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चतुर्थस्कन्धपरिच्छेदः - षोडशदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


नर-नारायणका चरित तथा दक्ष-यज्ञका वर्णन

दक्षो विरिञ्चतनयोऽथ मनोस्तनूजां

लब्ध्वा प्रसूतिमिह षोडश चाप कन्याः ।

धर्मे त्रयोदश ददौ पितृष स्वधां च

स्वाहां हविर्भूजि सतीं गिरिशे त्वदंशे ॥१॥

मूर्तिहि धर्मगृहिणी सुषुवे भवन्त

नारायणं नरसखं महितानुभावम् ।

यज्जन्मनि प्रमुदिताः कृततूर्यघोषाः

पुष्पोत्करान् प्रववृषुर्नुनुवः सुरौघाः ॥२॥

दैत्यं सहस्रकवचं कवचैः परीतं

साहस्त्रवत्सरतपःसमराभिलभ्यैः ।

पर्यायनिर्मिततपस्समरौ भवन्तौ

शिष्टैककङ्कटममुं न्यहतां सलीलम् ॥३॥

अन्वाचरन्नुपदिशन्नपि मोक्षधर्मं

त्वं भ्रातृमान् बदरिकाश्रममध्वसात्सीः ।

शक्रोऽथ ते शमतपोबलनिस्सहात्मा

दिव्याङ्गनापरिवृतं प्रजिघाय मारम् ॥४॥

कामो वसन्तमलयानिलबन्धुशाली

कान्ताकटाक्षविशिखैर्विकसद्विलासैः ।

विध्यन्मुहुर्मुहुरकम्पमुदीक्ष्य च त्वां

भीतस्त्वयाथ जगदे मृदुहासभाजा ॥५॥

भीत्यालमङ्गज वसन्त सुराङ्गना वो

मन्मानसं त्विह जुषध्वमिति ब्रुवाणः ।

तवं विस्मयेन परितः स्तुवतामथैषां

प्रादर्शयः स्वपरिचारककातराक्षीः ॥६॥

सम्मोहनय मिलिता मदनादयस्ते

त्वद्दसिकापरिमलैः किल मोहमापुः ।

दत्तां त्वया च जगृहुस्त्रपयैव सर्व -

स्वर्वासिगर्वशमनीं पुनरुर्वशीं ताम् ॥७॥

दृष्ट्वोर्वशीं तव कथां च निशम्य शक्रः

पर्याकुलोऽजनि भवन्महिमावमर्शात् ।

एवं प्रशान्तरमणीयतरावतारा -

त्त्वत्तोऽधिको वरद कृष्णतनुस्त्वमेव ॥८॥

दक्षस्तु धातुरतिलालनया रजोऽन्धो

नात्यादृतस्त्वयि च कष्टमशान्तिरासीत् ।

येन व्यरुन्ध स भवत्तनुमेव शर्वं

यज्ञे च वैरपिशुने स्वसुतां व्यमानीत् ॥९॥

क्रुद्धेशमर्दितमखः स तु कृत्तशीर्षो

देवप्रसादितहरादथ लब्धजीवः ।

त्वत्पूरितक्रतुवरः पुनराप शान्तिं

स त्वं प्रशान्तिकर पाहि मरुत्पुरेश ॥१०॥

॥ इति नरनारायणावतारवर्णनं षोडशदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

ब्रह्माके पुत्र दक्षने स्वायम्भुव मनुकी तनया प्रसूतिको पत्नीरूपमें प्राप्त करके उससे सोलह कन्याएँ उत्पन्न की । उनमेंसे श्रद्धा , मैत्री आदि तेरह कन्याएँ धर्मको , स्वधा पितरोंको , स्वाहा अग्निको तथा सती आपके स्वरूपभूत शंकरको पत्नीरूपमें प्रदान कर दी ॥१॥

धर्मकी तेरह पत्नियोंमें मूर्तिने अप्रमेय महिमशाली नरसहित आप नारायणको जन्म दिया । आपके जन्म -कालमें सुर -समुदाय हर्षोल्लसित होकर दुन्दुभियॉं बजाने लगे और पुष्प -समूहोंकी वृष्टि करके आपके स्तवनमें तन्मय हो गये ॥२॥

सहस्रकवच नामक दैत्य प्राकृतिक सहस्र कवचोंसे सनद्ध था , जिनका छेदन हजार तपस्या और युद्ध करनेसे ही किया जा सकता था । तब आप दोनों नर -नारायणने हजार वर्षोंतक बारी -बारीसे तप और युद्ध किया । जब उसका एकमात्र कवच अवशिष्ट रहा गया , तब आपलोगोंने उेस मार डाला ॥३॥

तदनन्तर आप लोकसंग्रहार्थ स्वयं मोक्ष -धर्मका अनुष्ठान करते हुए तथा नारद आदिको भी उसका उपदेश करते हुए अपने भ्राता नरके साथ बदरिकाश्रममें निवास करने लगे । तब जिनका मन आपके इन्द्रियनिग्रह तथा तपोबलको देखकर ईर्ष्यालु हो गया था , उन इन्द्रदेवने अप्सराओंके साथ कामदेवको (तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये ) आपके पास भेजा ॥४॥

उस समय कामदेवके साथ उसके बन्धु वसन्त और मलयानिल भी थे । वहॉं पहूँचकर उसने जिनसे विलासकी भावनाएँ अभिव्यक्त हो रही थी , ऐसे अप्सराओंके कटाक्ष -बाणोंद्वारा आपको बारंबार बींधना आरम्भ किया । परंतु आप अपनी समाधिसे विचलित नहीं हुए । यह देखकर कामदेव भयभीत हो गया । तब आपने मन्द मुसकानपूर्वक उससे कहा — ॥५॥

‘ कामदेव वसन्त और अप्सराओ ! तुमलोग भय मत करो । यहॉं मेरे निकट आकर मेरे चित्तका अनुवर्तन करो । ’ आपके यों कहनेपर वे विस्मयपूर्वक कुछ निकट जाकर आपकी स्तुति करने लगे । तब आपने उन्हें ( अपने योगबलसे उत्पन्न करके ) अपनी श्रुश्रूषा करनेवाली बहुतसी सुन्दरी स्त्रियॉं दिखलायी ॥६॥

मदन आदि संगठित होकर आपको मोहमें डालनेके लिये आये थे , परंतु आपकी दासियोंके अङ्गोंकी सुगन्धसे वे स्वयं ही मोहको प्राप्त हो गये । तदनन्तर जो समस्त स्वर्गवासियोंके गर्वका शमन करनेवाली थी , उस उर्वशीको आपने उन्हें प्रदान कर दिया और उन्होंने लजाते हुए ही उसे ग्रहण कर लिया ॥७॥

( स्वर्गमें ) उर्वशीको देखकर और आपका वृत्तान्त सुनकर इन्द्र आपकी महिमाको न जाननेके कारण अत्यन्त व्याकुल हो गये । वरद ! इस प्रकार आपसे बढ़कर प्रशान्त तथा परम रमणीय अवतार अन्य नहीं है , आपसे अधिक तो श्रीकृष्णस्वरूप आप ही हैं ॥८॥

कष्टकी बात हैं कि ब्रह्माके अत्यन्त लाड़ -प्यार करनेके कारण प्रजापति दक्ष रजोगुणजनित रागसे अंधे हो गये थे । इसी कारण वे आपके प्रति भी अधिक आदर नहीं रख रहे थे , जिससे उनकी शान्ति नष्ट हो गयी थी । अशान्त होनेके कारण ही उन्होंने आपके स्वरूपभूत शंकरसे विरोध किया और शत्रुता सूचित करनेवाले उस यज्ञमें अपनी कन्या सतीकी भी अवमानना की ॥९॥

अपनी प्रियाके अपमानसे क्रुद्ध हुए शंकरद्वारा जिनका यज्ञ नष्टभ्रष्ट किया तथा सिर काट लिया गया था , उन दक्षको देवोंद्वारा प्रसन्न किये गये शिवजीसे ही पुनः जीवन की प्राप्ति हुई । तदनन्तर आपने उनके उस श्रेष्ठ यज्ञको पूर्ण कर दिया और वे पुनः शान्तिको प्राप्त हुए । प्रशान्तिकर ! मरुत्पुरेश ! ऐसे प्रभावशाली आप मेरी रक्षा कीजिये ॥१०॥


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Last Updated : 2016-11-11T11:54:48.1300000

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