TransLiteral Foundation
Don't follow traditions blindly or don't assume a superstition either.
Don't be intentionally ignorant. Ask us!! Make Informed Religious Decisions!!
संस्कृत सूची|शास्त्रः|आयुर्वेदः|योगरत्नाकरः|
॥ अथाग्निदग्धव्रननिदानमाह ॥

॥ अथाग्निदग्धव्रननिदानमाह ॥

’ योगरत्नाकर ’ हा आयुर्वेदावरील मूळ प्राचीन ग्रंथ आहे.


॥ अथाग्निदग्धव्रननिदानमाह ॥
॥ अथाग्निदग्धव्रननिदानमाह ॥
तत्र स्निग्धं रुक्षं वाशृत्य द्रव्यमग्निर्दहति । अग्निसन्तप्तो हि स्नेहं सूक्ष्ममार्गांनुसारित्वात्‍ त्वगादीननुप्रविश्याशु दहति तस्मात्स्त्रेहदग्धेऽधिका रुजो भवन्ति । तत्र प्लुष्टं दुर्दग्धं सम्यग्‍दग्धमतिदग्धमिति चतुर्विधं भवत्यग्निदग्धम्‍ । तत्र विवर्णमात्रं प्लुष्यते तत्प्लुष्टं यत्रोत्तिष्ठन्ति स्फोटास्तीव्रदाहवेदनाश्चिराच्चोपशाम्यन्ति तद्दुर्दग्धम्‍ । सम्यगदग्धमवगाढं तालफलवर्णं सुस्थितं पूर्वलक्षणयुक्तं च । अतिदग्धं तु त्वग्मांसामूर्च्छाश्वासोपद्रवा भवन्ति । इति प्लुष्टादिभेदेनाग्निदग्धश्चतुर्विधो व्रणो भवति ॥
इत्यग्निदग्धनिदानम्‍ । चन्द्रसेनात्‍ ॥

॥ अथ तच्चिकित्सा ॥
प्लुष्टस्याग्निप्रतपनं कार्यमुष्णं तथौषधम्‍ । शीतामुष्णां च दुर्दग्धे क्रियां कुर्यात्तत: पुन: ॥१॥
घृतालेपनसेकांस्तु शीतान्येवास्य कारयेत्‍ । अतिदग्धे विशीर्णानि मांसान्युद्‍धृत्य शीतलाम्‍ ॥२॥
क्रियां कुर्याच्चूर्णकाले शालितण्डुलकण्डनै: । तिन्दुक्यास्त्वक्वषायैर्वा घृतमिश्रै: प्रलेपयेत्‍ ॥३॥
सम्यगदग्धे तुगाक्षीरीप्लक्षचन्दनगैरिकै: । सामृतै: सर्पिषा युक्तैरालेपं कारयेद्भिषक्‍ ॥४॥
अथ पथ्यादिलेप: ॥ पथ्याकर्दमजीरकमधुसिक्थकसर्जमिश्रितं लेपात्‍ । गव्यं घृतमपहरति च पावकजनितं व्रणं सद्य: ॥१॥
अन्तर्धूमकुठेरको दहनजं लेपान्निहन्ति व्रणम्‍ अश्वत्थस्य विशुष्कवल्कलभवं चूर्णं तथा गुण्ठनात्‍ । अभ्यड्गाद्विनिहन्ति तैलमाखिलं गण्डूपदै: साधितं पिष्ट्वाशाल्मलितूलकैर्जलगतां लेपात्तथा वालुकाम्‍ ॥२॥ दग्धयवभस्मचूर्णं तिलतैलाक्तं प्रलेपनादचिरात्‍ । हरति शिखिदाहदग्धं भूयो‍ऽभ्यड्गाद्‍ व्रणं चाशु ॥३॥
अथ मधूच्छिष्टाद्यं तैलम्‍ ॥ मधूच्छिष्टं समधुकं लोध्रं सर्जरसं तथा । मूर्वाचन्दनमञ्जिष्ठा: पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत्‍ ॥
सर्वेषामपि दग्धानां व्रणरोपनमुक्तंमम्‍ ॥१॥
अथ पटोलीतैलम्‍ ॥ सिद्धं कषायकल्काभ्यां पटोल्या: कटुतैलकम्‍ । दग्धव्रणरुजास्त्रावदाहविस्फोटनाशनम्‍ ॥१॥
अथ चन्दनाद्यं यमकम्‍ ॥ चन्दनं वटशृड्गाश्च मञ्जिष्ठा मधुकं तथा । प्रपौण्डरीकं दूर्वा च पतड्गं धातकी तथा ॥१॥
एतैस्तैलं विपक्तव्य़ं गोक्षीरेण समायुतम्‍ । अग्निदग्धव्रणे श्रेष्ठं तत्क्षणाद्रोपणं परम्‍ ॥२॥
अथ लाड्गलीमूलमेव च ॥१॥
पिप्पली त्रिफला चैव निम्बपत्रं च कार्षिकम्‍ । कपिलाया घृतं प्रस्थं पचेत्तद्दिगुणं पय: ॥२॥
पलद्वयं च सिक्थस्य सिद्धे पूते च दापयेत्‍ । लाड्गलीकं घृतं नाम व्रणानां रोपणं परम्‍ ॥३॥
अग्निदग्धे विसर्पे च कीटलूताव्रणेषु च । चिरोत्थेषु च दुष्टेषु नाडीमर्माश्रितेषु च ॥४॥
अग्निदग्धव्रणे देयं धातकीचूर्णमुत्तमम्‍ । अतसीतैलसंमिश्रं वह्निदग्धव्रणापहम्‍ ॥५॥
अन्तर्धूमविदग्धं त्रिफलाचूर्णं विमिश्रितं तैलै: । क्षौभै: शीघ्रं शमयत्यग्निव्रणमाशु लेपेन ॥६॥
पित्तविद्रधिवीसर्पशमनं लेपनादिकम्‍ । अग्निदग्धव्रणे सम्यक्‍ प्रयुञ्जीत विचक्षण: ॥७॥
सुधा पुरातनी दग्धो वारिणा परिपेषिता । लेपनं तैलदग्धस्य विस्फोटव्याधिनाशनम्‍ ॥८॥
अक्षिस्थेषु च कर्तव्यमिदमाश्च्योतनं हितम्‍ । शेलुत्वक्‍त्रिफलादार्वीक्वाथो रोचनया युत: ॥ स्नुह्यर्कक्षीरसिक्तेऽक्ष्णि गव्यं सर्पिर्निषेचयेत्‍ ॥९॥
इति दग्धव्रणचिकित्सा ॥

Translation - भाषांतर
N/A

References : N/A
Last Updated : 2018-03-17T20:01:14.3630000

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.

पतंजलि III.

  • n. ‘पातंजलयोगसूत्र’ (या सांख्यप्रवचन) नामक सुविख्यात योगशास्त्रीय ग्रंथ का कर्ता । कई विद्वानों ने 'पातंजल योगसूत्रों' कोषड्‌-दर्शनों में सर्वाधिक प्राचीन बताया है, एवं यह अभिमत व्यक्त किया है कि, उसकी रचना बौधयुग से पहले लगभग ७०० ई. पू. में हो चुकी थी [‘पतंजलि योगदर्शन’ के भूमिका पृ.२] । किंतु डॉं. राधाकृष्णन आदि आधुनिक तत्वाजों के अनुसार ‘योगसूत्र’ का काल लगभग ३०० ई. है [इं.फि. २.३४१-३४२] । उस ग्रंथ पर लिखे गये प्राचीनतम बादरायण, भाष्य की रचना व्यास ने की थी उस भाष्य की भाषा अन्य बौद्ध ग्रंथो की तरह है, एवं उसमें न्याय आदि दर्शनों के मतों का उल्लेख किया गया है । ‘योगसूत्रों’ पर लिखे गये ‘व्यासभाष्य’ का निर्देश ‘वात्स्यायनभाष्य’ में एवं कनिष्ठ के समकालीन भदन्त धर्मत्रात के ग्रंथों में उपलब्ध है । 
  • योगसूत्र परिचय n. विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में विखरे हुए योगसंधी विचारों के संग्रह कर, एवं उनको अपनी प्रतिभा से संयोज कर, पतंजलि ने अपने ‘योगसूत्र’ ग्रंथ की रचना की । ‘योगदर्शन’ के विषय पर, ‘योगसूत्रों’ जैसा तर्कसंमत, गंभीर एवं सर्वांगीण ग्रंथ संसार में दूसरा नहीं है । उस ग्रंथ की युक्तिशृंखला एवं प्राज्कल दृष्टी कोण अतुलनीय है, एवं प्राचीन भारत की दार्शनिक श्रेष्ठता सिद्ध करता है । ‘पातंजल योगसूत्र’ ग्रंथ समाधि, साधन, विभूति एवं कैवल्य इन चार पादों (अध्यायों) में विभक्त किया गया है । उस ग्रंथ मे समाविष्ट कुल सुत्रों की संख्या १९५ है । समाधिपाद---में योग का उद्देश्य, उसका लक्षण एवं साधन वर्णन किया है । चित्त को एकाग्र करने की पद्धति इस ‘पाद’ में बतायी गयी है । साधन पाद---में क्लेश, कर्म एवं कर्मफल का वर्णन है । इंद्रियदमन कर के ज्ञानप्राति कैसी की जा सकती है उसका मार्ग इस ‘पाद’ में बताया गया है । विभूति पाद---में योग के अंग, उनका परिणाम, एवं ‘अणिमा’, महिमा’ आदि सिद्धियों का वर्णन किया गया है । कैवल्य पाद---में मोक्ष का विवेचन है । ज्ञानप्राप्ति के बाद आत्मा कैवल्यरुप कैसे बनती है, इसकी जानकारी इस ‘पाद’ में दी गयी है । 
  • योग-दर्शन n. आत्मा एवं जगत् के संबंध में, सांख्यदर्शन जिन सिद्धांतो का प्रतिपादन करता है, ‘योगदर्शन’ भी उन्ही का समर्थक है । ‘सांख्य’ के अनुसार ‘योग’ ने भी पच्चीस तत्त्वों का स्वीकार किया है । किंतु ‘योग-दर्शन’ में एक छब्बीसवॉं तत्त्व ‘पुरुषविशेष’ शामिल करा दिया है, जिससे ‘योग-दर्शन’ सांख्यदर्शन जैसा निरीश्वरवादी बनने से बच गया है । फिर भी ‘ईश्वरप्रणिधाद्वा’ [योग.१.२३] सूत्र के आधार पर कई विद्वान पतंजलि को ‘न्रीरीश्वरवादी’ मानते है । ‘योग-सूत्रों’ के सिद्धांत अद्वैती है या द्वैती, इस विषय पर विद्वानों का एकमत नहीं है । ‘ब्रह्मसूत्रकार’ व्यास एवं शंकराचार्य ने पतंजलि को ‘द्वैतवादी’ समझ कर, सांख्य के साथ इसका भी खंडन किया है । ‘योग सूत्र’ के सिद्धांतो के अनुसार, चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है [योग.१.२] । इन चित्तवृत्तियों का निरोध अभ्यास एवं वैराग्य से होता है [योग.१.१२,१५] । पुरुषार्थविरहरीत गुण जब अपने कारण में लय हो जाते हैं, तब ‘कैवल्यप्राप्ति’ होती है [योग.४.३४] । योगदर्शन का यह अंतिम सूत्र है । अविद्या, अत्मिता, राग, द्वेष एवं अभिनिवेश इन पंचविध कुशों से योग के द्वारा विमुक्त हो कर, मोक्ष प्राप्त करना, यह ‘योगदर्शन’ का उद्देश्य है । चंचल चित्तवित्तियों को रोकने एवं योगसिद्धि के लिये, ‘योगसूत्र’ कार ने ग्यारह साधनों का कथन किया है । वे साधन इस प्रकार हैः---यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, अभ्यास, वैराग्य, ईश्वर,प्रणिधान, समाधि एवं विषयविरक्ति । ‘योग-दर्शन’ के अनुसार, संसार दुःखमय है । जीवात्मा को मोक्षप्राति के लिये ‘योग’ एकमात्र ही उपाय है । ‘योगदर्शन’ का दूसरा नाम कर्मयोग भी है, क्यों कि साधक को वह ‘मुक्तिमार्ग’ सुझाता है । 
RANDOM WORD

Did you know?

विविध पूजा अथवा होम प्रसंगी स्त्रीने पुरूषाच्या कोणत्या अंगास बसावे आणि हाताला हात कां लावावा?
Category : Hindu - Beliefs
RANDOM QUESTION
Don't follow traditions blindly or ignore them. Don't assume a superstition either. Don't be intentionally ignorant. Ask us!!
Hindu customs are all about Symbolism. Let us tell you the thought behind those traditions.
Make Informed Religious decisions.

Featured site

Ved - Puran
Ved and Puran in audio format.