सुन्दरकाण्ड - दोहा १ से १०

गोस्वामी तुलसीदासजीने रामचरितमानस ग्रन्थकी रचना दो वर्ष , सात महीने , छ्ब्बीस दिनमें पूरी की। संवत्‌ १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।


दोहा

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ॥१॥

चौपाला

जात पवनसुत देवन्ह देखा । जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता । पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा । सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं । सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई । सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥

कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा । कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ । तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा । मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥

दोहा

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान ।

आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान ॥२॥

चौपाला

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई । करि माया नभु के खग गहई ॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई । एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा । बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा । गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥

नाना तरु फल फूल सुहाए । खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥

सैल बिसाल देखि एक आगें । ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें ॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥

गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥

अति उतंग जलनिधि चहु पासा । कनक कोट कर परम प्रकासा ॥

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना ।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ॥

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥१॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं ।

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं ॥

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं ।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं ॥२ ॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।

कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥३॥

दोहा

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार ।

अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार ॥३॥

चौपाला

मसक समान रूप कपि धरी । लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा । मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥

मुठिका एक महा कपि हनी । रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥

पुनि संभारि उठि सो लंका । जोरि पानि कर बिनय संसका ॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा । चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे । तब जानेसु निसिचर संघारे ॥

तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउँ नयन राम कर दूता ॥

दोहा

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग ।

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग ॥४॥

चौपाला

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा । हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई । गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥

गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना । पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥

गयउ दसानन मंदिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥

सयन किए देखा कपि तेही । मंदिर महुँ न दीखि बैदेही ॥

भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा ॥

दोहा

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ ।

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ॥५॥

चौपाला

लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥

मन महुँ तरक करै कपि लागा । तेहीं समय बिभीषनु जागा ॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा । हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा ॥

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी । साधु ते होइ न कारज हानी ॥

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए । सुनत बिभीषण उठि तहँ आए ॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई । मोरें हृदय प्रीति अति होई ॥

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी । आयहु मोहि करन बड़भागी ॥

दोहा

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम ।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥६॥

चौपाला

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी । जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी ॥

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा । करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ॥

तामस तनु कछु साधन नाहीं । प्रीति न पद सरोज मन माहीं ॥

अब मोहि भा भरोस हनुमंता । बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ॥

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा ॥

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥

कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चंचल सबहीं बिधि हीना ॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥

दोहा

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर ।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ॥७॥

चौपाला

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी ॥

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा । पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ॥

पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही ॥

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता । देखी चहउँ जानकी माता ॥

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवनसुत बिदा कराई ॥

करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥

कृस तन सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥

दोहा

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन ।

परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥८॥

चौपाला

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई । करइ बिचार करौं का भाई ॥

तेहि अवसर रावनु तहँ आवा । संग नारि बहु किएँ बनावा ॥

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा । साम दान भय भेद देखावा ॥

कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी । मंदोदरी आदि सब रानी ॥

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥

तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम सनेही ॥

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा ॥

अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिं रघुबीर बान की ॥

सठ सूने हरि आनेहि मोहि । अधम निलज्ज लाज नहिं तोही ॥

दोहा

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान ।

परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन ॥९॥

चौपाला

सीता तैं मम कृत अपमाना । कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना ॥

नाहिं त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होति न त जीवन हानी ॥

स्याम सरोज दाम सम सुंदर । प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर ॥

सो भुज कंठ कि तव असि घोरा । सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा ॥

चंद्रहास हरु मम परितापं । रघुपति बिरह अनल संजातं ॥

सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥

सुनत बचन पुनि मारन धावा । मयतनयाँ कहि नीति बुझावा ॥

कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई ॥

मास दिवस महुँ कहा न माना । तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना ॥

दोहा

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद ।

सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद ॥१०॥

चौपाला

त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥

सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥

सपनें बानर लंका जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥

खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥

एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लंका मनहुँ बिभीषन पाई ॥

नगर फिरी रघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥

यह सपना में कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गएँ दिन चारी ॥

तासु बचन सुनि ते सब डरीं । जनकसुता के चरनन्हि परीं ॥

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Last Updated : February 27, 2011

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