मज्ञान के बाकी दो हिस्से इसे हंस का रूप धारण करनेवाले आदित्य ने, एवं मद्गु नामक जलचर प्राणि का रूप धारण करनेवाले प्राण ने प्रदान किये। इस प्रकार संपूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर यह गौतम ऋषि के आश्रम में लौंट आया । तत्पश्चात् इसका मुखावलोकन कर, गौतम ऋषि ने इससे कहा, ‘संपूर्ण ब्रह्मज्ञान तुझे हो चुका है । जो ज्ञान तुझे हुआ है, उससे बढ़ कर अधिक ज्ञान इस संसार में कहीं भी प्राप्त होना असंभव है’ [छां. उ. ४.४-९] 
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