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श्री वल्ल्याष्टोत्तरशतनामावलिः

श्री वल्ल्याष्टोत्तरशतनामावलिः

अष्टोत्तरशतनामावलिः म्हणजे देवी देवतांची एकशे आठ नावे, जी जप करताना म्हणावयाची असतात. नावे घेताना १०८ मण्यांची जपमाळ वापरतात.
Ashtottara shatanamavali means 108 names of almighty God and Godess.


श्री वल्ल्याष्टोत्तरशतनामावलिः
ॐ वल्ल्यै नमः ॥
ॐ वन्द्यायै नमः ॥
ॐ वनवासायै नमः ॥
ॐ वरलक्ष्म्यै नमः ॥
ॐ वरप्रदायै नमः ॥
ॐ वाणीस्तुतायै नमः ॥
ॐ वीतमोहायै नमः ॥
ॐ वामदेवसुतप्रियायै नमः ॥
ॐ वैकुण्ठतनयायै नमः ॥
ॐ वर्यायै नमः ॥
ॐ वनेचरसमादृतायै नमः ॥
ॐ दयापूर्णायै नमः ॥
ॐ दिव्यरूपायै नमः ॥
ॐ दारिद्र्यभयनाशिन्यै नमः ॥
ॐ देवस्तुतायै नमः ॥
ॐ दैत्यहन्त्र्यै नमः ॥
ॐ दोषहीनायै नमः ॥
ॐ दयाम्बुधये नमः ॥
ॐ दुःखहन्त्र्यै नमः ॥
ॐ दुष्टदूरायै नमः ॥
ॐ दुरितघ्न्यै नमः ॥
ॐ दुरासदायै नमः ॥
ॐ नाशहीनायै नमः ॥
ॐ नागनुतायै नमः ॥
ॐ नारदस्तुतवैभवायै नमः ॥
ॐ लवलीकुञ्जसम्भूतायै नमः ॥
ॐ ललितायै नमः ॥
ॐ ललनोत्तमायै नमः ॥
ॐ शान्तदोषायै नमः ॥
ॐ शर्मदात्र्यै नमः ॥
ॐ शरजन्मकुटुम्बिन्यै नमः ॥
ॐ पद्मिन्यै नमः ॥
ॐ पद्मवदनायै नमः ॥
ॐ पद्मनाभसुतायै नमः ॥
ॐ परायै नमः ॥
ॐ पूर्णरूपायै नमः ॥
ॐ पुण्यशीलायै नमः ॥
ॐ प्रियङ्गुवनपालिन्यै नमः ॥
ॐ सुन्दर्यै नमः ॥
ॐ सुरसंस्तुतायै नमः ॥
ॐ सुब्रह्मण्यकुटुम्बिन्यै नमः ॥
ॐ मायायै नमः ॥
ॐ मनोहरायै नमः ॥
ॐ मान्यायै नमः ॥
ॐ महेश्वरसुतप्रियायै नमः ॥
ॐ कुमार्यै नमः ॥
ॐ करुणापूर्णायै नमः ॥
ॐ कार्तिकेयमनोहरायै नमः ॥
ॐ पद्मनेत्रायै नमः ॥
ॐ परानन्दायै नमः ॥
ॐ पार्वतीसुतवल्लभायै नमः ॥
ॐ महादेव्यै नमः ॥
ॐ महामायायै नमः ॥
ॐ मल्लिकाकुसुमप्रियायै नमः ॥
ॐ चन्द्रवक्त्रायै नमः ॥
ॐ चारुरूपायै नमः ॥
ॐ चाम्पेयकुसुमप्रियायै नमः ॥
ॐ गिरिवासायै नमः ॥
ॐ गुणनिधये नमः ॥
ॐ गतावन्यायै नमः ॥
ॐ गुहप्रियायै नमः ॥
ॐ कलिहीनायै नमः ॥
ॐ कलारूपायै नमः ॥
ॐ कृत्तिकासुतकामिन्यै नमः ॥
ॐ गतदोषायै नमः ॥
ॐ गीतगुणायै नमः ॥
ॐ गङ्गाधरसुतप्रियायै नमः ॥
ॐ भद्ररूपायै नमः ॥
ॐ भगवत्यै नमः ॥
ॐ भाग्यदायै नमः ॥
ॐ भवहारिण्यै नमः ॥
ॐ भवहीनायै नमः ॥
ॐ भव्यदेहायै नमः ॥
ॐ भवात्मजमनोहरायै नमः ॥
ॐ सौम्यायै नमः ॥
ॐ सर्वेश्वर्यै नमः ॥
ॐ सत्यायै नमः ॥
ॐ साध्व्यै नमः ॥
ॐ सिद्धसमर्चितायै नमः ॥
ॐ हानिहीनायै नमः ॥
ॐ हरिसुतायै नमः ॥
ॐ हरसूनुमनःप्रियायै नमः ॥
ॐ कल्याण्यै नमः ॥
ॐ कमलायै नमः ॥
ॐ कल्यायै नमः ॥
ॐ कुमारसुमनोहरायै नमः ॥
ॐ जनिहीनायै नमः ॥
ॐ जन्महन्त्र्यै नमः ॥
ॐ जनार्दनसुतायै नमः ॥
ॐ जयायै नमः ॥
ॐ रमायै नमः ॥
ॐ रामायै नमः ॥
ॐ रम्यरूपायै नमः ॥
ॐ राज्ञ्यै नमः ॥
ॐ राजरवादृतायै नमः ॥
ॐ नीतिज्ञायै नमः ॥
ॐ निर्मलायै नमः ॥
ॐ नित्यायै नमः ॥
ॐ नीलकण्ठसुतप्रियायै नमः ॥
ॐ शिवरूपायै नमः ॥
ॐ शताकरायै नमः ॥
ॐ शिखिवाहनवल्लभायै नमः ॥
ॐ व्याधात्मजायै नमः ॥
ॐ व्याधिहन्त्र्यै नमः ॥
ॐ विविधागमसंस्तुतायै नमः ॥
ॐ हर्षदात्र्यै नमः ॥
ॐ हरिभवायै नमः ॥
ॐ हरसूनुप्रियायै नमः ॥
॥इति श्री वल्ल्याष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:51:06.5370000

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वीरभद्र

  • n. एक शिवपार्षद, जो शिव के क्रोध से उत्पन्न हुआ था । 
  • दक्षयज्ञप्रसंगीं दक्षास मारण्याकरितां शंकरानें उत्पन्न केलेला वीर मानसपुत्र. यावरुन अत्यंत भेसूर स्वरुपाचा, दुराग्रही व नाशकारक मनुष्य. 
  • जन्म n. स्वायंभुव मन्वंतर में दक्ष प्रजापति के द्वारा किये गये यज्ञ में शिव का अपमान हुआ। इस अपमान के कारण क्रुद्ध हुए शिव ने अपने जटाओं को झटक कर, इसका निर्माण किया [भा. ४.५];[ स्कंद. १.१-३];[ शिव. रुद्र. ३२] । इसके जन्म के संबंध में विभिन्न कथाएँ पद्म एवं महाभारत में प्राप्त है । क्रुद्ध हुए शिव के मस्तक से पसीने का जो बूँद भूमि पर गिरा, उसीसे ही यह निर्माण हुआ [पद्म. सृ. २४] । यह शिव के मुँह से उत्पन्न हुआ था [म. शां. २७४. परि.१. क्र. २८. पंक्ति ७०-८०];[ वायु. ३०.१२२] । भविष्य में स्वयं शिव ही वीरभद्र बनने की कथा प्राप्त है [भवि. प्रति. ४.१०] 
  • दक्षयज्ञविध्वंस n. उत्पन्न होते ही इसने शिव से प्रार्थना की, ‘मेरे लायक कोई सेवा आप बताइये’। इस पर शिव ने इसे दक्षयज्ञ का विध्वंस करने की आज्ञा दी। इस आज्ञा के अनुसार, यह कालिका एवं अन्य रुद्रगणों को साथ ले कर दक्षयज्ञ के स्थान पर पहुँच गया, एवं इसने दक्षपक्षीय देवतागणों से घमासान युद्ध प्रारंभ किया। रुद्र के वरप्रसाद से इसने समस्त देवपक्ष के योद्धाओं को परास्त किया। तदुपरांत इसने यज्ञ में उपस्थित ऋषियों में से, भृगु ऋषि की दाढी एवं मूँछे उखाड़ दी, भग की आँखे निकाल ली, पूषन् के दॉंत तोड़ दिये। पश्र्चात् इसने दक्ष प्रजापति का सिर खङ्ग से तोड़ना चाहा। किंतु वह न टूटने पर, इसने धूँसे मार कर उसे कटवा दिया, एवं वह उसीके ही यज्ञकुंड में झोंक दिया। तत्पश्र्चात् यह कैलासपर्वत पर शिव से मिलने चला गया [भा. ४.५];[ म. शां. परि. १. क्र. २८];[ पद्म. सृ. २४];[ स्कंद. १.१.३-५];[ कालि. १७];[ शिव. रुद्र. स. ३२.३७] । भविष्य के अनुसार, दक्षयज्ञविध्वंस के समय दक्ष एवं यज्ञ मृग का रूप धारण कर भाग रहे थे । उस समय वीरभद्र ने व्याध का रूप धारण कर उनका वध किया, एवं एक ठोकर मार कर दक्ष का सिर अग्निकुंड में झोंक दिया [भवि. प्रति. ४.१०];[ लिंग. १.१६];[ वायु. ३०] । इसने अपने रोमकुपों से ‘रौम्य’ नामक गणेश्र्वर निर्माण किये थे [म. शां. परि. १.२८] 
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