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राजगुणाः

कात्यायनस्मृतिः - राजगुणाः

स्मृतिग्रंथ म्हणजे धर्मशास्त्रावरील एक आवश्यक वचनांचा भाग.


राजगुणाः
विनीतः शास्त्रसंपन्नः कोशशौर्यसमन्वितः ।
ब्रह्मण्यो दानशीलः स्यात्सत्यधर्मपरो नृपः ॥१॥

स्तम्भोपतापपैशुन्य चापलक्रोधवर्जितः ।
प्रगल्भः सन्नतोदग्रः संभाषी प्रियदर्शनः ॥२॥

वश्येन्द्रियं जितात्मानं धृतदण्डं विकारिषु ।
परीक्ष्यकारिणं धीरं अत्यन्तं श्रीर्निषेवते ॥३॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:55:24.9600000

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कुवलाश्व

  • n. (सू. इ.) बृहदश्व राजा का पुत्र । वन में जीत समय, बृहदश्व ने इसे उत्तकाश्रम को पीडा देने वाले, धुंधु नामक दैत्य का पारिपत्य करने के लिये कहा । तब उत्तंक को साथ ले कर यह धुंधु के निवासस्थान पर गया । धुंधु दैत्य उज्जालक नामक वालुकामय समुद्र के तल में, अपने अनुयायियोंसहित सोया था । तब कुवलाश्व ने अपने दृढाश्वादि सौ पुत्रों को-भागवत में पुत्रसंख्या २१००० दी गई है [भा.९.६] - उस वालुकामय सागर की वालुका हटाने के लिये कहा । संपूर्ण वालुका हटाने के बाद धुंधु बाहर आया । उस समय, उसके मुख से अग्नि की ज्वालायें निकल रही थी । उन ज्वालाओं से कुवलाश्व के दृढाश्व, कपिलाश्व तथा भद्राश्व को छोडकर अन्य सब पुत्र जल गये । अतः कुवलाश्व स्वयं धुंधु से लडने के लिये गया । तब विष्णु ने उत्तंक ऋषि को दिये वर के कारण अपना तेज कुवलाश्व के शरीर में डाला । तात्काल कुवलाश्व ने धुंधु का पराभव किया, तथा धुंधुमार नाम प्राप्त किया । कुवलाश्व के बाद दृढाश्व गद्दी पर बैठा [म.व.१९३];[ ह. वं. १.११];[ वायु. ८८];[ ब्रह्मांड. ३.६३.२९];[ ब्रह्म ७];[ भा.९.६];[ विष्णुधर्म. १.१६]; कुवलयाश्व देखिये । मार्कड मतानुसार कुवलाश्व शत्रुजित का पुत्र था (मदालसा देखिये) । 
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