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महानारायणोपनिषत् - अनुवाकः ३१ ते ४०

आपल्या प्राचीन वाङ्मयामध्ये उपनिषदांना फार महत्त्वाचे, म्हणजे प्रस्थानत्रयी मधील एक, असे स्थान आहे.
Upanishad are highly philosophical and metaphysical part of Vedas. Being the conclusive part of Vedas, Upanishad can be called the whole substance of Vedic


अनुवाकः ३१-४०
एकत्रिंशोऽनुवाकः ।
अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः । पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यदह्ना पापमकार्षम् । मनसा वाचा हस्ताभ्याम् । पद्भ्यामुदरेण शिश्ना । अहस्तदवलिम्पतु । यत्किञ्च दुरितं मयि । इदमहं माममृतयोनी । सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा ॥१॥
द्वात्रिंशोऽनुवाकः ।
सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः । पापेभ्यो रक्षन्ताम् । यद्रात्रिया पापमकार्षम् । मनसा वाचा हस्ताभ्याम् । पद्भ्यामुदरेण शिश्ना । रात्रिस्तदवलुम्पतु । यत्किञ्च दुरितं मयि । इअदमहं माममृतयोनी । सूर्ये ज्योतिषि स्वाहा ॥१॥
त्रयस्त्रिंशोऽनुवाकः ।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म । अग्निर्देवता ब्रह्म इत्यार्षम् । गायत्रं छन्दं परमात्मं सरूपम् । सायुज्यं विनियोगम् ॥१॥
चतुस्त्रिंशोऽनुवाकः ।
आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्म संमितम् । गायत्री छन्दसां मातेदं ब्रह्म जुषस्व नः ॥१॥ यदह्नात्कुरुते पापं तदह्नात्प्रतिमुच्यते । यद्रात्रियात्कुरुते पापं तद्रात्रियात्प्रतिमुच्यते । सर्ववर्णे महादेवि सन्ध्याविद्ये सरस्वति ॥२॥
पञ्चत्रिंशोऽनुवाकः ।
ओजोऽसि सहोऽसि बलमसि भ्राजोऽसि देवानां धामनामासि विश्वमसि विश्वायुअः सर्वमसि सर्वायुरभिभूरों गायत्रीमावाहयामि सावित्रीमावाहयामि सरस्वतीमावाहयामि छन्दर्हीनावाहयामि श्रियमावाहयामि गायत्रिया गायत्री छन्दो विश्वामित्र ऋषिः सविता देवताग्निर्मुखं ब्रह्मा शिरो विष्णुहृदयँ रुद्रः शिखा पृथिवी योनिः प्राणापानव्यानोदानस्माना सप्राणा श्वेतवर्णा सांख्यायनसगोत्रा गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा त्रिपदा ष्ट्कुक्षिः पञ्चशीर्षोपनयने विनियोगः ॥१॥ ॐ भूः । ॐ भुवः । ओँसुवः । ॐ महः । ॐ जनः । ॐ तपः । ओँ सत्यम् । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ओमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरोम् ॥२॥
षट्त्रिंशोऽनुवाकः ।
उत्तमे शिखरे देवि जाते भूम्यां पर्वतमूर्धनि । ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम् ॥१॥ स्तुतो मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ती पवने द्विजाता । आयुः पृथिव्यां द्रविणं ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्वा प्रजातुं ब्रह्मलोकम् ॥२॥
सप्तत्रिंशोऽनुवाकः ।
घृणिः सूर्य आदित्यो न प्रभा वात्यक्षरम् । मधु क्षरन्ति तद्रसम् । सत्यं वै तद्रसमापो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरोम् ॥१॥ त्रिसुपर्णमन्त्रः १
अष्टत्रिंशोऽनुवाकः ।
ब्रह्ममेतु माम् । मधुमेतु माम् । ब्रह्ममेव मधुमेतु माम् । यास्ते सोम प्रजा वत्सोऽभि सो अहम् । दुःष्वप्नहन् दुरुष्षह । यास्ते सोम प्राणाँस्ताञ्जुहोमि ॥१॥ त्रिसुपर्णमयाचितं ब्राह्मणाय दद्यात् । ब्रह्महत्यां वा एते घ्नन्ति । ये ब्राह्मणास्त्रिसुपर्णं पठन्ति । ते सोमं प्राप्नुवन्ति । आ सहस्रात् पङ्क्तिं पुनन्ति । ॐ ॥२॥ त्रिसुपर्णमन्त्रः २
एकोनचत्वारिंशोऽनुवाकः ।
ब्रह्म मेधया । मधु मेधया । ब्रह्ममेव मधुमेधया ॥१॥ अद्यानो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्नियँ सुव ॥२॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन्मम आसुव ॥३॥ मधुवाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः ॥४॥ मधु नक्तमुतोषसि मधुमत्पार्थिवँ रजः । मधुद्यौरस्तु नः पिता ॥५॥ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ अस्तु सूर्यः । माध्वीर्गावो भवन्तु नः ॥६॥ य इमं त्रिसुपर्णमयाचितं ब्राह्मणाय दद्यात् । भ्रूणहत्यां वा एते घ्नन्ति । ये ब्राह्मणास्त्रिसुपर्णं पठन्ति । ते सोमं प्राप्नुवन्ति । आ सहस्रात्पङ्क्तिं पुनन्ति । ॐ ॥७॥ त्रिसुपर्णमन्त्रः ३
चत्वारिंशोऽनुवाकः ।
ब्रह्म मेधवा । मधु मेधवा । ब्रह्ममेव मधु मेधवा ॥१॥ ब्रह्मा देवानां पदवीः कवीनामृषिर्विप्राणां महिषो मृगाणाम् । श्येनो गृद्धाणाँ स्वधितिर्वनानाँ सोमः पवित्रमत्येति रेभत् ॥२॥ हँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥३॥ ऋचे त्वा ऋचे त्वा समित्स्रवन्ति सरितो न धेनाः । अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः । घृतस्य धारा अभिचाकशीमि ॥४॥ हिरण्ययो वेतसो मध्य आसाम् । तस्मिन्त्सुपर्णो मधुकृत् कुलायी भजन्नास्ते मधु देवताभ्यः । तस्यासते हरयः सप्त तीरे स्वधां दुहाना अमृतस्य धाराम् ॥५॥ य इदं त्रिसुपर्णमयाचितं ब्राह्मणाय दद्यात् । वीरहत्यां वा एते घ्नन्ति । ये ब्राह्मणास्त्रिसुपर्णं पठन्ति । ते सोमं प्राप्नुवन्ति । आसहस्रात् पङ्क्तिं पुनन्ति । ॐ ॥६॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T12:47:04.9030000

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अहिरावण-महिरावण

  • n. पाताल में, अहिरावण तथा महिरावण नामक रावण के दो मित्र थे । इन्हें रावण ने राम का नाश करने के लिये कहा । परंतु सुवेल पर्वत पर राम की संपूर्ण सेना अभेद्य दीवार के भीतर होने के कारण, इन्होंने आकाश से शिबिर में छलॉंग लगाई । पश्चात्, शिला पर सुप्त रामलक्ष्मण को यह शिलासहित पाताल में ले गये । परंतु हनुमान इनका पीछा करते निकुंभिला नगर आया । कपोत कपोती के संवाद से हनुमान को पता चला कि, दैत्य रामलक्ष्मण को देवी के सामने बलि देने के लिये रसातल में ले गये हैं । उधर जाते समय, हनुमान को द्वार पर मकरध्वज मिला । प्रश्नोत्तर में, दोनों का पितापुत्र का नाता निकला (मकरध्वज देखिये) । मकरध्वज ने हनुमान को सुझाया कि, कामाक्षी कें मंदिर में जा कर बैठ जावे तथा कार्य किया जावे । सुबह वाद्यों की ध्वनि में राक्षस रामलक्ष्मण को वहॉं ले कर आये । तब देवी का स्वर निकाल कर हनुमान ने उन्हें कहा कि, पूजा झरोखे से की जावे । उसके अनुसार, राक्षसों ने देवी को बहुत से उपचार अर्पण किये, तथा रामलक्ष्मण को भी झरोखे से भीतर छोडा । तदनंतर तीनों ने मिल कर, राक्षसों का संहार शुरु किया । परंतु अहिरावण-महिरावण के लहू से, पुनः वैसे ही राक्षस निर्माण होने लगे । तब हनुमान ने अहिरावण की पत्नी को इसे मारने का उपाय पूछा । वह बोली कि, मैं नागकन्या हूँ । इस दुष्ट ने बलात्कार से मुझे यहॉं लाया । महिरावण भी मुझ पर लुब्ध है । परंतु मैं उसके अनुकूल नही होती । इतना कह कर उसने कहा कि, यदि राम मुझसे विवाह करेगा, तो मैं उपाय बताती हूँ । हनुमान ने कहा कि, राम के भार से अगर तुम्हारा मंचक नहीं टूटा, तो राम तुम से विवाह कर लेंगे । तब उसने बताया कि, पहले जब कुछ लडके भ्रमरी को कॉंटे चुभा रहे थे, तब उन्हें इन दोनों भाईयों ने मुक्त किया । इस लिये प्रत्युपकार करने के हेतु, वे भ्रमर अमृत बिंदुओंसे इन दोनों को जीवित करते रहते हैं । इस लिये तुम भ्रमरों को मार डालो । अभी वे सब राक्षसों के निद्रास्थान में हैं । यह मालूम होते ही, हनुमान ने असंख्य भ्रमर मार डाले । एक भ्रमर उसे शरण आया । उसे प्राणदान दे कर, हनुमान ने उसे अहिरावण की पत्नी का मंचक भीतर से खोखला करने के लिये कहा, तथा स्वयं राम के पास गया । इतने में राम के बाण से सब राक्षसों की मृत्यु हो गई । तदनंतर हनुमान के आग्रह पर, राम नागकन्या के मंदिर में गया, तथा पर्यक को हॉंथ लगाते ही वह टूट जाने के कारण, उसे तीसरे जन्म में पत्नी बनाने का आश्वासन दे कर दोनों सुवेल पर लौट आये । रामवचन पर विश्वास रख कर, अहिरावण की पत्नी ने अग्नी में देहत्याग किया [आप. आ. सार.११] 
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Category : Hindu - Puja Vidhi
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