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तृतीयाः पाद: - सूत्र २७,२८

ब्रह्मसूत्र वरील हा टीका ग्रंथ आहे. ब्रह्मसूत्र ग्रंथात एकंदर चार अध्याय आहेत.


सूत्र २७,२८
तथा च दर्शयति ॥२७॥

तथा च दर्शयति ।
ह्रदययतनत्वमणुपरिमाणत्वं चात्मनोऽभिधाय तस्यैवालोमभ्य आ नखाग्रेभ्य इति चैतन्येन गुणेन समस्तशरीरव्यापित्वं दर्शयति ॥२७॥


पृथगुपदेशात् ॥२८॥

पृथगुपदेशात् ॥ प्रज्ञया शरीरं समारुहयेति चात्मप्रज्ञयो: कर्तृकरणभावेन पृथगुपदेशाच्चैतन्यगुणेनैवास्य शरीरव्यापिताऽवगम्यते ।
तदेषां प्राणानां विज्ञानेन विज्ञानमादायेति च कुर्तु: शरीरात्पृथग्विज्ञानस्योपदेश एतमेवाभिप्रायमुपोद्वलयति ।
तस्मादणुरात्मेत्येवं प्राप्ते ब्रूम: ॥२८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2014-12-10T05:03:21.8330000

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महानंदा

  • n. एक वेश्या, जो परम शिवभक्त थी । इसके पास एक बन्दर तथा एक मुर्गा था, जिन्हे यह रुद्राक्षों से सजाये रहती थी । जब यह शिव की भक्तिभावना में भजन करती हुयी उसीमें तल्लीन रहती, तब बंदर तथा मुर्गा इसके साथ नृत्य किया करते थे । 
  • शिव से भेंट n. एक बार भगवान् शंकर एक वैश्य का रुप धारण कर, इसकी परीक्षा लेने के लिए स्वयं आये । वैश्यरुपधारी शंकर के पास एक रत्नकंकण था, जिसे देख कर महानंदा की इच्छा उसे प्राप्त करने की हुयी । वैश्य ने इससे कहा कि, वह रत्नकंकण तो दे सकता हैं पर उसकी मूल्य यह क्या देगी? तब महानंदी ने कहा, ‘इस कंकण को प्राप्त करने के लिए, मैं आपके पास तीन दिन पत्नीरुप में रह सकती हूँ’। वैश्यने कंकण और रत्नमय लिंग इसको रखने को दिया, और उसके बदले इसे तीन दिन तक पत्नीरुप में स्वीकार किया । एक रात को आग लगने के कारण, वह रत्नमय लिंग जल गया, जिससे दुखित होकर वैश्य प्राण देने को उद्यत हुआ । महानंदा ने जब देखा कि, वह देहत्याग के लिए उद्यत है, तो यह भी उसके साथ सती होने को तैयार हुई । क्योंकि, इन तीन दिनों में, शर्त के अनुसार यह उसकी पत्नी थी, तथा पत्नी होने के कारण इसे पत्नीधर्म निबाहना जरुरी था । महानंदा की कर्तव्यभावना देखकर शंकर प्रसन्न हुए, एवं दर्शन दे कर इसके समस्त पापों का हरण किया [शिव.शत.२६] । महानंदा के सम्मुख प्रगट हुए शिव के इस अवतार को ‘वैश्यश्वर’ कहते हैं । 
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Category : Hindu - Traditions
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