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सप्त पाताळें एकवीस स्वर्ग...

संत निवृत्तीनाथांचे अभंग - सप्त पाताळें एकवीस स्वर्ग...

संत निवृत्तीनाथांचे अभंग
संत निवृत्तीनाथ हे संत ज्ञानेश्वर महाराजांचे थोरले बंधू होत.सर्वसामान्य जनतेला संस्कृत भाषेतील भगवद्‌गीता समजत नव्हती म्हणून निवृत्तीनाथांनी ज्ञानेश्वरांना प्राकृत(मराठी)भाषेत लिहीण्यास सांगितली, तीच "ज्ञानेश्वरी".
The eldest, Nivrutti, joined the nath sect and became Nivruttinath. He also become the guru of Dnyaneshwar. He, at  the age of fourteen, instructed Dnyaneshwar, who was twelve, to write a commentry on the Bhagavad Gita

संत निवृत्तीनाथांचे अभंग

सप्त पाताळें एकवीस स्वर्गे पुरोनि उरला हरि । काया माया छाया विवर्जित दिसे तो आहे दुरी ना जवळी गे बाईये ॥ १ ॥

प्रत्यक्ष हरितो दाविपा डोळां । ऐसा सद्‍गुरु कीजे पाहोनि । तनु मन धन त्यासि देऊनी । वस्तु ते घ्यावी मागोनि गे बाईये ॥ २ ॥

पावाडां पाव आणि करी परवस्तुसि भेटी । ऐसा तोचि तो । सद्‍गुरुविण मूढासि दर्शन कैचें । ऐसा तोचि चमत्कारु गे बाईये ॥ ३ ॥

एक मंत्र एक उपदेशिती गुरु । ते जाणावे भूमिभारु । निवृत्ति म्हणे तत्त्व साक्षित्वें दावी । ऐसा तोचि चमत्कारु गे बाईये ॥ ४ ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2008-02-10T11:44:42.6570000

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श्र्वेताश्र्वतर

  • n. एक आचार्य, जो श्र्वेताश्र्वेतर नामक सुविख्यात उपनिषद का रचयिता माना जाता है [श्र्वेताश्र्वतर ६.२१] । इसने स्वायंभुव ऋषि से ब्रह्मविद्या प्राप्त की थी । इसके नाम की एक कृष्णयजुर्वेदी शाखा भी उपलब्ध है । इसके नाम पर श्र्वेताश्र्वतर नामक एक ब्राह्मण ग्रंथ भी निर्दिष्ट है, जो वर्तमानकाल में केवल नाममात्र ही उपलब्ध है । 
  • श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद n. समस्त उपनिषद् वाङमय में श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है (रुद्रशिव देखिये) । ईश्र्वर समस्त सृष्टि का शास्ता एवं नियंता है, यही इस उपनिषद का प्रमुख प्रतिपाद्य विषय है । दर्शनशास्त्रों में से सांख्य एवं वेदान्त दर्शन जब एक ही शास्त्र माने जाते थे, उस समय इस ग्रंथ की रचना की थी । इस उपनिषद के पहले अध्याय में त्रैमूर्त्यात्मक अद्वैत शैवमत की श्रेष्ठता प्रतिपादन की गयी है । दूसरे अध्याय में योग एवं योगपरिणाम का प्रतिपादन किया गया है । तीसरे एवं चौथे अध्याय में सांख्य शैव मत का कथन प्राप्त है । पाँचवे अध्याय के दूसरे मंत्र में कपिल शब्द की अध्यात्मिक निरूक्ति दी गयी है । छठे अध्याय में सगुण ईश्र्वर का वर्णन प्राप्त है, जो सांप्रदाय-निरपेक्ष होने के कारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है । 
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