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आपन रूप परखिये आपै ॥ नि...

भजन - आपन रूप परखिये आपै ॥ नि...

हरिभक्त कवियोंकी भक्तिपूर्ण रचनाओंसे जगत्‌को सुख-शांती एवं आनंदकी प्राप्ति होती है।


आपन रूप परखिये आपै ॥

निज नयनन ही निज मुख दीखत अपनो सुख-दुख आपुई ब्यापै ।

अपनी गति बनै आपु बनाये जाड़ जात निज तन तप तापै ।

निज करसों निज आसुँ पोंछिये का सुझाय सुइ करसों छापै ।

तटपै बसि प्रशांत जल निरखहु का क्षति-लाभ सिंधु तल मापै ॥

गहत न लहत बृथा दिन खोवत कथत-मथत ही शास्त्र कलापै ।

'केशी' आत्म-प्रतीति फुरति है रामनाम अब्याहत जापै ॥

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Last Updated : December 22, 2007

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