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प्रथम: पाद: - सूत्र २

ब्रह्मसूत्र वरील हा टीकाग्रंथ आहे. ब्रह्मसूत्र ग्रंथात एकंदर चार अध्याय आहेत.


सूत्र २
इतरेषां चानुपलब्धे: ॥२॥

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: ।
तत्र को मोह: क: शोक एकत्वमनुपश्यत इत्येवंविधा ।

अततश्चात्मभेदकल्पनयपि कापिलस्य तन्त्रं वेदविरुद्धं वेदानुसारिमनुवचनविरुद्धं च ।
न केवलं स्वतन्त्रप्रकृतिकल्पनयैवेति वेदस्य हि निरपेक्षं स्वार्थे प्रामाण्यं रवेरिव रूपविषये पुरुषवचसां तु मूलान्तरापेक्षं वक्तृस्मृतिव्यवहितं चेति विप्रकर्ष: ।
तस्माद्वेदविरुद्धे विषये स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोष: ॥१॥
कुतश्च स्मृत्यनवकाशप्रसङ्गो न दोष: ।

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2014-12-05T20:03:14.3100000

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दक्ष (प्राचेतस प्रजापति)

  • n. एक ऋषि । प्राचीनबर्हिपुत्र प्रचेतस् एवं कंडुकन्या मारिषा का यह पुत्र था । सवर्णा नामक समुद्रकन्या को प्राचीनबर्हि से प्रचेतस् नामक दस पुत्र हुएँ । उनके तप करते समय, पृथ्वी पर अनेक जातियों के वृक्ष बढे । अत्यधिक वृक्षवृद्धि के कारण, पृथ्वी जंगलमय हो गई । अनाज का उत्पादन बंद हो गया । इससे क्रुद्ध हो कर वे दस प्रचेतस्, वृक्षों का नाश करने लगे । तब वृक्षों के राजा सोम ने उनसे कहा, ‘संपूर्ण पृथ्वी अब वृक्षशून्य हो गई है । अब वृक्षों का नाश बंद कीजिये’ । पश्चात् कंडु की कन्या मारिषा से प्रचेतस् का विवाह हुआ । सोम का आधा तेज तथा प्रचेतस् का आधा तेज मिल कर, इसे दक्ष नामक तेजस्वी पुत्र हुआ । यही प्राचेतस दक्ष प्रजापति है [ह.वं.१.२];[ म.आ.७०];[ भा.४. ३०,६.४];[ ब्रह्म.२.३४,३९-४०];[ विष्णु.१.१४.१५] । दक्ष ने अपने वीर्य के द्वारा, एवं मन के द्वारा सृष्टि का निर्माण किया । मानससृष्टि से प्रजासृष्टि वृद्धिंगत नहीं हुई । इसलिये विंध्याचल के समीप के अघमर्षणतीर्थ में इसने तपस्या की । इस तपस्या से प्रसन्न हो कर, श्रीहरि ने पंचजन प्रजापति की कन्या असिक्नि (वीरिणी) भार्या रुप में इसे दी, एवं प्रजावृद्धि करने के लिये इसे कहा । उस स्त्री से इसे हर्यश्व नामक दस हजार पुत्र हुएँ । दक्ष ने उन्हें प्रजा निर्माण करने के लिये कहा । परन्तु नारद की सलाह के अनुसार, उन्होंने यह कार्य नहीं किया । बाद में नारद के कहने पर, ब्रह्मदेव ने दक्ष को समझाया । तब इसने पुनः साठ कन्याएँ निर्माण की [भा.६.४-६] । प्राचेतस दक्ष को इस के समान गुणशील संपन्न एक हजार पुत्र हुएँ । उन्हें नारद ने ‘मोक्षशास्त्र’ एवं ‘सांख्यज्ञान’ का उपदेश दे दिया । इस उपदेश से वे विरक्त हो कर, घर से निकल गएँ । तब इसने ‘पुत्रिकाधर्म’ के अनुसार, दौहित्रों को अपना पुत्र मानने का संकल्प किया, एवं उस कार्य के लिये पचास कन्याएँ उत्पन्न कीं [म.आदि.७५.६-८] । उनमें से धर्म दो दस, कश्यप को तेरह, चन्द्र को सत्ताईस, भूत अंगिरस् तथा कृशाश्व, इनको प्रत्येक को दो दो, तथा तार्क्ष्य नामक कश्यप को चार कन्याएँ इसने विवाह में दे दी [भा.६.४-६] । अन्य स्थान पर दिया है कि, असिक्नी वीरण प्रजापति की कन्या थीं, जिससे दक्ष को पॉंच हजार पुत्र हुएँ [ब्रह्मांड.३.२.५] । वीरिणी अथा असिक्नी एक ही है । हरिवंश तथा विष्णुपुराण में, दक्षकन्याओं का विभाजन कुछ भिन्न है । उन ग्रंथों में, इसकी कन्याओं की संख्या साठ दी गई है । उनमें से धर्म को, दस, कश्यप को तेरह, सोम को सत्ताईस, अरिष्टनेमि को चार, भृगृपुत्र को दो, अंगिरस को दो, इसने विवाह में देने का निर्देश है [ह.वं.१.३];[ विष्णु१.१५] । दक्ष को सुव्रत नामक एक कन्या और थी । उसे दक्ष, ब्रह्म, धर्म, तथा रुद्र नामक चार पुत्र हुएँ । उन चार पुत्रों में से चार मनु उत्पन्न हुएँ, जिनके वर्ण से पुत्रत्व तय होने के कारण, उन्हें सावर्णि कहते हैं [वायु. १००.४२] । दक्ष के पहले, संकल्प, दर्शन, एवं स्पर्श से संतति निर्माण होती थी । दक्ष के पश्चात् मैथुन से संतति-निर्मिति होने लगी [मत्स्य. ५.२] । सृष्टि-निर्माण का क्रम दक्ष के चरित्र में दिया है । सृष्टिनिर्माणशास्त्र पर यह कथा प्रकाश डालती है । 
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Category : Hindu - Traditions
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