गोचरप्रकरणम्‌ - श्लोक २६ ते ३७

अनुष्ठानप्रकाश , गौडियश्राद्धप्रकाश , जलाशयोत्सर्गप्रकाश , नित्यकर्मप्रयोगमाला , व्रतोद्यानप्रकाश , संस्कारप्रकाश हे सुद्धां ग्रंथ मुहूर्तासाठी अभासता येतात .


अथावश्यके दुष्टतारासु दानम्‌ । लवणैर्युवतिप्रतिमामभिनवशूर्पोदरे समालिख्य । तरादोषोपशमनाय हिताय दद्याद्विशुद्धये मर्त्यु : ॥ एकत्रिपंचसप्त द्विजाय दद्यात्पलानि लवणस्य । क्रमशश्व जन्म विपदि प्रत्यरिमरणाख्यतारासु ॥२६॥

सप्तम्यां तारकायां च दद्यात्स्वर्णं तिलानपि । मुडं तृतीयतारायां पंचम्यां लवणं तथा । दोषापनुत्तये तासां दद्याच्छाकं त्रिजन्मसु ॥ अथ गोचरवर्षदशा । जन्मना विंशति : २० सूर्ये तृतीये दश १० चन्द्रमा : । चतुर्थें भौमचाष्टौ च षष्ठे बुधचतुर्थेंकम्‌ ॥२७॥

सप्तम दश सौरि : स्पान्नवमे चाष्टमं गुरो : दशमें राहुविंशत्या तदूर्ध्वं तु भृगोर्दशा ॥२८॥

अथ दिनसंख्या । गविदिननख २० संख्य चन्द्रमा व्योमबाणै : ५० क्षितितनयगजाश्वी २८ चन्द्रज : षट शराश्च ५६। शनिरसगुण ३६ संख्या वाक्पतिर्नागबाणे ५८ र्नयनयुगक ४२ राहु : सप्तति : ७० शुक्रमख्य ॥२९॥

अथ दशाफलम्‌ । पन्था भोगोऽनुतापश्च सौख्यं पीडा धनं क्रमात्‌ । नाश : शोकश्च सौख्यं च जन्मसूर्यदशाफलम्‌ ॥३०॥

( आवश्यक कार्यमें दुष्ट ताराका दान ) लवण ( निमक ) की १ स्त्री बनावे और शूर्फ ( छाजला ) में स्थापन करके दान करे तो ताराका दोष नहीं हो परन्तु जन्म , विपत्‌ , प्रत्यरि , वध , इन चार ताराओंमें तो एक १ तीन ३ पांच ५ सात ७ पल निमक क्रमसे देवे ( पल चार ४ तोलाका होता है ) ॥२६॥

और वध तारामें सुवर्ण , तिल भी देवे तथा विपत्‌ तारामें गुडका दान करे और तीसरी ३ पहली १ तारामें शाक देना भी लिखा है ॥ ( गोचंरदशाविचार ) जन्मके १ सूर्यके बीस २० दिनतक सूर्यकी दशा और तीसरे सूर्यके १० दिनतक चंद्रमाकी दशा , चौथे सूर्यके ८ दिन तक मंगलकी दशा और छठे सूर्यके ४ दिनतक बुधकी दशा जाननी ॥२७॥

सातव सूर्यके १० दिनतक शनैश्वरकी दशा , नोंवें सूर्यके ८ दिनतक गुरुकी दशा , दशवें सूर्य्के २० दिनतक राहुकी दशा और बारहवें सूर्यके सम्पूर्ण दिनतक शुक्रदशा रहती है ॥२८॥

( दशादिनसंख्या ) रविकी दशा २० दिन , और चंद्रमाकी ५० दिन , मंगलकी २८ दिन , बुधकी ५६ दिन , शनिकी ३६ दिन , गुरुकी ५८ दिन , राहुकी ४२ दिन , तथा शुक्रकी ७० दिन दशा भोगती है ॥२९॥

( दशाफल ) गमन , भोग , क्लेश , सुख , पीडा , धन , नाश , शोक , सुख क्रमसे जन्मके सूर्य आदि पूर्वोक्त दशामें फल जानना ॥३०॥

अथ दिनदशाप्रकार : । तिथिर्वारं च नक्षत्रं नामाक्षरसमन्चितम्‌ नवभिश्च हरेद्भागं शेष दिनदशोच्यते ॥३१॥

रविचन्द्रा भौमराहू गुरुमन्दज्ञकेसिता : । क्रमेणैता दशा ज्ञेया : फलं पूर्वोक्तमेव हि ॥३२॥

अथ शनैश्चरफले विशेष : । शनिचक्र नराकारं लिखेद्यत्र शनिर्भंवेत्‌ । तन्नक्षत्रं मुखे दत्त्वा यावन्नाम नरस्य च ॥३३॥

तावद्विचारयेत्तत्र ज्ञेयं शुभमथाशुभम्‌ । एकं १ मुखे च नक्षत्रं चत्वारि ४ दक्षिणे करे ॥३४॥

त्रयं ३ पादयोश्च वामहस्ते चतृष्टयम्‌ ४ । ह्रदि पंच ५ त्रयं ३ मौलौ नेत्रे गुहो द्वयं द्वयम्‌ २ ॥३५॥

हानिरास्ये करे दक्षे लाभो वामे च रोगिता । हृदि श्रीर्मस्तके राज्यं पादे पर्यटनं तथा ॥३६॥

नेत्रे सुखं गुदे मृत्यु : शनिचक्रं विचारयेत्‌ । जपपृजाद्विजार्च्चाभि : कल्याणं जायते सदा ॥३७॥

( दिनदशाप्रकार ) तिथि , वार , नक्षत्र और पृछनेवालेके नामके अक्षर मिलावे , फिर नौ ९ का भाग देवे शेष अंक बचे सो ही क्रमसे दिनदशा जानना अर्थात्‌ १ बचे तो सूर्यकी , २ चन्द्र , ३ मंगल , ४ राहु , ५ गुरु , ६ शनि , ७ बुध , ८ केतु , ९ बचे तो शुक्रकी दशा जाननी और फल पूर्व कहे हुए माफिक जानना ॥३१॥३२॥

( शनिका विशेष फल ) मनुष्यके आकारका शनिचक्र लिखे और जिस नक्षत्रपर शनि हो उस नक्षत्रको मुखमें लिखे फिर पृच्छक मनुष्यका नक्षत्र पर्यन्त क्रमसे लिखता जावे और शुभाशुमका विचार करे अर्थात्‌ एक १ नक्षत्र मुखमें देवेचार ४ दाहिने हाथमें , तीन ३ तीन ३ दोनों पगोंमें , और चार ४ बायें हाथमें पांच ५ ह्रदयमें , फिर तीन ३ मस्तकमें , दो २ नेत्रोंमें , दो २ गुह्यमें ( गुदामें ) लिखके फल देखे ॥३३॥३४॥३५॥

मुखमें नक्षत्र आवे तो हानि हो , दहिने हाथमें लाभ , वायें हाथमें रोग , ह्रदयमें श्री ( लक्ष्मी ), मस्तकमें राज्य , पगोंमें गमन , नेत्रमें सुख और गुदामें जन्मनक्षत्र हो तो मृत्यु होवे , इस तरह शनिचक्रका विचार है , यदि शनिका अशुभ फल हो तो जप . पूजा , ब्राह्मणभोजन , आदि करानेसे कल्याण और शांति होती है ॥३६॥३७॥

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Last Updated : November 11, 2016

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