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भेदिनीमन्त्रकथनम
आनन्दभैरव उवाच
अथ वक्ष्ये महाकाल मूलपद्मविवेचनम् ।
यत् कृत्वा अमरो भूत्वा वसेत् कालचतुष्टयम् ॥१॥

अथ षट्‌चक्रभेदार्थे भेदिनीशक्तिमाश्रयेत् ।
छेदिनीं सर्वग्रन्थीनां योगिनीं समुपाश्रयेत् ॥२॥

तस्या मन्त्रान् प्रवक्ष्यामि येन सिद्धो भवेन्नरः ।
आदौ श्रृणु महामन्त्रं भेदिन्याः परं मनुम् ॥३॥

आदौ कालीं समुत्कृत्य ब्रह्मामन्त्रं ततः परम् ।
देव्याः प्रणवमुद्‌धृत्य भेदनी तदनन्तरम् ॥४॥

ततो हि मम गृहणीयात् प्रापय द्वयमेव च ।
चित्तचञ्चीशब्दान्ते मां रक्ष युग्ममेव च ॥५॥

भेदिनी मम शब्दान्ते अकालमरणं हर ।
हर युग्मं महापापं नमो नमोऽग्निजायया ॥६॥

एतन्मन्त्रं जपेत्तत्र डाकिनीरक्षसि प्रभो ।
आदौ प्रणवमुद्‌धृत्य ब्रह्ममन्त्रं ततः परम् ॥७॥

शाम्भवीति ततश्चचोक्त्या ब्राह्मणीति पदं ततः ।
मनोनिवेशं कुरुते तारयेति द्विधापदम् ॥८॥

छेदिनीपदमुद्‌धृत्य मम मानसशब्दतः ।
महान्धकारमुद्‍धृत्य छेदयेति द्विधापदम् ॥९॥

स्वाहान्तं मनुमुद्‌धृत्य जपेन्मूलाम्बुजे सुधीः ।
एतमन्त्रप्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥१०॥

तथा स्त्रीयोगिनीमन्त्रं जपेत्तत्रैव शङ्कर ।
ॐ घोररुपिणिपदं सर्वव्यापिनि शङ्कर ॥११॥

महायोगिनि मे पापं शोकं रोगं हरेति च ।
विपक्षं छेदयेत्युक्त्वा योगं मय्यर्पय द्वयम् ॥१२॥

स्वाहान्तं मनुमुद्‌धृत्य जपाद्योगी भवेन्नरः ।
खेचरत्वं समाप्नोति योगाभ्यासेन योगिराट्‌ ॥१३॥

डाकिनीं ब्रह्माणा युक्तां मूले ध्यात्वा पुनः पुनः ।
जपेन्मन्त्रं सदायोगी ब्रह्ममन्त्रेण योगवित् ॥१४॥

ब्रह्ममन्त्रं प्रवक्ष्यामि तज्जापेनापि योगिराट्‌ ।
ब्रह्ममन्त्रप्रसादेन जडो योगी न संशय्ह ॥१५॥

प्रणवत्रयद्धत्य दीर्घप्रणवयुग्मकम् ।
तदन्ते प्रण्वत्रीणि ब्रह्म ब्रह्म त्रयं त्रयम् ॥१६॥

सर्वसिद्धिपदस्यान्ते पालयेति च मां पदम् ।
सत्त्व्म गुणो रक्ष रक्ष मायास्वाहापदं जपेत् ॥१७॥

डाकिनीमन्त्रराजञ्च श्रृणुष्व परमेश्वर ।
यज्जप्त्वा डाकिनी वश्या त्रैलोक्यस्थितिपालकाः ॥१८॥

यो जपेत् डाकिनीमन्त्रं चैतन्यां कुण्डली झडित् ।
अनायासेन सिद्धिः स्यात् परमात्मप्रदर्शनम् ॥१९॥

मायात्रयं समुद्‌धृत्य प्रणवैकं ततः परम् ।
डाकिन्यन्ते महाशब्दं डाकिन्यम्बपदं ततः ॥२०॥

पुनः प्रणवमुद्‌धृत्य मायात्रयं ततः परम् ।
मम योगसिद्धिमन्ते साधयेति द्विधापदम् ॥२१॥

मनुमुद्‌धृत्य देवेशि जपाद्योगी भवेज्जडः ।
जप्त्वा सम्पूजयेन्मन्त्री पुरश्चरणसिद्धये ॥२२॥

सर्वत्र चित्तसाम्येन द्रव्यादिविविधानि च ।
पूजयित्वा मूलपद्मे चित्तोकरणेन च ॥२३॥

ततो मानसजापञ्च स्तोत्रञ्च कालिपावनम् ।
पठित्वा योगिराट्‍ भूत्त्वा वसेत् षट्‌चक्रवेश्मनि ॥२४॥

शक्तियुक्तं विधिं यस्तु स्तौति नित्यं महेश्वर ।
तस्यैव पालनार्थाय मम यन्त्रं महीतले ॥२५॥

तत् स्तोत्रं श्रृणु योगार्थं सावधानावधारय ।
एतत्स्तोत्रप्रसादेन महालयवशो भवेत् ॥२६॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2011-04-26T02:50:40.2470000

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निमि (विदेह)

  • n. अयोध्यापति इक्ष्वाकु राजा का बारहवॉं पुत्र, एवं ‘विदेह’ देश तथा राजवंश का पहला राजा [वा.रा.उ.५५];[ म.स.८.९] । यह एवं इसका पुरोहित वसिष्ट के दरम्यान हुए झगडे में, इन दोनों ने परस्पर को विदेह (देहरहित) बनने का शाप दिया था । उस वेदहत्व की अवस्था के कारण, इसे एवं इसके राजवंश को ‘विदेह’ नाम प्राप्त हुआ [मत्स्य.६१.३२-३६];[ पद्म. पा.२२,२४-३७];[ वायु. ८९.४] । इसके नाम के लिये, ‘नेमि’ पाठभेद भी उपलब्ध है । इसका पिता इक्ष्वाकु मध्यदेह्स (आधुनिक उत्तर प्रदेश ) का राजा था । इक्ष्वाकु के पुत्रों में विकुक्षि शशाद एवं निमि, ये दो प्रमुख थे । उनमें से विकुक्षि इक्ष्वाकु के पश्चात् अयोध्या का राजा बना, एवं उसने सुविख्यात इक्ष्वाकुवंश की स्थापना की । निमि को विदेह का राज्य मिला, एवं इसने विदेह राजवंश की स्थापना की । गौतम ऋषि के आश्रम के पास, निमि ने इंद्र के अमरावती के समान सुंदर एवं समृद्ध नगरी की स्थापना की थी । उस नगरी का नाम ‘वैजंयत’ या ‘जयंत’ था । यह नगरी दक्षिण दंडकारण्य प्रदेश में थी, एवं रामायण काल में, वहॉं तिमिध्वज नामक राजा राज्य करता था [वा.रा.अयो.९.१२] । ‘जयंत’ नगरी निश्चितरुप में कहॉं बसी थी, यह कहना मुशिक्ल है । डॉ. भांडारकर के मत में, आधुनिक विजयदुर्ग ही प्राचीन जयंतनगरी होगी । श्री. नंदलाल दे के मत में आधुनिक वनवासी शहर की जगह जयंतनगरी बसी हुयी थी । निमि की राजधानी ‘मिथिला’ नामक नगरी में थी । उस नगरी का मिथिला नाम, इसके पुत्र ‘मिथि जनक’ के नाम से दिया गया था [वायु.८९.१-२];[ ब्रह्मांड.३.६४.१-२] । एक बार, निमि ने सहस्त्र वर्षो तक चलनेवाले एक महान यज्ञ का आयोजन किया । उस यज्ञ का ‘होता’ (प्रमुख आचार्य) बनने के लिये इसने बडे सम्मान से अपने कुलगुरु वसिष्ठ को निमंत्रण दिया । उस समय वसिष्ठ और कोई यज्ञ में व्यस्त था । उसने इससे कहा, ‘पॉंचसों वर्षो तक चलनेवाले एक यज्ञ के कार्य में, मैं अभी व्यक्त हूँ । इसलिये वह यज्ञ समाप्त होने तक तुम ठहर जाओं । उस यज्ञ समाप्त होते ही, मैं तुम्हारे यज्ञ का ऋत्विज बन जाऊँगा । वसिष्ठ के इस कहने पर, निमि चुपचाप बैठ गया । उस मौनता से वसिष्ठ की कल्पना हुयी कि, यज्ञ पॉंचसौ वर्षो तक रुकाने की अपनी सूचना निमि ने मान्य की है । इस कारण, वह इंद्र का यज्ञ करने चला गया । इंद्र का यज्ञ समाप्त करने के बाद, वसिष्ठ निमि के घर वापस आया । वहॉं उसने देखा कि, राजा ने उसके कहने को न मान कर, पहले ही यज्ञ शुरु कर दिया है, एवं गौतम ऋषि को मुख्य ऋत्विज बनाया है । फिर क्रुद्ध हो कर वसिष्ठ ने पर्यक पर सोये हुये निमि को शाप दिया, ‘अपने देह से तुम्हारा वियोग हो कर, तुम विदेह बनोगे’। जागते ही इसे वसिष्ठ के शाप का वृत्तांत विदित हुआ । फिर निद्रित अवस्था में शाप देनेवाले दुष्ट वसिष्ठ गुरु से यह संतप्त हुआ, एवं इसने भी उसे वही शाप दिया [विष्णु.४.५.१-५];[ भा.९.१३.१-६];[वा.रा.उ.५५-५७] । पद्म पुराण में ‘वसिष्ठशाप’ की यही कथा कुछ अलग ढंग से दी गयी है । अपने स्त्रियों के साथ, निमि द्यूत खेल रहा था । इतने में वसिष्ठ ऋषि यकायक वहॉं आ गया । द्यूत-क्रीडा में निमग्न रहने के कारण, निमि ने उसे उत्थापन आदि नही दिया । उस अपमान के कारण वसिष्ठ ने इसे ‘विदेह’ बनने का शाप दिया [पद्म.पा.५.२२] । वसिष्ठ के शाप के कारण, निमि का शरीर अचेतन हो कर गिर पडा, एवं इसके प्राण इधर-उधर भटकने लगे । इसका अचेतन शरीर सुगंधि तैलादि के उपयोग से स्वच्छ एवं ताजा रख दिया गया । निमि का यज्ञ समाप्त होने पर, यज्ञ के हविर्भाग को स्वीकार करने देवतागण उपस्थित हुये । फिर उन्होंने निमि से कुछ आशीर्वाद मॉंगने के लिये कहा । निमि ने कहा, ‘शरीर एवं प्राण के वियोग के समान दुःखदायी घटना दुनिया हर व्यक्ति की ऑंखो में मेरी स्थापना हो जाये, जिससे मानवी शरीर से मैं कभी भी जुदा न हो सकूँ’। निमि की इस प्रार्थना के अनुसार, देवों ने मानवी ऑखों में इसे जगह दिलवायी । ऑंखों में स्थित निमि के कारण, उस दिन से मानवों की ऑंखे झपाने लगी, एवं ऑंख झपाने की उस क्रिया को ‘निमिष’ कहने लगे [विष्णुधर्म.१.११७] । मत्स्य एवं पद्मपुराण के मत में, ‘विदेह अवस्था’ के शाप से मुक्ति पाने के लिये, निमि एवं वसिष्ठ ब्रह्माजी के पास गये । ब्रह्माजी ने वर प्रदान कर, निमि को मानवों के ऑंखों में रहने के लिये कहा, एवं वसिष्ठ को मित्र एवं वरुण के अंश से जन्म लेने के लिये कह दिया [मत्स्य.२०१.१७-२२];[ पद्म. पा.२२.३७-४०] । मृत्यु के समय निमि निसंतान था; और भावी युवराज के न होने के कारण, अराजकता फैलने का धोखा था । निमि के अचेतन शरीर से पुत्र निर्माण करने के हेतु, उसे य्ञ की ‘अरुणी’ बनायी गयी । उस ‘अरणी’ का मंथन करने के एबाद, उससे एक तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ । वह ‘अरणी’ में मंथन से निकला, इसलिये उसे ‘मिथि’ कहने लगे [वायु.८०] । माता के बिना, केवल पिता से ही उसका जन्म हुआ, इस कारण उसे ‘जनक’ की उपाधि प्राप्त हुयी । ‘विदेह’ पिता का पुत्र होने के कारण, मिथि जनक को ‘वैदेह’ नामांतर भी प्राप्त [वा.रा.उ.५७] । मृत्यु के पश्चात् निमि यमसभा में प्रविष्ट हुआ, एवं सूर्यपुत्र यम की उपासना करने लगा [म.स.८.९] 
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Category : Hindu - Traditions
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