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श्रीवरदराजपञ्चकम् - प्रत्यूषे वरदः प्रसन्नवदन...

देवी देवतांची स्तुती करताना म्हणावयाच्या रचना म्हणजेच स्तोत्रे. स्तोत्रे स्तुतीपर असल्याने, त्यांना कोणतेही वैदिक नियम नाहीत. स्तोत्रांचे पठण केल्याने इच्छित फल प्राप्त होते.
In Hinduism, a Stotra is a hymn of praise, that praise aspects of Devi and Devtas. Stotras are invariably uttered aloud and consist of chanting verses conveying the glory and attributes of God.


श्रीवरदराजपञ्चकम्
प्रत्यूषे वरदः प्रसन्नवदनः प्राप्ताभिमुख्यान्जनान्
आबद्धाञ्जलिमस्तकानविरलान् आबालमानन्दयन् ।
मन्दोड्डायितचामरो मणिमयश्वेतातपत्रश्शनैः
अन्तर्गोपुरमाविरास भगवानारूढपक्षीश्वरः ॥१॥
मुक्तातपत्रयुगलोभयचामरान्तः
विद्योतमानविनयातनयाधिरूढम् ।
भक्ताभयप्रदकराम्बुजमंबुजाक्षं
नित्यं नमामि वरदं रमणीयवेषम् ॥२॥
यद्वेदमौलिगणवेद्यमवेद्यमन्यैः
यद्ब्रह्मरुद्रसुरनायकमौलिवन्द्यम् ।
तत्पद्मनाभपदपद्मयुगं मनुष्यैः
सेव्यं भवद्भिरिति दर्शयतीव तार्क्ष्यः ॥३॥
केचित्तत्त्वविशोधने पशुपतौ पारम्यमाहुः परे
व्याजह्रुः कमलासने नयविदोऽप्यन्ये हरौ सादरम् ।
इत्येवं चलचेतसां तनुभृतां पादावरिन्दं हरेः
तत्सन्दर्शयतीव संप्रति नृणां तार्क्ष्यः श्रुतीनां निधिः ॥४॥
प्रत्यग्गोपुरसंमुखे दिनमुखे पक्षीन्द्रसंवाहितं
नृत्यच्चामरकोरकं निरुपमच्छत्रद्वयीभासुरम् ।
सानन्दं द्विजमण्डलं विदधतं सन्नाहचिह्नारवैः
कान्तं पुण्यकृतो भजन्ति वरदं काञ्च्यां तृतीयोत्सवे ॥५॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2018-02-25T19:28:55.8070000

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जर II.

  • n. एक ऋषि । कारु का अर्थ है शरीर । शरीर को तपसे क्षीण करता है, वह जरत्कारु, यह इस शब्द की व्युत्पति है [म.आ.३६.३] । यह यायावरों का पुत्र था [म.आ.४१.१६] । ब्रह्मचारी अवस्था में जरत्कारु तीर्थयात्रा कर रहा था । तब इसे घास के आश्रय से एक गढ्ढे में लटकनेवाले वीरणक नामक पितर दिखे । घास का जड चूहों द्वारा कुतरा जा रहा था । इसी कारण उनका आधार कब टूट जावेगा कह नही सकता था । उनकी इस अवस्था का कारण इसने पूछा । उन्होंनें कहा, ‘जरात्कारु अविवाहित होने के कारण हमारा वंश खंडित हो गया है । इस लिये हमारी यह स्थिति हो गई है । केवल तप के भरोसे हम आज तक जीवित है । परंतु उस तप को कालरुपी चूहा दिनरात कुतर रहा है । अतः किस तरह क्यों न हो, हमारे पुत्र से विवाह करने को कहो’ । तब इसने कहा, ‘मैं तुम्हारा ही पुत्र हूँ । मैंने ब्रह्मचर्यावस्था में रहने का निश्चय किया था । तुमारी यह स्थिति देख कर मैंने अपना विचार बदल दिया हैं । मेरे ही नाम की कन्या मुझे भिक्षा में प्राप्त हो । उसके पोषाण की जिम्मेवारी मुझ पर न हो । इस शतर्पर, उससे मैं विवाह कर लूँगा’। वृद्ध होने के कारण, कोई भी इसे कन्या नहीं देता था । पश्चात् अरण्य में वासुकि ने अपनी जरत्कारु नामक भगिनी इसे दी, तथा उसका पोषण करने की जिम्मेवारी स्वयं उठा ली । विवाह होने पर पतिपत्नी एकत्र रहने लगे । परंतु इसने शुरु मे ही इसे चेतावनी दी की, ‘मेरे मन के विरुद्ध अगर तुम व्यवहार करोगी, तो मैं तुम्हें छोड दूँगा’। एक दिन यह अपनी पत्नी की गोद में सिर रख कर सोया था । सायंकाल होने के बाद, संध्यालोप न हो, इसलिये उसने पति को जागृत किया । तब ‘मैं सोया हूँ । सूर्य की क्या मजाल है कि, वह अस्तायमान हो । ऐसा क्रोध में कह कर यह पुनः तप करने के लिये चला गया [म.आ.४३.३९] । इस समय जरत्कारु गर्भवती थी । उसे आस्तीक नामक पुत्र हुआ । जरत्कारु की पत्नी कश्यपकन्या मनसा से, आस्तीक का जन्म हुआ [दे.भा.९.४७-४९]; मनसा देखिये । 
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