दोहे - २५१ से ३००

रहीम मध्यकालीन सामंतवादी कवि होऊन गेले. रहीम यांचे व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न होते. तसेच ते सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिज्ञ, बहुभाषाविद, कलाप्रेमी, कवि शिवाय विद्वानसुद्धां होते.


यह न रहीम सराहिए, लेन देन की प्रीति ।
प्रानन बाजी राखिए, हार होय कै जीति ॥२५१॥

ये रहीम दर दर फिरहिं, मांगि मधुकरी खाहिं ।
यारो यारी छोड़िए, वे रहीम अब नाहिं ॥२५२॥

यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय ।
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नाय ॥२५३॥

रजपूती चांवर भरी, जो कदाच घटि जाय ।
कै रहीम मरिबो भलो, कै स्वदेस तजि जाय ॥२५४॥

यों रहीम सुख होत है, बढ़त देखि निज गोत ।
ज्यों बड़री अंखियां निरखि अंखियन को सुख होत ॥२५५॥

हित रहीम इतनैं करैं, जाकी जिती बिसात ।
नहिं यह रहै न व रहे, रहै कहन को बात ॥२५६॥

सबको सब कोऊ करैं, कै सलाम कै राम ।
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकै काम ॥२५७॥

रौल बिगाड़े राज नैं, मौल बिगाड़े माल ।
सनै सनै सरदार की, चुगल बिगाड़े चाल ॥२५८॥

रहिमन कहत स्वपेट सों, क्यों न भयो तू पीठ ।
रीते अनरीतैं करैं, भरै बिगारैं दीठ ॥२५९॥

होत कृपा जो बड़ेन की, सो कदापि घट जाय ।
तो रहीम मरिबो भलो, यह दुख सहो न जाय ॥२६०॥

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग ।
बाटन वारे को लगे, ज्यों मेहंदी को रंग ॥२६१॥

होय न जाकी छांह ढिग, फल रहीम अति दूर ।
बढ़िहू सो बिन काज की, तैसे तार खजूर ॥२६२॥

हरी हरी करुना करी, सुनी जो सब ना टेर ।
जग डग भरी उतावरी, हरी करी की बेर ॥२६३॥

अनकिन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय ।
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय ॥२६४॥

बिधना यह जिय जानिकै, सेसहि दिए न कान ।
धरा मेरु सब डोलिहैं, तानसेन के तान ॥२६५॥

एक उदर दो चोंच है, पंछी एक कुरंड ।
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड ॥२६६॥

जो रहीम गति दीप की, सुत सपूत की सोय ।
बड़ो उजेरो तेहि रहे, गए अंधेरो होय ॥२६७॥

चिंता बुद्धि परखिए, टोटे परख त्रियाहि ।
सगे कुबेला परखिए, ठाकुर गुनो किआहि ॥२६८॥

चाह गई चिन्ता मिटी, मनुआ बेपरवाह ।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह ॥२६९॥

जैसी जाकी बुद्धि है, तैसी कहै बनाय ।
ताको बुरा न मानिए, लेन कहां सो जाय ॥२७०॥

खैंचि चढ़नि ढीली ढरनि, कहहु कौन यह प्रीति ।
आजकाल मोहन गही, बसंदिया की रीति ॥२७१॥

कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम ।
काकी महिमा नहीं घटी, पर घर गए रहीम ॥२७२॥

जो रहीम जग मारियो, नैन बान की चोट ।
भगत भगत कोउ बचि गए, चरन कमल की ओट ॥२७३॥

कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन ।
जैसी संगती बैठिए, तैसोई फल दीन ॥२७४॥

पिय वियोग ते दुसह दुख, सुने दुख ते अन्त ।
होत अन्त ते फल मिलन, तोरि सिधाए कन्त ॥२७५॥

आदि रूप की परम दुति, घट घट रही समाई ।
लघु मति ते मो मन रमन, अस्तुति कही न जाई ॥२७६॥

नैन तृप्ति कछु होत है, निरखि जगत की भांति ।
जाहि ताहि में पाइयत, आदि रूप की कांति ॥२७७॥

उत्तम जाती ब्राह्ममी, देखत चित्त लुभाय ।
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय ॥२७८॥

परजापति परमेशवरी, गंगा रूप समान ।
जाके अंग तरंग में, करत नैन अस्नान ॥२७९॥

रूप रंग रति राज में, खत रानी इतरान ।
मानो रची बिरंचि पचि, कुसुम कनक में सान ॥२८०॥

परस पाहन की मनो, धरे पूतरी अंग ।
क्यों न होय कंचन बहू, जे बिलसै तिहि संग ॥२८१॥

कबहुं देखावै जौहरनि, हंसि हंसि मानकलाल ।
कबहुं चखते च्वै परै, टूटि मुकुत की माल ॥२८२॥

जद्यपि नैननि ओट है, बिरह चोट बिन घाई ।
पिय उर पीरा न करै, हीरा-सी गड़ि जाई ॥२८३॥

कैथिनि कथन न पारई, प्रेम कथा मुख बैन ।
छाती ही पाती मनों, लिखै मैन की सैन ॥२८४॥

बरूनि बार लेखिनि करै, मसि का जरि भरि लेई ।
प्रेमाक्षर लिखि नैन ते, पिये बांचन को देई ॥२८५॥

पलक म टारै बदन ते, पलक न मारै मित्र ।
नेकु न चित ते ऊतरै, ज्यों कागद में चित्र ॥२८६॥

सोभित मुख ऊपर धरै, सदा सुरत मैदान ।
छूरी लरै बंदूकची, भौहें रूप कमान ॥२८७॥

कामेश्वर नैननि धरै, करत प्रेम की केलि ।
नैन माहिं चोवा मटे, छोरन माहि फुलेलि ॥२८८॥

करै न काहू की सका, सकिकन जोबन रूप ।
सदा सरम जल ते मरी, रहे चिबुक कै रूप ॥२८९॥

करै गुमान कमागरी, भौंह कमान चढ़ाइ ।
पिय कर महि जब खैंचई, फिर कमान सी जाइ ॥२९०॥

सीस चूंदरी निरख मन, परत प्रेम के जार ।
प्रान इजारै लेत है, वाकी लाल इजार ॥२९१॥

जोगनि जोग न जानई, परै प्रेम रस माहिं ।
डोलत मुख ऊपर लिए, प्रेम जटा की छांहि ॥२९२॥

भाटिन भटकी प्रेम की, हर की रहै न गेह ।
जोवन पर लटकी फिरै, जोरत वरह सनेह ॥२९३॥

भटियारी उर मुंह करै, प्रेम पथिक की ठौर ।
धौस दिखावै और की, रात दिखावै और ॥२९४॥

पाटम्बर पटइन पहिरि, सेंदुर भरे ललाट ।
बिरही नेकु न छाड़ही, वा पटवा की हाट ॥२९५॥

सजल नैन वाके निरखि, चलत प्रेम सर फूट ।
लोक लाज उर धाकते, जात समक सी छूट ॥२९६॥

राज करत रजपूतनी, देस रूप को दीप ।
कर घूंघट पर ओट कै, आवत पियहि समिप ॥२९७॥

हियरा भरै तबाखिनी, हाथ न लावन देत ।
सुखा नेक चटवाइ कै, हड़ी झाटि सब देत ॥२९८॥

हाथ लिए हत्या फिरे, जोबन गरब हुलास ।
धरै कसाइन रैन दिन, बिरही रकत पिपास ॥२९९॥

गाहक सो हंसि बिहंसि कै, करत बोल अरु कौल ।
पहिले आपुन मोल कहि, कहत दही को मोल ॥३००॥

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Last Updated : November 07, 2011

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