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संधिः - कथा ४

हितोपदेश भारतीय जन- मानस तथा परिवेश से प्रभावित उपदेशात्मक कथाएँ हैं। हितोपदेश की कथाएँ अत्यंत सरल व सुग्राह्य हैं।


कथा ४
अस्त्य् उत्तरा-पथे गृध्रकूट-नाम्नि पर्वते महान् पिप्पल-वृक्षः । तत्रानेके बका निवसंति । तस्य वृक्षस्याधस्ताद् विवरे सर्पस् तिष्ठति । स च बकानां बालापत्यानि खादति । अथ शोकार्तानां विलापं श्रुत्वा केनचिद् वृढ-बकेनाभिहितं-भो एवं कुरुत, यूयं मत्स्यान् उपादाय नकुल-विवराद् आरभ्य सर्प-विवरं यावत्-पंक्ति-क्रमेण एकैकशो विकिरत । ततस् तद्-आहार-लुब्धैर् नकुलैर् आगत्य सर्पो द्रष्टव्यः । स्वभाव-द्वेषाद् व्यापदयितव्यश् च । तथानुष्ठिते सति तद् वृत्तम् ।
अथ नकुलैर् वृक्षोपरि बक-शावकानां रावः श्रुतः । पश्चात् तद्-वृक्षम् आरुह्य बक-शावकाः खादिताः । अत आवां ब्रूवः-उपायं चिंतयन् इत्य् आदि ।
आवाभ्यां नीयमानं त्वाम् अवलोक्य लोकैः किंचिद् वक्तव्यम् एव । यदि त्वम् उत्तरं दास्यसि, तदा त्वन्-मरणम् । तत् सर्वथैव स्थीयताम् ।
कूर्मो वदति-किम् अहम् अप्राज्ञः ? नाहम् उत्तरं दास्यामि । न किम् अपि मया वक्तव्यम् । तथानुष्ठिते तथा-विधं कूर्मम् आलोक्य सर्वे गो-रक्षकाः पश्चाद् धावंति, वदंति च-अहो ! महद् आश्चर्यम् ! पक्षिभ्यां कूर्मो नीयते ।
कश्चिद् वदति-यद्य् अयं कूर्मः पतति, तदात्रैव पक्त्वा खादितव्यः ।
कश्चिद् वदति-सरसस् तीरे दग्ध्वा खादितव्यो यम् ।
कश्चिद् वदति-गृहं नीत्वा भक्षणीयः । इति ।
तद्-वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो विस्मृत-पूर्व-संस्कारः प्राह-युष्माभिर् भस्म भक्षितव्यम् इति वदंन् एव पतितस् तैर् व्यापादितश् च । अतो हं ब्रवीमि-सुहृदां हित-कामानाम् इत्य् आदि ।
अथ प्रणिधिर् बकस् तत्रागत्योवाच-देव ! प्राग् एव मया निगदितं दुर्ग-शोध हि प्रतिक्षणं कर्तव्यम् इति । तच् च युष्माभिर् न कृतं, तद्-अनवधानस्य फलम् इदम् अनुभूतम् । दुर्ग-दाहो मेघवर्णेन वायसेन गृध्र-प्रत्युक्तेन कृतः । राजा निःश्वस्याह-
प्रणयाद् उपकाराद् वा यो विश्वसिति शत्रुषु । स सुप्त इव वृक्षाग्रात् पतितः प्रतिबुध्यते ॥१२॥
अथ प्रणिधिर् उवाच-इतो दुर्गदाहं विधाय, यदा यतो मेघवर्णस् तदा चित्रवर्णेन प्रसादितेनोक्तम्-अयं मेघवर्णो त्र कर्पूर-द्वीप-राज्येभिषिच्यताम् । तथा चोक्तम्-
कृत-कृत्यस्य भृत्यस्य कृतं नैव प्रणाशयेत् । फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चैनं प्रहर्षयेत् ॥१३॥
चक्रवाको ब्रूते-देव ! श्रुतं यत् प्रणिधिः कथयति ?
राजा प्राह--ततस् ततः ?
प्रणिधिर् उवाच-ततः प्रधान-मंत्रिणा गृध्रेणाभिहितम्-देव ! नेदम् उचितम् । प्रसादांतरं किम् अपि क्रियताम् । यतः-
अविचारयतो युक्ति-कथनं तुष-खंडनम् । नीचेषूपकृतं राजन् बालुकास्व् इव मूत्रितम् ॥१४॥
महताम् आस्पदे नीचः कदापि न कर्तव्यः । तथा चोक्तम्-
नीचः श्लाघ्य-पदं प्राप्य स्वामिनं हंतुम् इच्छति । मूषिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनिं हंतुं गतो यथा ॥१५॥
चित्रवर्णः पृच्छति--कथम् एतत् ?
मंत्री कथयति-

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:55:42.2400000

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वात्स्यायन

  • n. एक आचार्य, जो ‘वात्स्यायन कामसूत्र’ नामक सुविख्यात कामशास्त्रविषयक ग्रंथ का रययिता था । विष्णुशर्मन्कृत पंचतंत्र में वात्सायन एवं अश्रशास्त्रकार शालिहोत्र को वैद्यकशास्त्रज्ञ कहा गया है । मधुसुदन सरस्वतीकृत ‘प्रस्थानभेद’ में भी वात्स्यायनप्रणीत कामसूत्र को आयुर्वेदशास्त्रान्तर्गत ग्रंथ कहा गया है । 
  • व्यक्तिपरिचय n. वात्स्यायन यह इसका व्यक्तिनाम न हो कर गोत्रनाम था । सुबन्धु के अनुसार, इसका सही नाम मल्लनाग था । यशोधर के द्वारा लिखित ‘कामसूत्र’ के टीका में भी इसे आचार्य मल्लनाग कहा गया है । वात्स्यायन स्वयं ब्रह्मचारी एवं योगी था, ऐसा कामसूत्र के अंतिम श्र्लोक से प्रतीत होता है । कामसूत्र में अवंति, मालव; अपरान्त, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र एवं आंध्र आदि देशों के आचारविचारों के काफ़ी निर्देश प्राप्त है, जिनसे प्रतीत होता है कि, यह पश्र्चिम या दक्षिण भारत में रहनेवाला था । कामसूत्र के ‘नागरक वृत्त’ नामक अध्याय में नागर नामक एक नगर का निर्देश प्राप्त है । यशोधर के अनुसार, कामसूत्र में निर्दिष्ट ‘नागर’ पाटलिपुत्र है । अन्य कई अभ्यासक उसे जयपूर संस्थान में स्थित नागर ग्राम मानते है । 
  • कालनिर्णय n. वात्स्यायन का काल 300 ई. स. माना जाता है । वेबर के अनुसार, इसका ‘वात्स्यायन’ नाम लाट्यायन, बौधायन जैसे सुत्रकालीन आचार्यों से मिलता जुलता प्रतीत होता है [वेबर पृ. १६४] । कौटिल्य अर्थशास्त्र एवं कामसूत्र की निवेदनपद्धति में काफ़ी साम्य है । कामसूत्र में प्राप्त ‘ईश्र्वरकामितम्’ (राजाओं की भोगतृष्णा) नामक अध्याय में प्रायः आंध्र राजाओं का ही वर्णन किया गया है । आयुर्वेदीय ‘वाग्भट’ ग्रंथ में कामसूत्र के ‘वाजीकरण’ संबंधी उपचार उद्धृत किये गये है । इन सारे निर्देशों से कामसूत्र का रचनाकाल ई.स. 3 री शताब्दी निश्र्चित होता है । 
  • पूर्वाचार्य n. कामसूत्र में प्राप्त निर्देश के अनुसार, इस शास्त्र की निर्मिति शिवानुचर नंदी के द्वारा हुई, जिसने सहस्त्र अध्यायों के ‘कामशास्त्र’ की रचना की। नंदी के इस विस्तृत ग्रंथ का साक्षेप औद्दालकि श्र्वेतकेतु नामक आचार्य ने किया, जिसका पुनःसंक्षेप आगे चल कर बाभ्रव्य पांचाल ने किया। बाभ्रव्य का कामशास्त्रविषयक ग्रंथ सात ‘अधिकरणों’ में विभाजित था । बाभ्रव्य के इसी ग्रंथ का संक्षेप कर वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र की रचना की। उपर्युक्त ग्रंथकारों के अतिरिक्त, वात्स्यायन के कामसूत्र में निम्नलिखित पूर्वाचार्यों का, एवं उनके विभिन्न ग्रंथो का निर्देश प्राप्त हैः- दत्तकाचार्य - वैशिक; चारायणाचार्य-साधारण अधिकरण; सुवर्णनाम-सांप्रयोगिक; घोटकमुख-कन्यासंप्रयुक्त; गोनर्दीय-भार्याधिकारिक; गोणिकापुत्र-परादारिक; कुचुमार-औपनिषदिक। इस ग्रंथ की निम्नलिखित टीकाएँ विशेष सुविख्यात हैः- १. वीरभद्रकृत ‘कंदर्पचूडामणि,’ २. भास्कर नृसिंहकृत ‘कामसुत्रटीका,’ ३. यशोधरकृत ‘कंदर्पचूडामणि। वेबर के अनुसार, सुबंधु एवं शंकराचार्य के द्वारा भी ‘कामसूत्र’ पर भाष्य लिखे गये थे । 
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Category : Hindu - Traditions
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