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अध्याय ८५ वा - श्लोक २६ ते ३०

श्रीकृष्णदयार्णवकृत हरिवरदा


श्लोक २६ ते ३०
श्रीशुक उवाच - एवं भगवता राजन्वसुदेव उदाहृतः । श्रुत्वा विनष्टनानाधीस्तूष्णीं प्रीतमना अभूत् ॥२६॥

राजन् ऐसें संबोधून । जें प्रायोपशयनीं ही राजमान । मोह ममता न धरी मन । यास्तव भगवान् शुक बोधी ॥१९॥
म्हणे भो राया कुरुस्रग्मेरु । ऐसा भगवंतें विचारु । कथिला ऐकोनि तो सादरु । वसुदेव सत्वर भ्रम सांडी ॥२२०॥
विवर्तजनित जे नाना धी । ते निरसली एवंबोधीं । अनेकत्वाची विनष्ट धी । राहे त्रिशुद्धी मौनस्थ ॥२१॥
अकारमात्रेचें अधिष्ठान । विवर्तजनित जे नाना धी । ते निरसली एवंबोधीं । अनेकत्वाची विनष्ट धी ॥२२॥
पूर्णावबोधें मन तटस्थ । सहजेंचि गोगण ठेला स्तिमित । यास्तव वसुदेव तूष्णींभूत । श्रोतीं संकेत जाणावा ॥२३॥
वसुदेव विसरला देहभान । ब्रह्मावबोधीं विरालें मन । यावरी देवकी तेथ येऊन । प्रार्थी आपण तें ऐका ॥२४॥

अथ तत्र कुरुश्रेष्ठ देवकी सर्वदेवता । श्रुत्वानीतं गुरोः पुत्रमात्मजाभ्यां सुविस्मिता ॥२७॥

कुरुवरश्रेष्ठा अभिमन्युतनया । यावरी देवकी तिया ठायां । आत्मजकृता परमाश्चर्या । ऐकोनि विस्मया पावली जे ॥२२५॥
सर्व देवता जियेच्या थायीं । अंशरूपें वर्तती पाहीं । भगवन्मायेच्या प्रवाहीं । जालीं तेही विमोहित ॥२६॥
रामकृष्णीं पुत्रीं दोघीं । मृत गुरुपुत्र स्वमायायोगीं । आणिला ऐसें ऐकोनि वेगीं । विस्मय आंगीं बहु भरला ॥२७॥
तेथ म्हणिजे स्वपुत्रां निकटीं । येऊनि त्यांतें प्रियतम गोठी । ऐकवी घालूनि श्रवणपुटीं । तदुक्ति मर्‍हाठी अवधारा ॥२८॥

रामकृष्णौ समाश्राव्य पुत्रान्कंसविर्हिसितान् । स्मरन्ती कृपणं प्राह वैकल्यव्यादश्रुलोचना ॥२८॥

रामकृष्णांतें ऐकवणें । करूनि मृतपुत्रां कारणें । आठवूनियां अंतःकरणें । अश्रु लोचनें विसर्जी ॥२९॥
कीर्तिमंतादि षट् पुत्रांतें । कंसहस्तें निमालियांतें । परम वैक्लव्य पावूनि चित्तें । स्मरत होत्साती काय वदे ॥२३०॥

देवक्युवाच - राम रामाप्रमेयात्मन्कृष्ण योगेश्वरेश्वर ।
वेदाहं वां विश्वसृजामीश्वरावादिपूरुषौ ॥२९॥

भो संकर्षणा रामा । अप्रमेय तुझी महिमा । श्रीकृष्ण भो मेघश्यामा । योगेश्वरांच्या ईश्वरा ॥३१॥
मी जाणतें तुह्मांप्रती । विश्वस्रष्टे जे प्रजापती । त्यांचे ईश्वर तुम्ही निश्चिती । प्रधानपुरुष प्रत्यक्ष ॥३२॥
मनुष्यनाट्यें किमर्थ नटलां । म्हणाल तरी या ऐका बोला । भूभाररूपां भूपतींला । वधावयाला अवतरलां ॥३३॥

कालविध्वस्तसत्त्वानां राज्ञामुच्छास्त्रवर्तिनाम् । भूमेर्भारायमाणानामवतीर्णौ किलाद्य मे ॥३०॥

भो भो आद्या श्रीअच्युता । भूभाररूपां नृपां उत्पथां । विध्वस्तसत्वां कालग्रस्तां । नाशावयार्थ अवतरालां ॥३४॥
मे म्हणिजे माझ्या ठायीं । तुम्हीं अवतार धरूनिं पाहीं । भाररहित केली मही । चरित्र तेंही देखियलें ॥२३५॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-06-12T22:17:50.7870000

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व्याडि दाक्षायण

  • n. एक सुविख्यात व्याकरणकार जो ‘संग्रह’ नामक वैदिक व्याकरणविषयक ग्रन्थ का कर्ता माना जाता है । इसका यही ग्रन्थ लुप्त होने पर, पतंजलि ने व्याकरण महाभाष्य नामक ग्रंथ की रचना की थी । अमरकोश के अनेकानेक भाष्यग्रन्थों में, व्याडि एवं वररुचि को व्याकरणशास्त्र के अंतर्गत लिंगभेदादि के शास्त्र का सर्वश्रेष्ठ आचार्य कहा गया है । व्याकरण महाभाष्य में एवं काशिका में इसका निर्देश क्रमशः ‘दाक्षायण’ एवं ‘दाक्षि’ नाम से प्राप्त है [महा. २.३.६६];[ काशिका. ६.२.६९] । काशिका के अनुसार, दाक्षि एवं दाक्षायण समानार्थि शब्द माने जाते थे [काशिका. ४.१.१७] तत्रभवान् दाक्षायणः दाक्षिर्वा । 
  • वंश n. आचार्य पाणिनि दाक्षीपुत्र नाम से सुविख्यात था । इसी कारण ‘दाक्षायण’ व्याडि एवं ‘दाक्षीपुत्र’ पाणिनि अपने मातृवंश की ओर से रिश्तेदार थे, ऐसा माना जाता है । व्याडि की बहन का नाम व्याड्या था [पा. सू. ४.१.८०], एवं पाणिनि की माता का नाम दाक्षी था । कई अभ्यासकों के अनुसार, व्याड्या एवं दाक्षी दोनों एक ही थे, एवं इस प्रकार व्याडि आचार्य पाणिनि के मामा थे । किंतु वेबर के अनुसार, इन दो व्याकरणकारों में दो पीढ़ीयों का अंतर था, एवं ‘ऋक्प्रातिशाख्य’ में निर्दिष्ट व्याडि पाणिनि से उत्तरकालीन था । संभवतः इसके पिता का नाम व्यड था, जिस कारण इसे ‘व्याडि’ पैतृक नाम हुआ होगा। इसके ‘दाक्षायण’ नाम से इसके वंश के मूळ पुरुष का नाम दक्ष विदित होता है । किंतु अन्य कई अभ्यासक, ‘दाक्षायण’ इसका पैतृक नहीं, बल्कि ‘दैशिक’ नाम मानते है, एवं इसे दाक्षायण देश का रहनेवाला बतातें है । मत्स्य में दाक्षि को अंगिराकुलोत्पन्न ब्राह्मण कहा गया है [मत्स्य. १९५.२५] 
  • ऋक्प्रातिशाख्य में n. शौनक के ‘ऋक्प्रातिशाख्य’ में वैदिक व्याकरण के एक श्रेष्ठ आचार्य के नाते व्याडि का निर्देश अनेक बार मिलता है, जिससे प्रतीत होता है किं, यह शौनक के शिष्यों में से एक था । अपने ‘विकृतवल्ली’ ग्रंथ के आरंभ में इसने आचार्य शौनक को नमन किया है । 
  • पाणिनीय व्याकरण का व्याख्याता n. व्याडि वैदिक व्याकरण का ही नहीं, बल्कि पाणिनीय व्याकरण का भी श्रेष्ठ भाष्यकार था -- रसाचार्यः कविर्व्याडिः शब्दब्रह्मैकवाङ्मुनिः। दाक्षीपुत्रवचोव्याख्यापटुर्मीमांसाग्रणिः । [समुद्रगुप्तकृत ‘कृष्णचरित’ १६] । (संग्रहकार व्याडि पाणिनि के अष्टाध्यायी का (‘दाक्षीपुत्रवचन’) का श्रेष्ठ व्याख्याता, रसाचार्य, एवं मीमांसक था ।) इसके ‘मीमांसाग्रणि’ उपाधि से प्रतीत होता है कि, इसने मीमांसाशास्त्र पर भी कोई ग्रंथ लिखा होगा। पंतजलि के व्याकरण-महाभाष्य में इसे ‘द्रव्यपदार्थवादी’ कहा गया है [महा. १.२.६४] । अष्टाध्यायी में भी ‘व्याडिशाला’ शब्द का निर्देश प्राप्त है, जिसका संकेत संभवतः इसीके ही विस्तृत शिष्यशाखा की ओर किया गया होगा [पा. सू. ६.२.८६] 
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