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अध्याय १४ वा - श्लोक २४ ते २५

श्रीकृष्णदयार्णवकृत हरिवरदा


श्लोक २४ ते २५
एवंविधं त्वां सकलात्मनामपि स्वात्मानमात्मात्मतया विचक्षते ।
गुर्वर्कलब्धोपनिषत्सुचक्षुषा ये ते तरंतीव भवानृतांबुधिम् ॥२४॥

एवं म्हणिजे ऐशिये रीती । जे कां तूंतें विवरून पाहती । ते हा मिथ्या भवाब्धि तरती । कोणे रीती तें ऐका ॥१॥
तुझें आत्मत्व आहे जैसें । ज्ञान निर्धारूनियां तैसें । मिथ्या अनित्योपाधि नासे । वास्तवदशे वेंठती ॥२॥
आत्मप्रियत्वें अवघें प्रिय । देहगेहादि जायातनय । वृत्तिक्षेत्रादि अमुत्र विषय । मायामय हें जाणूनी ॥३॥
मायामय हें कळलें कैसें । सद्गुरुचित्सूर्यप्रकाशें । उपनिषज्ज्ञान दृष्टिवशें । रजतमनाशें विवळल्या ॥४॥
अविद्येची हरली नीज । स्वप्नभ्रमाची मानिली लाज । अपरोक्षबोधें चक्षु सुतेज । वास्तव उमज स्वात्मत्वीं ॥५०५॥
तेव्हां स्वप्नींचा भवसागर । विषयसुखाचा अभ्यासमात्र । अनेक दुःखीं अतिदुस्तर । तो ते नर निस्तरती ॥६॥
ये श्लोकीं सूत्रप्राय । त्रिविध बोलिला तरणोपाय । तोचि श्लोकचतुष्टयें । वृत्तिन्यायें विधि वर्णी ॥७॥
याचि श्लोकींच्या तीन्ही परी । सूचिजती प्रथमाकारीं । तेथ सावधान क्षणभरी । होऊनि चतुरीं परिसिजे ॥८॥
ज्ञानेंकरूनि तरती एक । न बुडोनि तरले ते द्वितीय देख । प्रत्यगात्मत्व विवेक । तरले साधक तीसरे ॥९॥
द्विविध प्रत्यगात्मत्वविवेक । दोघे करिती मूर्खामूर्ख । एवं चौश्लोकीं सम्यक । सत्यलोकपति वदला ॥५१०॥

आत्मानमेवाऽऽत्मतयाऽविजानतां तेनैव जातं निखिलं प्रपंचितम् ।
ज्ञानेन भूयोऽपि च तत्प्रलीयते रज्वामहेर्भोगभवाभवौ यथा ॥२५॥

ज्ञानें करूनि कैसे तरले । तेंचि पाहिजे परिसिलें । तरी या भवाब्धीचें पहिलें । होणें झालें तें ऐका ॥११॥
अविद्येच्या अंगीकारें । स्वस्वरूपाचिया विसरें । तमोगुणाच्या आविष्कारें । झालें अंधारें कारण ॥१२॥
तयामाजीं सत्त्वाभासें । विपरीतज्ञानें विक्षेपवशें । मनबुद्ध्यादि वृत्तिविशेषें । जीवित्वदशे विरूढविलें ॥१३॥
तेणें मिथ्या दृश्य प्रपंच । तो विवर्त केला साच । तेव्हां तापत्रयाचे जाच । सोशी शोच्य होऊनी ॥१४॥
सामोर भिंतीचा कोन्हाडा । खचित दर्पणीं पाहतां मूढां । भ्रमें दुसरा दिसे वाडा । नुमजोनि वेढां लागे पैं ॥५१५॥
मागीलचि पुढें भासे । भ्रमास्तव नुमजे ऐसें । मग आप्तोक्तिगुरूपदेशें । कळे जैसें यथोक्त ॥१६॥
आत्मा आत्मत्वें नेणोन । अध्यासिलें प्रपंचभान । सद्गुरुवाक्यें होतां ज्ञान । होय निरसन भ्रमाचें ॥१७॥
जैसा रज्जूवरी सर्प । भ्रमाक्तज्ञानें जो आरोप । तो अपवादें पावे लोप । कळतां रूप रज्जूचें ॥१८॥
रज्जूसर्पाचें होणें जाणें । स्वआस्तिक्यें ज्ञानाज्ञानें । एक तरले प्रकारें येणें । ऐसें द्रुहिणें विवरिलें ॥१९॥
आतां तरले याचि परी तरले । नाहींच भवाब्धि स्पर्शले । तेही जाती निरूपिले । श्रवण केलें पाहिजे ॥५२०॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-04-29T20:02:22.3170000

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ऋतध्वज

  • n. (सो. काश्य.) यह शत्रुजित् का पुत्र । गालव ने कुवलय नामक अश्व दे कर इसे अपने आश्रम का कष्ट दूर करने के लिये कहा । एकबार सूकर रुप से आये हुए पातालकेतु के पीछे लग कर एक गड्‌ढे में गिर कर पाताल में गया । वहॉं पातालकेतु द्वारा भगा कर लाई गई विश्वावसु गंधर्व की कन्या मदालसा थी । उसके साथ इसका विवाह होकर उसे लेकर यह घर आया । तदनंतर यमुना के तट पर रहने वाले पातालकेतु के भाई तालकेतु ने इसे धोखा दे कर यज्ञ की दक्षिणा के रुप में इसके गले का कंठा मांग लिया । तथा इसे अपने आश्रम में रख कर मदालसा को सूचित किया कि ऋतध्वज मर चुका है तथा चिन्ह के तौर पर मृत्यु के समय उसने यह कंठा दिया ऐसा बताया । मदालसा सती हो गई । ऋतध्वज ने अविवाहित रहने का निश्चय किया । परंतु पुत्र की इच्छानुसार अश्वतर नाग ने सरस्वती से गानविद्या प्राप्त कर शंकर को प्रसन्न किया तथा उससे पहले के ही समान परंतु योगी मदालसा कन्या के तौर पर मांग कर ऋतध्वज को दी । ऋतुध्वज को उससे विक्रान्त, सुबाहु, शत्रुमर्दन तथा अलर्क नामक चार पुत्र हुए तथा मदालसा ने उन्हें योगमार्ग का उपदेश दिया [मार्क. १८.३४,१९.८८]; प्रतर्दन देखिये । 
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