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श्रीगणेशाय नमः ॥ हरिः ॐ ...

अथ श्रीदत्तोपनिषत् ( पूर्वतापिनी ) - श्रीगणेशाय नमः ॥ हरिः ॐ ...

देवी देवतांची स्तुती करताना म्हणावयाच्या रचना म्हणजेच स्तोत्रे.
A Stotra is a hymn of praise, that praise aspects of Devi and Devtas.


अथ श्रीदत्तोपनिषत् ( पूर्वतापिनी )
श्रीगणेशाय नमः ॥
हरिः ॐ भद्रकर्णेभिः श्रृणुयामदेवाभद्रंपश्येमाक्षभिर्जयत्राः ॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यश्येम देवहितं यदायुः ॥ भद्रंकर्णेभिरितिशांतिः ॥ ॐ चिन्मयं व्यापितं सर्वं आकाशं जगदीश्वरम् ॥ निर्विकल्पं स्वयं ब्रह्मा तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥१॥
निराकारं निराभासं निरालंबं निरंजनम् ॥ निःशब्द उच्यते ब्रह्म तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥२॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतीश्वराः ॥ आश्रमाणां विभिन्नोहं तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥३॥
आश्रमाणां च सर्वेषां अस्ति नास्ति न चात्मनि ॥ भिन्नाभिन्नं नपश्यंति तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥४॥
आब्रह्मस्तंभपर्यंतं संपूर्णं परमात्मनः ॥ भिन्नाभिन्नं नपश्यंति तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥५॥
मनस्यं मनमध्यस्थं मनमायाविवर्जितम ॥ मनसा मन आलोक्य तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥६॥
अगोचरं चैकब्रह्म तस्यदेहे विलीयते ॥निवर्तते क्रियाः सर्वास्तस्याहं पंचमाश्रम् ॥७॥
निरालंबपदं प्राप्तं यत्र ज्योतिर्लयं गतः ॥ निवर्तंते क्रियाः सर्वास्तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥८॥
स्वयं दाता स्वयं भोक्ता स्वयं देवो महेश्वरः ॥ निर्विकल्पे स्वयं ब्रह्म तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥९॥
क्कचिद्योगि क्कचिद्भोगी क्कचिद्नग्नःपिशाचवत् ॥ स्वयमात्मस्वरूपेण तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥१०॥
अभिन्नमात्मनोरूपं जगदेतच्चराचरम् निर्विकल्पं स्वयं ब्रह्म तस्याहं पंचमाश्रमम् ॥११॥
आत्मज्ञानं विना योगी ब्रह्मचारी कथं भवेत् ॥ गृही वा वानप्रस्थो वा यतिर्योगं विना नहि ॥१२॥
ॐ भद्रंकर्णेभिः श्रृणुयामदेवाभद्रंपश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यश्येम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्तिनऽइंद्रावृद्धःश्रवाः ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥
॥ इति श्रीदत्तोपनिषत् पूर्वतापिनी समाप्तः ॥१४॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-03-16T07:11:11.2100000

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बृहद्रथ II.

  • n. (सो. ऋक्ष.) मगध देश का राजा, जो चेदिराज सम्राट उपरिचर वसु का पुत्र, एवं जरासंध का पिता था [म.आ.५७.२९] । यह मगध देश का बलवान् राजा तीन अक्षौहिणी सेना का स्वामी, एवं अत्यंत पराक्रमी योद्धा था [म.स.१६.१२] । काशिराज की दो जुडवी कन्याए इसकी पत्नियॉं थी । इसने एकांत में अपनी दोनो पत्नियों के साथ प्रतिज्ञा की थी, ‘मैं तुम दोनों के साथ कभी विषम व्यवहार न करुँगा।’ इसे दुनिया के सारे सुख एवं भोग इसे प्राप्त थे, किंतु पुत्र न था । पुत्रप्राप्ति के लिये इसने पुत्रकामेष्टि यज्ञ भी किया, किंतु कुछ लाभ न हुआ । अंत में यह अपनी दोनों पत्नियों के साथ चंडकौशिक नामक मुनि के पास गया, एवं अनेक प्रकार के रत्नों से इसने उसे संतुष्ट किया । पश्चात् ऋषि ने इसे बन में आने का कारण पूछने पर, इसने अपनी निपुत्रिक अवस्था उसे कथन की । पुत्रप्राप्ति के लिये चंडकौशिक मुनि ने इसे आम का फल दिया, एवं उसे अपने दो पत्नियों को समविभाग में देने के लिये कहा । ऋषि के आदेशानुसार राजा ने वह फल दो भागों में विभक्त कर के, एक एक भाग पत्नियों को खिलाया । पश्चात् दोनों को गर्भ रहा । प्रसवकाल आने पर दोनों के गर्भ से शरीर का आधाआधा भाग उत्पन्न हुआ । उन दो टुकडो को रानियों ने बाहर फेंक दिया । जरा नामक राक्षसी ने उन दोनों टुकडों को जोड दिया, जिससे एक बलवान् कुमार सजीव हो उठा । राक्षसी ने वह बालक राजा को अर्पित कर दिया । राजा उस बालक को ले कर महले में आया । इसने बालक का जातकर्म आदि किया, एवं उसका नाम जरासंध रखा गया । पश्चात् इसने मगध देश में राक्षसीपूजन का महान् उत्सव मनाने की आज्ञा दी [म.स.१६-१७] । जरासंध बडा होने पर, इसने उसे अपने राज्य पर अभिषिक्त किया, एवं अपनी दोनों पत्नियों के साथ वह तपोवन चला गया [म.स.१७.२५] । इसने ऋषभ नामक राक्षस का वध कर के उसकी खाल से तीन नगाडे बनवाये थे, जिनपर चोट करने से महिने भर आवाज होती रहती थी । ये नगाडे इसने अपनी गिरिव्रज नामक राजधानी के महाद्वार प रखे थे [म.स.१९.२५-१६] । बृहद्रथ राजा को ‘बार्हद्रथ’ राजवंश का आद्य पुरुष माना जाता है । इसीसे आगे चल कर उस वंश का विस्तार हुआ (बार्हद्रथ देखिये) । 
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