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मुलगी - आरते ये ग धाकुटी मुली । ह...

भारुड - मुलगी - आरते ये ग धाकुटी मुली । ह...

भारुड Bharude is a kind of satirical form of presenting the faults of lay human beings. It was started by Eknath who is revered as a saint.

भारुड - मुलगी

आरते ये ग धाकुटी मुली । हिच काय तुमची बोली ॥ १ ॥

घरादाराचे हितकर्ते । फुटक्या मडक्याचें भोंक बुजवितें ॥ २ ॥

अटकमटक नऊ वाटा । येऊन बसे दहा दारवंटा ॥ ३ ॥

दहा दारवंटा तें कोण । तुझ्यांत गेलें दोन ॥ ४ ॥

फटक माझे सवती । तुला सहाजण झोंबती ॥ ५ ॥

पडले षड्‍विकाराच्या हातीं । सद्‌गुरूचे पाय धर चित्तीं ॥ ६ ॥

सद्‌गुरु काय देईल ग मला । तन मन धन अर्पण करील त्याला ॥ ७ ॥

संसार जाईल सारा । उद्यां येईल काळाचा फेरा ॥ ८ ॥

आम्ही नर नारी पतिव्रता । विष्णूवर करूं सत्ता ॥ ९ ॥

एका जनार्दनीं केला संग । योगी खेळविला पांडुरंग ॥ १० ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-11-10T18:30:11.9600000

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प्रजापति

  • पु. सूर्यमालेंतील एक ग्रह ; युरेनस . ( सं .) 
  • n. एक वैदिक देवता, जो संपूर्ण प्रजाओं का स्रष्टा माना जाता है । महाभारत एवं पुराणों में निर्दिष्ट ‘ब्रह्मा’ देवता से इसे वैदिक देवता का काफी साम्य है, एवं ब्रह्मा की बहुत सारी कथाएँ इससे मिलती जुलती हैं (ब्रह्मन देखिये) । ऋग्वेद के दशम मण्डल में चार बार प्रजापति का नाम एक देवता के रुप में आया है । देवता प्रजापति को बहुत सन्तानों ‘प्रजागों’ को प्रदान करने के लिये आवाहन किया गया है [ऋ.१०.५८.४३] । विष्णु, त्वष्ट्रु तथा धातृ के साथ इसकी भी सन्तान प्रदान करने के लिए स्तुति की गयी है [ऋ.१०.१८४] । इसे, गायों को अत्यधिक दुग्ध्वती प्रशस्ति कहा गया है [ऋ. १०.१६९] । इसकी प्रशस्ति में ऋग्वेद का एक स्वतंत्र सूक्त हैं, जिसमें इसे पृथ्वी का सर्चोच्च देवता कहा गया है [ऋ.१०.१२१] । इस सूक्त में, आकाश एवं पृथ्वी, जल एवं सभी जीवित प्राणियों के स्त्रष्टा के रुप में इसकी स्तुति की गयी है, तथा कहा गया है, पृथ्वी में जो कुछ भी है, उसके अधिपति (पति) के रुप में प्रजापति का जन्म (जात) हुआ है । यह श्वास लेनेवाले समस्त गतिशील जीवों का राजा है । यही सब देवों में श्रेष्ठ है । इसी के विधानों का सभी प्राणी पालन करते हैं । यही नहीं, इसका यह विधान देवताओं को भी मान्य है । इसने आकाश तथा पृथ्वी की स्थापना की है, यही अन्तरिक्ष के स्थानों में व्याप्त है, तथा समस्त विश्व तथा समस्त प्राणियों को अपने भुजाओं से अलिंगन करता है । अथर्ववेद तथा वाजसनीय संहिता में साधारणतया, ब्राह्मण ग्रन्थों में नियमित रुप से, इसे सर्व प्रमुख देवता माना गया है । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, यह देवों का पिता है [श.ब्रा.११.१.६];[ तै.ब्रा,८.१.३] । सृष्टि के आरम्भ में अकेले इसी का अस्तित्त्व था [श.ब्रा.२.२.४] । एवं यह पृथ्वी का सर्वप्रथम याज्ञिक था [श.ब्रा.२.४.४,६.२.३] । देवों को ही नहीं, वरन् असुरों को भी इसनी बनाया था [तै.ब्रा.२.२.२] । सूत्रों में, इसे ब्रह्मा के साथ समीकृत किया गया है [आश्व.गृह.३.४] । ‘वंशब्राह्मण’ में इसे ब्रह्मा का शिष्य कहा गया है, एवं इसके शिष्य का नाम मृत्यु कहा गया है [वं.ब्रा.२] । ऋग्वेद के कई सूक्तों का यह मन्त्रद्रष्टा भी है [ऋ.९.१०१.१३-१६] 
  • सर्वप्रमुख देवता n. उत्तरकालीन वैदिक साहित्य में, इसे सर्वप्रमुख देवता के स्थानपर प्रतिस्थापित किया गया है । उपनिषदों के दर्शनशास्त्र में इसे ‘परब्रह्म’ अथवा ‘विश्वात्मा’ कहा गया हैं । तत्त्वज्ञान के संबंध में जब कमी किसीप्रकार की शंका उठ खडी होती थी, तब देव, दैत्य, एवं मानव प्रजापति के पास आकर अपनी शंका का समाधान करते थे [ऐ.ब्रा.५.३];[ छां.उ. ८.७.१];[ श्वेत.उ.४.२] । ऋग्वेद, ब्राह्मण एवं उपनिषद्‍ ग्रन्थों में प्रजापति को प्रायः देवता के रुप में माना गया है । लेकिन, इन्ही ग्रन्थों में कई स्थानों में इसे अन्य रुपों में भी निरुपित किया गया है । ऋग्वेद में एक स्थानपर, प्रजापति उस ‘सवितृ’ की उपाधि के रुप में आता है, जिसे आकाश को धारण करनेवाला, एवं विश्व का प्रजापति कहा गया है [ऋ.४.५३] । दूसरे एक स्थानपर इसे सोम की उपाधि के रुप में प्रस्तुत किया गया है [ऋ.९.५] । ब्राह्मण एवं उपनिषद ग्रंथो में, प्रजापति शब्द, विभिन्न अर्थोसे प्रयुक्त किया गया है, जिनमें से कई इस प्रकार हैः---यज्ञ, बारह माह, वैश्वानर, अन्न, वायु, साम एवं आत्मा । इससे प्रतीत होता है कि, उस समय किसी भी वस्तु की महत्ता वर्णित करने के लिए, ‘प्रजापति’ उपाधि का प्रयोग होगा था । पंचविंश ब्राह्मण में, सभी का महत्त्व वर्णन करने के लिए, उन्हें प्रजापति उपाधि दी गयी है [पं.ब्रा.७.५.६] 
  • सृष्टि n. आरंभ---वैदिक वाङ्मय में प्रजापति के जीवन सम्बन्धी कई कथार्ये दी गयी है जिनमें से निम्नलिखित प्रमुख हैः--- प्रजापति की आस्थि संधियों ढीली हो गयी थीं, तब देवों ने यज्ञ के उन्हें ठीक किया [श.ब्रा.१.६.३.३५] । प्रजापति सर्वप्रथम अकेला था । कालान्तर में, प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा से, उसने अपने शरीर के मॉंस को निकालाकर उसकी आहुति अग्नि में दी । अगि से इसके पुत्र के रुप में बिना सींगों का एक बकरा उत्पन्न हुआ [तै.सं.२.१.१] । प्रजापति के द्वारा उत्पन्न की गयी प्रजा इसके अधिकार के अन्दर रहकर वरुण के अधिकार में चली गयी । जब इसने उन्हें वापस बुलाना चाहा, तब वरुण ने उन्हें अपने कब्जे से छोडने के लिए इन्कार कर दिया । फिर प्रजापति ने एक सफेद खुरवाला कृष्णवर्णीय पशु वरुण को भेंट स्वरुप प्रदान करने का आश्वासन दिया । इस पर प्रसन्न होकर, वरुण ने प्रजा के उपर का अपना अधिकार उठा लिया, और प्रजापति प्रजा का स्वामी बन बैठा [तै.सं.२.१.२] । पृथ्वी उत्पन्न होने के बाद, देवों की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा हुई, और उन्होंने प्रजापति के कथनानुसार तपश्चर्या कर, अग्नि के आश्रय से एक गाय उत्पन्न की । उस गाय के लिए सब देवों ने प्रयत्न कर अग्नि को संतुष्ट किया । बाद में, उस गाय से प्रत्येक देव को तीन सौ तेंतीस देव प्राप्त हुए । इस प्रकार असंख्य प्रजा उत्पन्न हुई [तै.सं.७.१.५] । प्राचीन काल में, प्रजापति ने यज्ञ की ऋचाओं एवं छंदो का परस्पर में वितरण किया । उस समय इसने अपना अनष्टुप छंद ‘अच्छावाकीय’ नामक ऋचा को प्रदान किया अनुष्टुम नाराज होकर प्रजापति को दोष देने लगा । फिर सोमयज्ञ कर प्रजापति ने उस यज्ञ में अनुष्टूप् छंद को अग्रस्थान दिया । तब से उस छंद का उपयोग वैदिक ‘सवनों में सर्वप्रथम होने लगा । प्रजापति की प्रजा जब उसे त्याग कर जाने लगी, तब इसने अग्नि की सहायता से प्रजा को पुनः प्राप्त किया [ऐ.ब्रा.३.१२] । इसने ‘अग्निष्टोम’ नामक यज्ञ कर, उसमें अपने आप को समर्पित कर, देवों से अपनी प्रजा पुनः प्राप्त की [पं.ब्रा.७.२.१] । मनुष्य होते हुए भी देवत्व प्राप्त ऋषिओं को, एकबार प्रजापति ने ‘तृतीयसवन’ में बुलाकर, उनके साथ सोमपान किया । इसको उचित न समझकर, अग्नि आदि देवताओं ने इसकी कटु आलोचना की अ[ऐ.ब्रा,३३०] 
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