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अध्याय ६८ वा - श्लोक ६ ते १०

श्रीकृष्णदयार्णवकृत हरिवरदा


श्लोक ६ ते १०
दृष्ट्वानुधावतः सांबो धार्तराष्ट्रान्महारथः । प्रगृह्य रुचिरं चापं तस्थौ सिंह इवैकलः ॥६॥

आले देखोनि धार्तराष्ट्र । साम्बें फिरविला रहंवर । चुम्बूनि धार्तराष्ट्रीचे अधर । म्हणे भीरु भय न धरीं ॥५५॥
तुझिये सोडवणे कौरव । धनुर्विद्येचा करूनि गर्व । धांविले परंतु मी हे सर्व । करीन अगर्व समरंगीं ॥५६॥
साम्बें ऐसी दौर्याधनी । आश्वासूनि वीरश्रीवचनीं । श्मश्रु स्पर्शोनि दक्षिणपाणी । ठाकला रणीं महारथी ॥५७॥
जैसें अमरेन्द्रकोदंड । प्रावृटीं भासे सुरंगाढ्य । तैसें रुचिर कार्मुक दृढ । साम्बें झडकरी चढविलें ॥५८॥
रुचिर चाप घेऊनि मुष्टीं । कौरव लक्षिले दूरदृष्टी । सिंह जैसा देखे करटी । तैसा पोटीं सावेश ॥५९॥
समरीं ठाकला जैसा मेरु । अढळ अभंग महावीरु । एकला एकाकी रहंवरु । जेंवि भास्कर तमोहंता ॥६०॥
तयाप्रति धार्तराष्ट्र । देखोनि लोटले अनावर । म्हणती धरा बांधा चोर । कन्या सुन्दर नेतो हा ॥६१॥
आधींच कर्म केले खोटें । आतां पळसील कोणे वाटे । मरण ओढवलें ओखटें । दावीं मुखवटें परतोनी ॥६२॥
ऐसे सक्रोध कौरव । भोगिती शब्दाचें गौरव । साम्ब धरूं इच्छिती सर्व । समर अपूर्व तो ऐका ॥६३॥

तं ते जिघृक्षवः क्रुद्धास्तिष्ठ स्तिष्ठेति भाषिणः । आसाद्य धन्विनो बाणैः कर्णाग्रण्यः समाकिरन् ॥७॥

कोठें पळसी उभारे उभा । बोलती लंबा करूनि जिभा । महारथी चढले क्षोभा । वीरश्रीशोभा प्रकाशिती ॥६४॥
कर्ण कौरवां अग्रणी । धनुष्यें वाहिलीं समराङ्गणीं । साम्ब सभवंता परिवेष्टूनी । वर्षती बाणीं धनुर्धर ॥६५॥
वीर धनुवाडे झुंजार । मुख्य करूनि कर्णादि प्रवर । साम्बावरी वर्षती शर । प्रळयजलधरपडिपाडें ॥६६॥
सिंहनादें आरोळिया । मत्तगजांच्या किङ्काळिया । शस्त्रश्रेणी मोकळिया । भेदिती बळिया साम्बातें ॥६७॥
तडक फुटती अकस्मात । जैसे मेघीं विद्युत्पात । वीर वर्षती शरजीमूत । साम्ब निवान्त ते ठायीं ॥६८॥
नवल केलें परीक्षिती । अचिन्त्यैश्वर्य जो श्रीपति । साम्ब तयाची संतति । समरक्षिती न डंडळी ॥६९॥

सोऽपविद्धः कुरुश्रेष्ठ कुरुभिर्यदुनंदनः । नामृष्यत्तदचिंत्यार्भः सिंहः क्षुद्रमृगैरिव ॥८॥

शशक जंबुक शाखामृग । ऋक्ष सूकर लांडगे वाघ । गोगज गवयसहकुरंग । क्षुद्र अनेग मृगनिचय ॥७०॥
ऐसा क्षुद्र मृगांचा भार । सिंह न गणी एकाङ्गवीर । तैसाचि साम्ब महाशूर । समरीं सधीर दृढत्वें ॥७१॥
अचिन्त्य जो कां जनार्दन । तत्सुत साम्ब यदुनंदन । कौरववीरांतें न गणून । करी संधान तें ऐका ॥७२॥

विस्फूर्ज्य रुचिरं चापं सर्वान्विव्याध सायकैः । कर्णादीन्षड्रथान्वीरस्तावद्भिर्युगपत्पृथक् ॥९॥

रुचिरचापाची शिञ्जिनी । सांबें कौतुकें आस्फाळूनी । काढूनि निषंगाची गवसणी । सज्जिला गुणीं दिव्यशर ॥७३॥
कौरवांच्या शस्त्रश्रेणी । छेदूनि धुरोळा उडविला गगनीं । सर्व महारथे मार्गणीं । कर्णाग्रणीं भेदियले ॥७४॥
सामान्य सैन्य मारिलें किती । शुकाचार्य तें न वदे ग्रथीं । ग्रंथभूयस्त्वाची खंती । म्हणोनि व्युत्पत्ति न वाढवी ॥७५॥
एर्‍हवीं प्रभु सामान्य कोणी । विचरे वेष्टित परिवारगणीं । मा हे तो भीष्मादि कौरवाग्रणी । सेनेवांचूनि कैं जाती ॥७६॥
असो साम्बें मारिली सेना । पुढें कौरवां साही जणां । महारथियां भीष्मा कर्णा । दुर्योधना शलप्रमुखां ॥७७॥
एकेचि समयीं साही वीर । भेदिले विंधूनि तीक्ष्ण शर । व्याख्यान करितां लागे उशीर । परी केला पार चमत्कारें ॥७८॥
दिशाविभागीं साही जणीं । समब भेदिला असतां बाणीं । परन्तु तेणें अलौकिक करणी । दाविली रणीं कुरुवृद्धा ॥७९॥
साही जणांचे छेदूनि बाण । अपार मारिलें कौरवसैन्य । एकेचि समयीं साही जण । भेदूनि आंगवण दाखविली ॥८०॥
रणप्रवीण महारथी । भीष्मकर्णादि यूथपति । साम्बें भेदिले कोणे रीती । तें परीक्षिति अवधारीं ॥८१॥

चौर्भिश्चतुरो वाहानेकैकेन च सारथीन् । रथिनश्च महेश्वासांस्तस्य तत्तेऽभ्यपूजयन् ॥१०॥

चारी चारी चौं चौं बाणीं । यन्ते एकैकें भेदूनी । साही जणां साही बाणीं । एकेचि क्षणीं भेदियलें ॥८२॥
भीष्मादि योद्धे रणप्रवीण । धनुर्विद्यापरायण । तथापि साम्बाचें संधान । तयां लागून न लक्षे ॥८३॥
साम्बें भेदिले वारू सारथि । भीष्मकर्णादि महारथी । भला रे भला साम्बा म्हणती । शब्दें पूजिती अवघेची ॥८४॥
धन्य ते जाम्बवती माय । धन्य श्रीकृष्णाचें वीर्य । धन्य साम्बाचें वीरश्रीधैर्य । देखूनि कुरुवर्य मानवला ॥८५॥
म्हणती वीर हा प्रतापजेठी । आंगा स्पर्शों नेदी काठी । दिसे विजयाची विफळ गोठी । केंवि गोरटी सोडविजे ॥८६॥
विचार करूनि साही जणीं । विभागें साम्ब भेदिला बाणीं । तें तूं ऐकें कोदंडपाणि । कुरुकुळतर्णि परीक्षिति ॥८७॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-05-11T06:00:44.2470000

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नाभाग

  • n. वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से एक, एवं प्राचीनकाल के एक महाप्रतापी राजा [पद्म. सृ.८] । कई ग्रंथों में, इसे वैवस्वत मनु का पौत्र, एवं नभग राजा का पुत्र कहा गया है [म.आ.७७.१४];[ भा.९.४०]। इसने समुद्रपर्यत पृथ्वी को सात दिन में जीता था, एवं सत्य के द्वारा उत्तम लोकों पर विजय पायी थी [म.व.२६.११] । पृथ्वी को जीतने के बाद, इसने उसे दक्षिणा के रुप में ब्राह्मणों को दे दिया [म.शां.९७.२१] । किंतु शीलवान् एवं दयालु होने के कारण, दी हुई पृथ्वी स्वयं इसके पास वापस आ गयी [म.शां.१२४.१६-१७] । इसने जीवन में कभी मांस नहीं खाया था । मांसभक्षण के त्याग के इस पुण्य के कारण, इसे ‘परावरतत्त्व’का ज्ञान हो गया, एवं ब्रह्मलोक में इसे प्रवेश मिल गया [म.अनु.११५.५८-६८] । इसके सत्याचरण एवं उदारता की एक कथा पद्मपुराण में दी गयी है । अपने कुमाराअयु में, यह गुरुगृह में विद्यार्जन कर रहा था । यह मौका देख, वैवस्वत मनु के अन्य पुत्रों ने उसका राज्य आपस में बॉंट लिया । नाभाग को उसके राज्य के हिस्से से वंचित कर, इसे इसका पिता हिस्से के रुप में दिया । फिर इसके पिता ने इसे कहा, ‘तुम चिंता मत करो । विपुल धनार्जन का रास्ता मैं तुम्हे दिखाता हूँ । आंगिरस ऋषि यज्ञ कर रहे है । यज्ञ के छठवे दिन उन्हे कुछ भ्रम सा हो कर, यज्ञ के मंत्र की उन्हे विस्मृति हो जाती है । उस वक्त, तुम उसे देओ ‘विश्वदेवसूक्त’गा कर बताओ । उससे उसका यज्ञ पूरा होगा, एवं प्रसन्न हो कर, यज्ञ के लिये एकत्रित किया सारा धन वह तुम्हे दे देंगा।’ पिता के कथनानुसार, इसने अंगिरस् को ‘मंत्रस्मरण के बार एमें सहायता दी ’ एवं अंगिरस् ने भी यज्ञ का सारा धन इसे दे दिया । किंतु इसी वक्त एक कृष्णवर्णीय पुरुष का रुप धारण कर, रुद्र वहॉं उपस्थित हुआ, एवं यज्ञधन मॉंगने लगा । यज्ञ का अवशिष्ट धन पर रुद्र का ही अधिकार रहता है, यह जानते ही नामाग ने सार द्रव्य रुद्र को दे दिया । इसकी इस उदारता से प्रसन्न हो कर, रुद्र दे दिया । इसके इस उद्धारता से प्रसन्न हो कर, रुद्र ने आंगिरस के यज्ञ की सारी संपत्ति नाभाग को प्रदान की एवं इसे ‘ब्रह्मविद्या’ भी सिखायीं [पद्म.सृ८] । विल्कुल यही कथा नाभानेदिष्ट के नाम पर प्राचीन वैदिक ग्रंथों में दी गयी है [ऋ.१०.६१-६२] । ऋग्वेद के उन सूक्तों की रचना ‘नाभाककाण्व’ ने की हैं [ऋ.८.३९-४१];[ नि.१०.५] । नाभाग को अंबरीष नामक एक पुत्र था । इसके वंश की विस्तृत जानकारी बारह पुराणों में दी गयी है [वायु.८९.विष्णु.४.२];;[ अग्नि.२७२];[ ब्रह्मांड.३.६३];[ ब्रह्म.७];[ मत्स्य.१२];[ ह.वं.१.१०];[ भा.९.४-६] 
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