TransLiteral Foundation
Don't follow traditions blindly or don't assume a superstition either.
Don't be intentionally ignorant. Ask us!! Make Informed Religious Decisions!!

एकादशस्कन्धपरिछेदः - द्विनवतितमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


कर्ममिश्रित भक्तिके स्वरूपका वर्णन

वेदैः सर्वाणि कर्माण्यफलपरतया वर्णितानीति बुद्ध्वा

तानि त्वय्यर्पितान्येव हि समनुचरन्यानि नैष्कर्म्यमीश ।

मा भूद्वेदैर्निषिद्धे कुहचिदपि मनःकर्मवाचां प्रवृत्ति -

र्दुर्वर्जं चेदवाप्तं तदपि खलु भवत्पर्पये चित्प्रकाशे ॥१॥

यस्त्वन्यः कर्मयोगस्तव भजनमयस्तत्र चाभीष्टमूर्ति

हृद्यां सत्त्वैकरूपां दृषदि हृदि मृदि क्वापि वा भावयित्वा ।

पुष्पैर्गन्धैर्निवेद्यैरपि च विरचितैः शक्तितो भक्तिपूतै -

र्नित्यं वर्यां सपर्यां विदधदयि विभो त्वत्प्रसादं भजेयम् ॥२॥

स्त्रीशूद्रास्त्वत्कथादिश्रवणविरहिता आसतां ते दयार्हा -

स्त्वत्पादासन्नयातान् द्विजकुलजनुषो हन्त शोचाम्यशान्तान् ।

वृत्त्यर्थं ते यजन्तो बहुकथितमपि त्वामनाकर्णयन्तो

दृप्ता विद्याभिजात्यैः किमु न विदधते तादृशं मा कृथा माम् ॥३॥

पापोऽयं कृष्ण रामेत्यभिलपति निजं गूहितुं दुश्र्चरित्रं

निर्लज्जस्यास्य वाचा बहुतरकथनीयानि मे विघ्नितानि ।

भ्राता मे वन्ध्यशीलो भजति किल सदा विष्णुमित्थं बुधांस्ते

निन्दन्त्युच्चैर्हसन्ति त्वयि निहितमतींस्तादृशं मा कृथा माम् ॥४॥

श्र्वेतच्छायं कृते त्वां मुनिवरवपुषं प्रीणयन्ते तपोभि -

स्त्रेतायां स्त्रुक्स्त्रुवाद्यङ्कितमरुणतनुं यज्ञरूपं यजन्ते ।

सेवन्ते तन्त्रमार्गैर्विलसदरिगदं द्वापरे श्यामलाङ्गं

नीलं संकीर्तनाद्यैरिह कलिसमये मानुषास्त्वां भजन्ते ॥५॥

सोऽयं कालेयकालो जयति मुररिपो यत्र संकीर्तनाद्यै -

र्निर्यत्नैरैव मार्गैरखिलद नचिरात् त्वत्प्रसादं भजन्ते ।

जातास्त्रेताकृतादावपि हि किल कलौ सम्भवं कामयन्ते

दैवात् तत्रैव जातान् विषयविषरसैर्मा विभो वञ्चयास्मान् ॥६॥

भक्तास्तावत्कलौ स्युर्द्रमिलभुवि ततो भूरिशस्तत्र चोच्चैः

कावेरीं ताम्रपर्णीमनु किल कृतमालां च पुण्यां प्रतीचीम् ।

हा मामप्येतदन्तभर्वमपि च विभो किंचिदञ्चद्रसं त्व -

य्याशापाशैर्निबध्य भ्रमय न भगवन् पूरय त्वन्निषेवाम् ॥७॥

दृष्ट्वा धर्मद्रुहं तं कलिमपकरुणं प्राङ् महीक्षित् परीक्षिद्धन्तुं व्याकृष्टखङ्गोऽपि न विनिहतवान् सारवेदी गुणांशात् ।

त्वत्सेवाद्याशु सिध्येदसदिह न तथा त्वत्परे चैष भीरु -

र्यत्तु प्रागेव रोगादिभिरपहरते तत्र हा शिक्षयैनम् ॥८॥

गङ्गा गीता च गायत्र्यपि च तुलसिका गोपिकाचन्दनं तत्

शालग्रामाभिपूजा परपुरुष तथैकादशी नामवर्णाः ।

एतान्यष्टप्ययत्नान्ययि कलिसमये त्वत्प्रसादप्रसिध्या

क्षिप्रं मुक्तिप्रदानीत्यभिदधुभिदधुर्ऋषयस्तेषु मां सज्जयेथाः ॥९॥

देवर्षीणां पितॄणामापि न पुरर्ऋणी किङ्करो वा स भूमन्

योऽसौ सर्वात्मना त्वां शरणमुपगतः सर्वकृत्यानि हित्वा ।

तस्योत्पन्नं विकर्माप्यखिलमपनुदस्येव चित्तस्थितस्त्वं

तन्मे पापोत्थतापान् पवनपुरपते रुन्धि भक्ति प्रणीयाः ॥१०॥

॥ इति कर्ममिश्रभक्तिस्वरूपवर्णनं द्विनवतितमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

वेदोंने समस्त कर्मोंका नैष्कर्म्यके उद्देश्यसे ही वर्णन किया है —— ऐसा जानकर मैंने उन कर्मोंको आपके ही अर्पित कर दिया और जो कर्मनिवृत्ति -साध्य हैं , उनका अनुष्ठान करने लगा । ईश ! अब वेदनिषिद्ध किसी भी कर्ममें मेरे मन , कर्म (शरीर ), वचनकी प्रवृत्ति न हो । यदि संयोगवश मुझे किसी निषिद्ध कर्मकी प्राप्ति हो तो उसे भी मैं चित्प्रकाशस्वरूप आपको ही अर्पित करता हूँ ॥१॥

अयि विभो ! सकाम अनुष्ठानसे भिन्न जो दूसरा आपका भजनयम कर्मयोग है , उस मार्गमें मैं पत्थर , मिट्टी , अथवा हृदय ——कहीं भी अपने इष्टदेवकी शुद्ध सत्त्वमयी मनोहर मूर्तिकी कल्पना करके भक्तिभावपूर्वक यथाशक्ति सम्पादित पुष्प -गन्ध -नैवेद्य आदि सामग्रियोंद्वारा नित्य उत्तम पूजाका अनुष्ठान करता हुआ आपके कृपा -प्रसादका भगी बनूँ ॥२॥

भगवन् ! स्त्री और शूद्र , जो आपकी कथा आदिके श्रवणसे हीन है , वे तो दयाके पात्र हैं ही , उनकी बात छोड़िये । मुझे सोच तो उन लोगोंका है , जो द्विजकुलमें जन्म लेकर आपके चरणोंके निकट पहुँचनेके अधिकारी होकर भी अशान्त —— विषयपरायण हो रहे है । वे जीविकानिर्वाहके निमित्त (हिंसापूर्ण ) यज्ञोंका अनुष्ठान कराते हैं ।

श्रुतियोंमें अनेकों प्रकारसे आपका वर्णन होनेपर भी उसे वे अनसुनी कर रहे हैं । विद्या और उत्तम कुलके अभिमानसे उन्मत्त होकर वे क्या नहीं करते हैं । अतः प्रभो ! मुझे वैसा आत्मघाती मत बनाइये ॥३॥

‘‘ यह पापी अपने दुष्कर्मको छिपानेके लिये ‘ हरे कृष्ण ! हरे राम !’ इत्यादि व्यर्थ ही बकता रहता है । इस निर्लज्जके कोलाहलपूर्ण वचनसे मेरे बहुत - से वक्तव्योंमें विघ्न पड़ गया मेरा भाई निरर्थक ही सदा विष्णुका भजन करता है । ’’—— यों कहते हुए वे अशान्त जन विद्वानोंकी निन्दा करते हैं और आपसे प्रेम करनेवालोंका खुलकर परिहास करते हैं । प्रभो ! मुझे वैसा दुष्कर्मी मत बनाना ॥४॥

त्रेतामें आप अरुणवर्णके हो जाते हैं और स्रुक् -स्रुवा आदिसे सुशोभित आप यज्ञेशका लोग यज्ञोंद्वारा यजन करते है । द्वापरमें आपकी अङ्गकान्ति अतसी -कुसुम -सदृश श्यामल होती है और अप चक्र -गदा आदि आयुधोंसे विभूषित रहते है । उस समय मानव तन्त्र -मार्गोंद्वारा आपकी उपासना करते है । कलियुगमें आप कृष्णवर्णके हो जाते हैं , उस समय लोग नामसंकीर्तन आदि उपायोंद्वारा आपका भजन करते हैं ॥५॥

मुरारे ! वही यह कलियुग सभी युगोंसे उत्कृष्ट हो रहा है ; क्योंकि इस कलियुगमें लोग आयासरहित संकीर्तन आदि उपयोंद्वारा शीघ्र ही आपके कृपा -प्रसादको प्राप्त कर लेते है । सर्वस्व -दानी ! इसीलिये कृतयुग और त्रेतामें उत्पन्न हुए लोग भी कलियुगमें जन्मकी कामना करते हैं । विभो ! उसी कलियुगमें दैववश उत्पन्न हुए हमलोगोंकी विषयरूपी विष -रसद्वारा प्रवञ्चना मत कीजिये (अपनी प्राप्ति कराकर कृतार्थ कर दीजिये ॥६॥

पहले भी कलियुगमें द्रमिल -प्रदेश (द्रविड़ देश )- में बहुत -से भक्त हो गये है । उस द्रमिल -प्रदेशमें भी पुण्यवती कावेरी , ताम्रपर्णी , कृतमाला और पश्र्चिमवाहिनी (नर्मदा )-के तटपर तो उनसे भी उच्चकोटिके भगवद्भक्त हो गये हैं । विभो ! हाय ! मेरा भी जन्म उस द्रमिल -प्रदेशके अन्तर्गत ही है और मैं आपकी भक्तिका भी कुछ रस ले रहा हूँ ; अतः भगवन् ! मुझे आशापाशसे निगडित करके भवाटवीमें भ्रमण मत कराइये , बल्कि मुझमें अपनी भक्तिकी पूर्ण कर दीजिये ॥७॥

पूर्वकालमें भूपाल परीक्षित्ने इस धर्मद्रोही निर्दय कलियुगको देखकर उसे मार डालनेके लिये तलवार खींच ली थी ; परंतु वे तो गुणके सारअंशको जाननेवाले थे , अतः उन्होंने उसका नहीं किया । इस कलियुगमें आपकी भक्ति शीघ्र ही सिद्ध हो जाती है , परंतु दुष्कर्म उतनी जल्दी सिद्ध नहीं होता । साथ ही यह कलियुग भगवद्भक्तोंसे भय भी खाता है । यह भजनारम्भसे पूर्व ही रोगादिद्वारा लोगोंको भजनसे निवारण करनेकी चेष्टा करता है । हाय ! उसी रोगने मुझे आ घेरा है , अतः भगवन् ! उसका अपहरण करनेके लिये आप इस कलियुगको शिक्षा दीजिये ॥८॥

अयि परमपुरुष ! गङ्गा , गीता , गायत्री , तुलसी , गोपीचन्दन , शालग्रामपूजन , एकादशी -व्रत और नाम -जप -ये आठों पदार्थ कलियुगमें अनायास ही उपलब्ध होनेवाले हैं और आपकी कृपाके प्रभावसे ये शीघ्र ही मुक्ति प्रदान करनेवाले भी हैं —— ऐसा ऋषियोंका कथन है । अतः भगवन् ! मेरे मनको उन्हीमें संलग्न कर दीजिये ॥९॥

भूमन् ! जो पुरुष समस्त कर्मोंका परित्याग करके सर्वभावसे आपके शरणापन्न हो गया है , वह पुनः न तो देव , ऋषि और पितरोंका ऋणी ही होती है और न किंकर ही ; क्योंकि उसके चित्तमें स्थित आप उसके द्वारा संघटित हुए सम्पूर्ण निषिद्ध कर्मोंका विनाश ही कर देते है । इसीलिये हे पवनपुरपते ! मेरे पापजनित संतापको दूर कर दीजिये और अपनी अनपायिनी भक्ति प्रदान कीजिये ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:52.5370000

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.

धर्मादारीं(चावरें)कुत्रें

  • एखादा मनुष्य दानधर्म करीत असतां याचक लोकांवर ज्याप्रमाणें त्याचें कुत्रें भुंकूं लागतें, त्याप्रमाणें मोठयांच्या आश्रयानें राहणारें लोक त्यांच्या हातून होणार्‍या सत्कृत्यांच्या आड येतात. ‘धर्माआड कुत्रें होणें’ पहा. 
RANDOM WORD

Did you know?

एका क्षणासाठी निमिष ही संज्ञा कशी प्राप्त झाली?
Category : Hindu - Beliefs
RANDOM QUESTION
Don't follow traditions blindly or ignore them. Don't assume a superstition either. Don't be intentionally ignorant. Ask us!!
Hindu customs are all about Symbolism. Let us tell you the thought behind those traditions.
Make Informed Religious decisions.

Featured site