अश्वत्थप्रदक्षिणाव्रत

व्रतसे ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति तथा पवित्रताकी वृद्धि होती है ।


अश्वत्थप्रदक्षिणाव्रत

( अद्भुतसागर ) - किसी शुभ दिनमें प्रातःस्त्रानादि करनेके पश्चात्

' ममाखिलपापक्षयपूर्वकमायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं विष्णुस्वरुपमश्वत्थरुममुकसंख्याकाभिः प्रदक्षिणाभिः सेविष्ये ।'

- यह संकल्प करके अश्वत्थके समीप विष्णुकी मूर्ति स्थापित करके दोनोंका षोडशोपचार पूजन करे । दो वस्त्र ( धोती और दुपट्टा ) ओढ़ावे । ब्रह्मचर्यका पालन करे । काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सरता, बहुभोजन और मन्दोत्साह न होने दे । दान, मान और उपस्करसहित ब्राह्मणोंको भोजन करावे । फिर

' अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां राजा ब्राह्मणवर्णकः । अश्वत्थः पूजितो येन सर्वं सम्पूजितं भवेत् ॥

' से प्रार्थना करके

' यानि कानि च पापनि जन्मान्तरकृतानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे ॥'

से चार प्रदक्षिणा करके मौन धारण करे । फिर यथाक्रम लक्षपरिक्रमा आरम्भ करे । उनमें यह ध्यान रखे कि पहले दिन जितनी बन सकें उतनी ही प्रतिदिन करे और आगे यथाक्रम एक - दो - तीन - चार - पाँच लाख या अधिक गौरवका कार्य हो तो बारह लाख परिक्रमा करके तदंगीभूत ब्राह्मण - भोजनादि कराये तो इस व्रतसे श्वास, काश, उदरशूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रमेह, कोढ, अग्निमान्द्य और राजयक्ष्मा या सर्वज्वर - जैसे घातक रोग, प्रत्येक प्रकारके महापाप और राजभयादि - जैसे अरिष्ट, कष्ट या संकट आदिका निवारण होकर सब प्रकारके सुख और उनके साधन प्राप्त होते हैं ।

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Last Updated : January 16, 2012

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