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अष्टमस्कन्धपरिच्छेदः - सप्तविंशतितमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


अमृत-मंथन

दुर्वासाः सुरवनिताप्तदिव्यमाल्यं

शक्राय स्वयमुपदाय तत्र भूयः ।

नागेन्द्रप्रतिमृदिते शशाप शक्रं

का क्षान्तिस्त्वदितरदेवतांशजानाम् ॥१॥

शापेन प्रतिथजरेऽथ निर्जरेन्द्रे

देवेष्वप्यसुरजितेषु निष्प्रभेषु ।

शर्वाद्याः कमलजमेत्य सर्वदेवा

निर्वाणप्रभव समं भवन्तमापुः ॥२॥

ब्रह्माद्यैः स्तुतमहिमा चिरं तदानीं

प्रादुष्षन् वरद पुरः परेण धाम्ना ।

हे देवा दितिजकुलैर्विधाय संधिं

पीयूषं परिमथतेति पय्रशास्त्वम् ॥३॥

संधानं कृतवति दानवैः सुरौघे

मन्थानं नयति मदेन मन्दराद्रिम् ।

भ्रष्टेऽस्मिन् बदरमिवोद्वहन् खगेन्द्रे

सद्यस्त्वं विनिहितवान् पयःपयोधौ ॥४॥

आधाय द्रुतमथ वासुंकि वरत्रां

पाथोधौ विनिहितसर्वबीजजाले ।

प्रारब्धे मथनविधौ सुरासुरैस्तै -

र्व्याजात्त्वं भुजगमुखेऽकरोः सुरारीन् ॥५॥

क्षुब्धाद्रौ क्षुभितजलोदरे तदानीं

दुग्धाब्धौ गुरुतरभारतो निमग्ने ।

देवेषु व्यथिततमेषु तत्प्रियैषी

प्राणैषीः कमठतनुं कठोरपृष्ठाम् ॥६॥

वज्रातिस्थिरतरकर्परेण विष्णो

विस्तारात्परिगतलक्षयोजनेन ।

अम्भोधेः कुहरगतेन वर्ष्मणा त्वं

निर्मग्नं क्षितिधरनाथमुन्निनेथ ॥७॥

उन्मग्ने झटिति तदा धराधरेन्द्रे

निर्मेथुर्दृढमिह सम्मदेन सर्वे ।

आविष्य द्वितयगणेऽपि सर्पराजे

वैवश्यं परिशमयन्नवीवृधस्तान् ॥८॥

उद्दामभ्रमणजवोन्नमद्गिरीन्द्र -

न्यस्तैकस्थिरतरहस्तपङ्कजं त्वाम् ।

अभ्रान्ते विधिगिरिशादयः प्रमोदा -

दुद्भ्रान्ता नुनुवुरुपात्तपुष्पवर्षाः ॥९॥

दैत्यौघे भुजगमुखानिलेन तप्तै

तेनैव त्रिदशकुलेऽपि किञ्चिदार्ते ।

कारुण्यात्तव किल देव वारिवाहाः

प्रावर्षन्नमरगणान्न दैत्यसङ्घान् ॥१०॥

उद्भ्राम्यद्बहुतिमिनक्रचक्रवाले

तत्राब्धौ चिरमथितेऽपि निर्विकारे ।

एकस्तवं करयुगकृष्टसर्पराजः

संराजन् पवनपुरेश पाहि रोगात् ॥११॥

॥ इति अमृतकथने कूर्मावतारवर्णनं सप्तविंशतितमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

एक बार महर्षि दुर्वासाने देवाङ्गनाके हाथसे प्राप्त हुए दिव्यमाल्यको स्वयं ले जाकर (ऐरावतपर चढ़कर जाते हुए ) इन्द्रको प्रदान किया । (परंतु इन्द्रने उसे ऐरावतके मस्तकपर डाल दिया ) पुनः जब उस दिव्य मालाको गजराज ऐरावतने कुचला डाला , तब महर्षिने इन्द्रको शाप दे दिया । भगवन् ! भला , आपसे भिन्न देवोंके अंशसे उत्पन्न हुए लोगोमें क्या क्षमा -भाव हैं ? ॥१॥

मोक्षप्राप्तिके स्थानभूत भगवन् ! जब शापके प्रभावसे देवराज इन्द्र शक्तिहीन हो गये और देवता भी असुरोंसे पराजित होकर निस्तेज हो गये , तब शिव आदि समस्त देवता ब्रह्माके पास गये और उन्हें साथ लेकर आपके निकट पहुँचे ॥२॥

उस समय ब्रह्मा आदि देवगण चिरकालतक आपकी महिमाका स्तवन करते रहे । तब आपने अपने परम ऐश्र्वर्यशाली रूपसे उनके समक्ष प्रकट होकर उन्हें यों आदेश दिया -‘हे देवगण ! तुललोग दैत्योंके साथ संधि करके अमृतके लिये समुद्र -मंथन करो ’ ॥३॥

तब देवताओंने दानवोंके साथ संधि कर ली । तत्पश्र्चात् वे अभिमानपूर्वक मन्थनके साधनभूत मन्दराचलको उठाकर ले चले । जब मन्दराचल (अधिक भारी होनके कारण देवासुरोंके हाथसे छूटकर ) गिर पड़ा तब आपने तुरंत ही उसे बेरके सदृश उठज्ञकर गरुडपर रख लिया और लाकर क्षीरसमुद्रमें डाल दिया ॥४॥

तदन्तर शीघ्र ही उन देवासुरोंने वासुकि नागको नेती बनाकर सम्पूर्ण बीजसमूहोंसे परिपूर्ण समुद्रका मन्थन आरम्भ किया । उस समय आपने किसी बहानेसे असुरोंको वासुकि नागके मुखकी ओर लगा दिया ॥५॥

मन्दराचलके घूमनेसे समुद्रका भीतरी भाग क्षुब्ध हो उठा । उस समयी भारी भारके कारण वह पर्वत क्षीरसागरमें डूब गया । तब देवताओंको अतिशय व्यथित देखकर उनके हितैषी आपने कठोर पीठवाली कच्छप -मूर्ति धारण की ॥६॥

विष्णो ! आपकी उस मूर्तिका पृष्ठभाग वज्रसे भी बढ़कर कठोर था तथा विस्तारमें वह मूर्ति एक लाख योजनमें व्याप्त थी । अपनी उस कच्छप -मूर्तिसे क्षीरसागरके अन्तस्तलमें पहुँचकर आपने डूबे हुए पर्वतराज मन्दराचलको ऊपर उठा लिया ॥७॥

तब पर्वतराजके ऊपर निकल आनेपर तुरंत ही सब लोग गर्वयुक्त हो दृढतापूर्वक मन्थन करने लगे । उस समय आप दोनों देवगण तथा असुरगणमें और सर्पराज वासुकिमें भी सूक्ष्मरूपसे प्रवेश करके उनकी विवशता (थकावट )-को शान्त करते हुए उन्हें बल -वीर्यसे सम्पन्न करते रहे ॥८॥

अतिशय वेगपूर्वक भ्रमण करनेसे ऊपर उछलते हुए पर्वतराजपर आपने अपना एक सदृढ़ हस्तकमल स्थापित कर रखा था । उस समय मेघमार्गमें स्थित ब्रह्मा -शिव आदि देव हर्षसे उद्भ्रान्त हो पुष्पवृष्टि करते हुए आपका स्तवन कर रहे थे ॥९॥

देव ! जब वासुकिनागके मुखे निकले हुए श्र्वाससे दैत्यसमुदाय संतप्त हो उठा और उसीसे देवगण भी कुछ पीडित हो गया , तब आपकी कृपासे मेघोंने जलकी वृष्टि की ; वह वृष्टि देगणोंपर ही हुई , असुरसमूहोंपर नहीं ॥१०॥

उछलते हुए बहुत -से तिमि नामक महामत्स्यों तथा ग्राहसमूहोंसे व्याप्त उस समुद्रमें मन्दराचलसे चिरकालतक मथे जानेपर भी जब कोई विकार लक्षित नहीं हुआ , तब अकेले आप अपने दोनों हाथोंसे सर्पराजको खींचते हुए सुशोभित हुए । पवनपुरेश ! रोगसे मेरी रक्षा कीजिये ॥११॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:48.8970000

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