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अंबे तार मला तार ...

भजन - अंबे तार मला तार ...

भजन - A bhajan or kirtan is a Hindu devotional song, often of ancient origin. Great importance is attributed to the singing of bhajans with Bhakti, i.e. loving devotion. "Rasanam Lakshanam Bhajanam" means the act by which we feel more closer to our inner self or God, is a bhajan. Acts which are done for the God is called bhajan.

भजन

अंबे तार मला तार शेवंतीचा हार तुला शोभ तसे फार अंबे तार ॥धृ॥

शांती शेवंती दारी लावील्या तोडा केला फार अंबे तार मला तार ॥१॥

मनक मोहाचा दोर आणीला सुई नक्षीदार सुई नक्षीदार ॥२॥

मनक मोहाचे तुरे खोविले आरसे लावीले चार आरसे लावीले चार ॥३॥

मुर्ती सावळी पाहुनी गोजीरी गुंफूनी आणीला हार ॥४॥

दीन दासी मी शरण आले एवढा करी उपकार एवढा करी उपकार अंबे तार शेवंतीचा हार तुला शोभतसे फार ॥५॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2008-02-10T13:03:51.0530000

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द्रौपदी

  • n. द्रुपद राजा की कन्या, एवं पांडवों की पत्नी । स्त्रीजाती का सनातन तेज एवं दुर्बलता की साकार प्रतिमा मान कर, श्री व्यास ने ‘महाभारत’ में इसका चरित्रचित्रण किया है । स्त्रीस्वभाव में अंतर्भूत प्रीति एवं रति, भक्ति एवं मित्रता, संयम एवं आसक्ति इनके अनादि दंद्व का मनोरम चित्रण, ‘द्रौपदी’ में दिखाई देता है । स्त्रीमन में प्रगट होनेवाली अति शुद्ध भावनाओं की असहनीय तडपन, अतिरौद्र पाशवी वासनाओं की उठान, एवं नेत्रदीपक बुद्धिमत्ता का तुफान, इनका अत्यंत प्रभावी आविष्कार ‘द्रौपदी’ में प्रकट होता इनके कारण इसकी व्यक्तिरेखा प्राचीन भारतीय इतिहास की एक अमर व्यक्तिरेखा बन गयी है । याज एवं उपयाज ऋषिओं की सहायता से, द्रुपद ने ‘पुत्रकामेष्टि यज्ञ’ किया । उस यज्ञ के अग्नि में से, ध्रुष्टद्युम्न एवं द्रौपदी उत्पन्न हुएँ, [म.आ.१५५] । यज्ञ में में उत्पन्न होने के कारण, इसे ‘अयोनिसंभव’ एवं ‘याज्ञसेनी’ नामांतर प्राप्त हुएँ [म.आ.परि.९६.११,१५] । पांचाल के राजा द्रुपद की कन्या होने के कारण, इसे ‘पांचाली’, एवं इसके कृष्णवर्ण के कारण, ‘कृष्णा’ भी कहते थे । लक्ष्मी के अंश से इसका जन्म हुआ था [म.आ.६१.९५-९७,१७५-७७] 
  • स्वयंवर पंचतपितत्व n. द्रौपदी विवाहयोग्य होने के बाद, द्रुपद ने इसके स्वयंवर का निश्चय किया । स्वयंवर में भिन्न भिन्न देशों के राजा आये थे, परंतु मत्स्यवेध की शर्त से पूरी न कर सके (द्रुपद देखिये) । अर्जुन ने मत्स्यवेध का प्रण जीतने पर, द्रौपदी ने अर्जुन को वरमाला पहनायी । बाद में पांडव इसे अपने निवासस्थान पर ले गये । धर्म ने कुंती से कहा ‘हम भिक्षा ले आये हैं । उसे सत्य मान कर, कुंती ने सहजभाव से कहा, ‘लायी हुई भिक्षा पॉंचो में समान रुप में बॉंट लो’। पांडवों के द्वारा लायी भिक्षा द्रौपदी है, ऐसा देखने पर कुंती पश्चात्ताप करने लगी । परंतु मात का वचन सत्य सिद्ध करने, के लिये, धर्म ने कहा, ‘द्रुपदी पॉंचों की पत्नी बनेगी’। द्रुपद को पांडवों के इस निर्णय का पता चला । एक स्त्री पॉंच पुरुषों की पत्नी बने, यह अधर्म हैं, अशास्त्र है, ऐसा सोच कर वह बडे विचार में फँस गया । इतने में व्यासमुनि वहॉं आये, तथा उसने द्रुपद को बताया, ‘द्रुपदी को शंकर से वर प्राप्त है कि, तुम्हें पॉंच पति प्राप्त होंगे । अतः पॉंच पुरुषों से विवाह इसके बारे में अधर्म नही है’। द्रुपद ने उसके पूर्वजन्म की कथा पूछी । व्यास ने कहा, ‘द्रौप्दी पूर्वजन्म में में एक ऋषिकन्या थी । अगले जन्म में अच्छा पति मिले, इस इच्छ से उसने शंकर की आराधना की । शंकर से प्रसन्न हो कर, उसे इच्छित वर मॉंगने के लिये कहा । तब उसने पॉंच बार ‘पति दीजिये’ यो कहा । तब शंकर ने इसे वर दिया कि, तुम्हें पॉंच पति प्राप्त होगे [म.आ.१८७-१८८] । इसलिये द्रौपदी ने पॉंच पांडवों को पति बनने में अधर्म नहीं है।’ यह सुन कर, द्रुपद ने धौम्य ऋषिद्वारा शुभमुहूर्त पर, क्रमशः प्रत्येक पांडव के साथ, द्रौपदी का विवाह कर दिया [म.आ.१९०] । ब्रह्मवैवर्त पुराण में, द्रौपदी के पंचपतित्व के संबंध में निम्नलिखित उल्लेख है । रामपत्नी सीता का हरण रावण द्वारा होनेवाला है, यह अग्नि ने अंतर्ज्ञान से जान लिया । उस अनर्थ को टालने के लिये, सीता की मूर्तिमंत प्रतिकृति अपनी मायासामर्थ्य के द्वारा उसने निर्माण की । सच्ची सीता को छिपा कर, मायावी सीता को ही राम के आश्रम में रखा । इसने सीता को राम का वियोग लगा । तब उसने शंकर की आराधना प्रारंभ की । शंकर ने प्रसन हो कर उसे वर मॉंगने के लिए कहा । पॉंच बार, ‘पतिसमागम प्राप्त हो, ’ ऐसा वर सीता ने मॉंग लिया । तब शंकर ने उसे कहा, ‘अगले जन्म में तुम्हें पॉंच पति प्राप्त होगें’ [ब्रह्मवै. २.१४] । पॉंचों पांडव एक ही इन्द्र के अंश होने के कारण, वस्तुतः द्रौपदी एक की ही पत्नी थी [मार्क.५] 
  • द्यूत n. विवाहोपरांत काफी वर्ष द्रौपदी ने बडे सुख में बिताये । पांडवों का राजसूययज्ञ भी उसी काल में संपन्न हुआ । पांडवों से इसे प्रतिविंध्यादि पुत्र भी हुएँ । किंतु पांडवों के बढते ऐश्वर्य के कारण, दुर्योधन का मत्सर दिन प्रतिदिन बढता गया । उसने द्यूत का षड्‍यंत्र रच लिया, एवं द्यूत खेलने के लिये शकुनि को आगे कर, युधिष्ठिर का सारा धन हडप लिया । अन्त में द्रौपदी को भी युधिष्ठिर ने दॉंव पर लगा दिया । उस कमीने वर्तन के लिये उपस्थित राजसभासदों ने युधिष्ठिर का धिक्कार किया । विदुर को द्रौपदी को सभा में लाने का काम सौंपा गया । उसने दुर्योधन को अच्छी तरह से फटकारा, एवं उस काम करने के लिये ना कह लिया । पश्चात द्रौपदी को सभा में लाने का कार्य प्रतिकामिन पर सौंपा गया । वह भी हिचकिचाने लगा । फिर यह काम दुःशासन पर सौंपा गया । दुःशासन का अन्तःपुर में प्रवेश होते ही द्रौपदी भयभीत हो कर स्त्रियों की ओर दौडने लगी । अंत में दैडनेवाली द्रौपदीके केश पकडकर दुशाःशन खींचने लगा । उस समय द्रौपदी ने कहा, ‘मैं रजस्वला हूँ । मेरे शरीर पर एक ही वस्त्र है । ऐसी स्थिति में मुझे सभा में ले जाना अयोग्य हैं’। उस पर दुःशासन ने कहा, ‘तुम्हें द्यूत में जीत कर हमने दासी बनाया हैं । अब किसी भी अवस्था में तुम्हारा राजसभा में आना अयोग्य नहीं है’। इतना कह कर अस्ताव्यस्त केशयुक्त, जिसका पल्ला गिर पडा है, ऐसा द्रौपदी को वह बलपूर्वक केश पकड कर, सभा में ले आया [म.स.६०.२२-२८] 
  • द्रौपदी का प्रश्न n. सभा में आते ही आक्रोश करते हुए द्रौपदों ने प्रश्न पूछा, ‘धर्म ने पहले अपने को दॉंव पर लगाया, तथा हारने पर मुझे लगाया । तो क्या मैं दासी बन गई?’ सके प्रश्न का उत्तर कोई भी न दे सका [म.स.६०.४३-४५] । भीष्म ने सुनी अनसुनी की । बाकी सभा स्तब्ध रही । यह लगातार प्रश्नों की बौछार कर रही थी । सुन कर भी किसी के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी । कर्ण, दुःशाशनादि द्रौपदी की ‘दासी दासी’ कह कर अवहेलना करने लगे । भीम अपना क्रोध न रोक सका । जिन हाथों से धर्म ने द्रौपदी को दॉंव पर लगा था, उन हाथों को जलाने के लिये, अग्नि लाने को उसने सहदेव से कहा । बडी कठिनाई से अर्जुन ने उसे शांत किया । इस पर धृतराष्ट्रपुत्र विकर्ण सामने आया, तथा द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर देने की प्रार्थना उसने भीष्मादिकों से की । परंतु कोई उत्तर न दे सका । तब विकर्ण ने कहा, ‘दॉंव पर जीते गये धर्म ने चूँकि द्रौपदी को दॉंव पर लगाया, अतः सचमुच यह जीती ही नहीं गई’। यह कहते ही सारे सभाजन विकर्ण की वाहवाह-करने लगे । द्रौपदी का यह नैतिक विजय देख कर, कर्ण सामने आ कर बोला, ‘संपूर्ण संपत्ति दॉंव पर लगाने पर, द्रौपदी अजित रह ही नहीं सकती । इसके अतिरिक्त द्रौपदी अनेक पतिओं की पत्नी होने के कारण, धर्मशास्त्र के अनुसार पत्नी न हो कर, दासी है । इसलिये पूरी संपत्ति के साथ यह भी दासी बन गई है’। पश्चात द्रौपदी की ओर निर्देश कर के उसने दुःशासन से कहॉं, द्रौपदी के वस्त्र खींच लो । पांडवों के वस्त्र भी छीन लो’। तब पांडवों ने एक वस्त्र छोड, अन्य सभी वस्त्र उतार डालें । द्रौपदी का वस्त्र खींचने दुःशासन बढा, एवं इसके वस्त्र खींचने लगा । उसपर यह आर्तभाव से भगवान को पुकारने लगी [म.स.६१.५४२-५४३] । भीम क्रोध से लाल हो गया । दुःशासन के रक्तप्राशन के प्रश्न का उसने सभा को पुनः स्मरण दिला कर सुधन्वा की कथा बताई (सुधन्वन् देखिये) । द्रौपदी लगातार आक्रोश कर रही थी, ‘स्वयंवर के समय केवल एक बार मैं लोगों के सामने आई । आज मैं पुनः सब को दृष्टिगत हो रही हूँ । इस शरीर को वायु भी स्पर्श न कर सका, उसकी भरी सभा में आज अवहेलना चालू है’। दुःशासन इसके वस्त्र खींच ही रहा था, किंतु इसकी लज्जारक्षा के लिये श्रीकृष्ण स्वयं चीररुप हो गये, एवं एक के बाद एक नये चीर उसने प्रकट किया [म.स.६१.४१] । द्रौपदी के शील की रक्षा हुई । अपने कृत्य के प्रति लज्जित हो कर, अधोमुख दुःशासन अपने स्थान पर बैठा गया [म.स.६१.४८] । अन्त में धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को कडी डॉंट लगाई । द्रौपदी को इच्छित वर दे कर, पतियों सहित इसे दास्यमुक्त किया [म.स.६३.२८-३२] 
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