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द्वादशस्कन्धपरिच्छेदः - अष्टनवतितमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


ब्रह्मसे जगत्की उत्पत्ति आदिका निरूपण

यस्मिन्नेतद्विभातं यत इदमभवद्येन चेदं य एत -

द्योऽस्मादुत्तीर्णरूपः खलु सकलमिदं भासितं यस्य भासा ।

यो वाचां दूरदूरे पुनरपि मनसां यस्य देवा मुनीन्द्रा

नो विद्युस्तत्त्वरूपं किमु पुनरपरे कृष्ण तस्मै नमस्ते ॥१॥

जन्माथो कर्म नाम स्फुटमिह गुणदोषादिकं वा न यस्मिन्

लोकानामूतये यः स्वयमनुभजते तानि मायानुसारी ।

बिभ्रच्छक्तीररूपोऽपि च बहुतररूपोऽवभात्यद्भुतात्मा

तस्मै कैवल्यधान्मे पररसपरिपूर्णाय विष्णो नमस्ते ॥२॥

नो तिर्यञ्चं न मर्त्यं न च सुरमसुरं न स्त्रियं नो पुमांसं

न द्रव्यं कर्म जाति गुणमपि सदसद्वापि ते रूपमाहुः ।

शिष्टं यत् स्यान्निषेधे सति निगमशतैर्लक्षणावृत्तितस्तत्

कृच्छ्रेणावेद्यमानं परमसुखमयं भाति तस्मै नमस्ते ॥३॥

मायायां बिम्बितस्त्वं सृजसि महदहङ्कारतन्मात्रभेदै -

र्भूतग्रामेन्द्रियाद्यैरपि सकलजगत्स्वप्रसङ्कल्पकल्पम् ।

भूयः संहृत्य सर्वं कमठ इव पदान्यात्मना कालशक्त्या

गम्भीरे जायमाने तमसि वितिमिरो भासि तस्मै नमस्ते ॥४॥

शब्दब्रह्मेति कर्मत्यणुरिति भगवन् काल इत्यालपन्ति

त्वामेकं विश्र्वहेतुं सकलमयतया सर्वथा कल्प्यमानम् ।

वेदान्तैर्यत्तु गीतं पुरुषपरचिदात्माभिधं तत्तु तत्त्वं

प्रेक्षामात्रेण मूलप्रकृतिविकृतिकृत कृष्ण तस्मै नमस्ते ॥५॥

सत्त्वेनासत्तया वा न च खलु सदसत्त्वेन निर्वाच्यरूपा

धत्ते यासावविद्याा गुणफणिमतिवद्विश्र्वदृश्यावभासम् ।

विद्यात्वं सैव याता श्रुतिवचनलवैर्यत्कृपास्यन्दलाभे

संसाराण्यसद्यस्त्रुटनपरशुतामेति तस्मै नमस्ते ॥६॥

भूषासु स्वर्णवद्वा जगति घटशरावादिके मृत्तिकावत्तत्त्वे

संचिन्त्यमाने स्फुरति तदधुनाप्यद्वितीयं वपुस्ते ।

स्वप्नद्रष्टुः प्रबोधे तिमिरलयविधौ जीर्णरज्जोश्र्च यद्व -

द्विद्यालाभे तथैव स्फुटमपि विकसेत् कृष्ण तस्मै नमस्ते ॥७॥

यद्भीत्योदेति सूर्यो दहति च दहनो वाति वायुस्तथान्ये

यद्भीताः पद्मजाद्याः पुनरुचितबलीनाहरन्तेऽनुकालम् ।

येनैवारोपिताः प्राङ्निजपदमपि ते च्यावितारश्र्च

पश्र्चात्तस्मै विश्र्वं नियन्त्रे वयमपि भवते कृष्णः कुर्मः प्रणामम् ॥८॥

त्रैलोक्यं भावयन्तं त्रिगुणमयमिदं त्र्यक्षरस्यैकवाच्यं

त्रीशानामैक्यरूपं त्रिभिरपि निगमैर्गीयमानस्वरूपम् ।

तिस्त्रोऽवस्था विदन्तं त्रियुगजनिजुषं त्रिक्रमाक्रान्तविश्र्वं

त्रैकाल्ये भेदहीनं त्रिभिरहमनिशं योगभेदैर्भजे त्वाम् ॥९॥

सत्यं शुद्धं विबुद्धं जयति तव वपुर्नित्यमुक्तं निरीहं

निर्द्वन्द्वं निर्विकारं निखिलगुणगणव्यञ्जनाधारभूतम् ।

निर्मूलं निर्मलं तन्निरवधिमाहिमोल्लासि निर्लीनमन्त -

र्निस्सङ्गानां मुनीनां निरुपमपरमानन्दसान्द्रप्रकाशम् ॥१०॥

दुर्वारं द्वादशारं त्रिशतपरिमिलत्षष्टिपर्वाभिवीतं

सम्भ्राम्यत्क्रूरवेगं क्षणमनु जगदाच्छिद्य संधावमानम्

चक्रं ते कालरूपं व्यथयतु न तु मां त्वत्पदैकावलम्बं

विष्णो कारुण्यसिन्धो पवनपुरपते पाहि सर्वामयौघात् ॥११॥

॥ इति ब्रह्मणो जगदुत्पत्त्यादिनिरूपणम् अष्टनवतितमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

श्रीकृष्ण ! जिसके ब्रह्मस्वरूपको देवगण तथा मुनीश्र्वर नहीं जान सके , तब , भला , औरोंकी क्या गणना है ? जो मन -वचनके अगोचर है , जिसके प्रकाशसे यह सारा जगत् प्रकाशित हो रहा है , जिसमें यह प्रतिष्ठित हैं , जिससे यह उत्पन्न हुआ हे और जिसमें यह पुनः लीन हो जाता है , जो इस जगत् -रूपमें वर्तमान है और जिसका स्वरूप इस जगत्से व्यतिरिक्त है , ऐसे आपको नमस्कार है ॥१॥

विष्णो ! जिसमें परमार्थतः जन्म , कर्म , गुण , दोष आदि कुछ भी नहीं है , तथापि जो जगत्पर अनुग्रह करनेके हेतु मायाका आश्रय लेकर स्वयं ही उन जन्म -कर्मादिकोंको अङ्गीकार करता है , विभिन्न शक्तियोंको धारण करता है और रूपरहित होते हुए भी स्थावर -जङ्गमभेदसे अनेकों रूपोंमें दृष्टिगोचर हो रहा है , अतएव जिसका स्वरूप महान् आश्र्चर्यजनक है तथा जो कैवल्यका धाम एवं परमानन्दरससे परिपूर्ण है , ऐसे आपको प्रणाम है ॥२॥

आपके रूपको न तो तिर्यक् , न मानव , न सुर -असुर न स्त्री और न पुरुष ही कहा जा सकता है तथा द्रव्य , कर्म जाति , गुण , सत् अथवा असत् भी उसे नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार ‘नेति -नेति ’—— इस श्रुतिवचनके द्वारा निषेध करनेपर जो अवशिष्ट रहता है वही आपका रूप है , उपनिषदादि सैकड़ों श्रुतियॉं लक्षणावृत्तिका आश्रय लेकर बड़ी कठिनाईसे उसका प्रतिपादन करती हैं , वह परमानन्दरूपसे प्रकाशित हो रहा है । ऐसे रूपवाले आपको अभिवादन है ॥३॥

पुनः आप मायामें प्रतिबिम्बित होकर महत्तत्त्व , अहंकार पञ्चतन्मात्रा , पञ्चभूत , एकादश इन्द्रियोंकी सहायतासे स्वप्नसंकल्पवत् सारे जगत्की सृष्टि करते हैं । तत्पश्र्चात् जैसे कछुआ अपने पैरोंको अपनेमें समेट लेता है , उसी प्रकार आप भी कालशक्तिके सहारे सारे जगत्को अपनेमें लीन करके आत्मस्वरूपसे प्रकाशित होते हैं । उस समय गहन अन्धकारके प्रकट होनेपर अर्थात् सुषुप्ति -अवस्थामें भी आपका ज्ञान सदा प्रकाशित रहता है , ऐसा आपको नमस्कार है ॥४॥

भगवन् ! एकमात्र आपको ही कुछ लोग जगत्का कारण , कुछ लोग शब्दब्रह्म , कुछ लोग कर्म , कुछ लोग परमाणु और कुछ लोग कालरूपसे वर्णन करते हैं और सर्वात्मक होनेके कारण आपके लिये ऐसी कल्पना सर्वथा उपयुक्त भी है । परंतु वेदान्त जिसका पुरुष , परम शुद्ध चैतन्य और सर्वानुगत आत्मरूपसे अभिधान करता है , वही ब्रह्म है । श्रीकृष्ण वह ब्रह्म आप ही हैं आप अपने ईक्षणमात्रसे मूलप्रकृतिमें विकार (क्षोभ ) उत्पन्न कर देते हैं । आपको प्रणाम है ॥५॥

जो अविद्या न सती , न असती है और न सदसती ही है , अतः जिसके स्वरूपका वर्णन करना अशक्य है , जो रज्जुमें सर्पकी भ्रान्तिसदृश सकल जगत्को अवभासित करनेवाला रूप धारण करती है , वही अविद्या जिसकी कृपाके प्रवाहमें पड़नेपर वेदान्त -वाक्योंद्वारा विद्यारूपिणी होकर संसाररूपी वनको तत्काल काट डालनेके लिये फरसेका -सा काम करती है , ऐसे आपको अभिवादन है ॥६॥

श्रीकृष्ण ! आपका वह जगत्कारणभूत अद्वितीय स्वरूप तत्त्वका विचार करते समय आभूषणोंमें स्वर्ण तथा घट -शराव आदिमें मृत्तिकाकी भॉंति इस समय भी जगत्में प्रकाशित हो रहा है , वही स्वरूप ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर उसी प्रकार स्पष्टरूपसे प्रकाशित हो जाता है , जैसे निद्रा भङ्ग होनेपर स्वप्नद्रष्टाका अज्ञानकल्पित प्रपञ्च नष्ट हो जाता है तथा दीपादिद्वारा अन्धकारके नष्ट हो जानेपर जीर्ण रज्जुमें सर्पकी भ्रान्ति नष्ट हो जाती है । ऐसे स्वरूपवाले आपको

नमस्कार है ॥७॥

श्रीकृष्ण ! जिसके भयसे सूर्य उदय होते हैं , अग्नि जलाती है और वायु बहती है तथा ब्रह्मा आदि अन्य देवगण जिससे भयभीत होकर समयानुसार यथोचित पूजा प्रदान करते हैं , जिसके द्वारा वे पहले अपने -अपने स्थानपर नियुक्त किय गये हैं तथा अवधि समाप्त होनेपर जिसके द्वारा वे उस स्थानसे च्युत कर दिये जायँगे , उस विश्र्वके नियन्तारूप आपका हमलोग भी प्रणाम करते हैं ॥८॥

सत्त्व -रज -तम ——इन तीनों गुणोंसे युक्त इस त्रिलोकीकी जो नियमपूर्वक रचना करनेवाले हैं , त्र्यक्षरस्वरूप प्रणवके जो एकमात्र वाच्य हैं , ब्रह्मा , विष्णु , महेश —— इन तीनों मूर्तियोंका एक्य जिनका स्वरूप है , तीनों वेद जिनके स्वरूपका गान करते हैं , जो जाग्रत् , स्वप्न , सुषुप्ति ——तीनों अवस्थाओंको ज्ञाता , सत्ययुग , त्रेता और द्वापर — इन तीन युगोंमें अवतार धारण करनेवाले , तीन पगसे विश्र्वको आक्रान्त कर लेनेवाले तथा भूत , भविष्य , वर्तमान —— तीनों कालोंमें भेदरहित हैं , ऐसे आपका मैं कर्म -ज्ञान -भक्तिनामक तीनों योगोंद्वारा निरन्तर भजन करता हूँ ॥९॥

जो सत्य , शुद्ध , स्वप्रकाशसिद्ध , नित्यमुक्त , स्पृहारहित , निर्द्वन्द्व् निर्विकार , सम्पूर्ण गुणसमूहोंकी उत्पत्तिका आधारभूत , निष्कारण , निर्मल , असीम वैभवसे सम्पन्न , आसक्तिरहित मुनियोंके अन्तःकरणमें प्रतिष्ठित तथा अनुपम परमानन्दके घनीभूत प्रकाशसे युक्त है , आपका वह स्वरूप उत्कृष्टरूपसे प्रकाशित हो रहा है ॥१०॥

विष्णो ! जिसका निवारण करना अशक्य है , बारह महीने जिसके द्वादश अरे हैं , जो तीन सौ साठ दिनरूप पर्वोंसे अभिव्याप्त है , अतिशय तीव्र वेगसे जो बारंबार चक्कर काट रहा है तथा प्रतिक्षण जगत्का विनाश करनेके लिये उसके पीछे दौड़ लगा रहा है , वह आपका कालरूप चक्र मुझे पीड़ित न करे ; क्योंकि करुणासागर ! मुझे एकमात्र आपके चरणोंका ही अवलम्ब है । पवनपुरपते ! सम्पूर्ण रोगसमूहोंसे मेरी रक्षा कीजिये ॥११॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:52.8970000

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