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शिवार्चामें निषिध्द पत्र-पुष्प

प्रस्तुत पूजा प्रकरणात भिन्न भिन्न देवी-देवतांचे पूजन, योग्य निषिद्ध फूल यांचे शास्त्र शुद्ध विवेचन आहे.


शिवार्चामें निषिध्द पत्र-पुष्प
शिवार्चामें निषिध्द पत्र-पुष्प

कदम्ब, सारहीन फूल या काठूमर, केवडा, शिरीष, तिन्तिणी, बकुल (मौलसिरी), कोष्ठ, कैथ, गाजर, बहेड़ा, कपास, गंभीरी, पत्रकंटक, सेमल, अनार, धव, केतकी, वसंत ऋतुमें खिलनेवाला कंद-विशेष, कुंद, जूही, मदन्ती, शिरीष सर्ज और दोपहरियाके फूल भगवान् शंकरपर नहीं चढ़ाने चाहिये । वीरमित्रोदयमें इनका संकलन किया गया है ।

कदम्ब, बकुल और कुन्दपर विशेष विचार
इन पुष्पोंका कहीं विधान और कहीं निषेध मिलता है । अत: विशेष विचारद्वारा निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाता है --

कदम्ब -- शास्त्रका एक वचन है -- 'कदम्बकुसुमै: श्म्भुमुन्मतै: सर्वसिध्दिभाक् ।' अर्थात् कदम्ब और धतूरेके फूलोम्से पूजा करनेसे सारी सिध्दियाँ मिलती हैं । शास्त्रका दूसरा वचन मिलता है --
अत्यन्तप्रतिषिध्दानि कुसुमानि शिवार्चने ।
कदम्बं फल्गुपुष्पं च केतकं च शिरीषकम् ॥
अर्थात् कदम्ब तथा फल्गु (गन्धहीन आदि) के फूल शिवके पूजनमें अत्यन्त निषिध्द हैं । इस तरह एक वचनसे कदम्बका शिवपूजनमें विधान और दूसरे वचनसे निषेध मिलता है, जो परस्पर विरुध्द प्रतीत होता है ।
इसका परिहार वीरमित्रोदयकारने कालविशेषके द्वारा इस प्रकार किया है । इनके कथनका तात्पर्य यह है कि कदम्बका जो विधान किया गया है, वह केवल भाद्रपदमास -- मास-विशेषमें । इस पुष्प-विशेषका महत्व बतलाते हुए देवीपुराणमें लिखा है --
'कदम्बैश्र्चम्पकैरेवं नभस्ये सर्वकामदा ।'
अर्थात् 'भाद्रपदमासमें कदम्ब और चम्पासे शिवकी पूजा करनेसे सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं ।'
इस प्रकार भाद्रपदमासमें 'विधि' चरितार्थ हो जाती है और भाद्रपदमाससे भिन्न मासोंमें निषेध चरितार्थ हो जाता है । दोनों वचनोंमें कोई विरोध नहीं रह जाता ।
'सामान्यत: कदम्बकुसुमार्चनं यत्तद् वर्षर्तुविषयम् । अन्यदा तु निषेध: । तेन न पूर्वोतरवाक्यविरोध: ।'

बकुल (मौलसिरी) -- यह बात बकुल-सम्बन्धी विधि-निषेधपर भी लागू होती है । आचारेन्दुमें 'बक' का अर्थ 'बकुल' किया गया है और 'बकुल' का अर्थ है -- 'मौलसिरी' । शास्त्रका एक वचन है--
'बकपुष्पेण चैकेन शैवमर्चनमुत्तमम् ।'
दूसरा वचन है --
'बकुलैर्नार्चयेद देवम् ।'
पहले वचनमें मौलसिरीका शिवपूजनमें विधान है और दूसरे वचनमें निषेध । इस प्रकार आपातत: पूर्वापर-विरोध प्रतीत होता है । इसाका भी परिहार कालविशेषद्वारा हो जाता है, क्योंकि मौलसिरी चढ़ानेका विधान सायंकाल किया गया है -- 'सायाह्ने बकुलं शुभम् ।' इस तरह सायंकालमे विधि चरितार्थ हो जाती है और भिन्न समयमें निषेध चरितार्थ हो जाता है ।

कुन्द -- कुन्द-फूलके लिये भी उपर्युक्त पध्दति व्यवहरणीय है । माघ महीनेमें भगवान् शंकरपर कुन्द चढ़ाया जा सकता है, शेष महीनोंमें नहीं । वीरमित्रोदयने लिखा है --
कुन्दपुष्पस्य निषेधेऽपि माघे निषेधाभाव: ।

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2018-12-03T19:16:03.4670000

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