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तृतीयस्कन्धपरिच्छेदः - द्वादशदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


वराहावतार और भूमिके उद्धारका वर्णन

स्वायम्भुवो मनुरथो जनसर्गशीलो

दृष्ट्वा महीमसमये सलिले निमग्राम ।

स्रष्टारमाप शरणं भवदङ्ध्रिसेवा -

तुष्टाशयं मुनिजनैः सह सत्यलोके ॥१॥

कष्टं प्रजाः सृजति मय्यवनिर्निमग्ना

स्थानं सरोजभव कल्पय तत्प्रजानाम् ।

इत्येवमेष कथितो मनुना स्वयम्भू -

रम्भोरुहाक्ष तव पादयुगं व्यचिन्तीत् ॥२॥

हा हा विभो जलमहं न्यपिबं पुरस्ता -

दद्यापि मज्जति मही किमहं करोमि ।

इत्थं त्वदङ्ध्रियुगलं शरणं यतोऽस्य

नासापुटात् समभवश्शिशुकोलरूपी ॥३॥

अङ्गुष्ठमात्रवपुरुत्पतितः पुरस्ताद्

भूयोऽथ कुम्भिसदृशः समजृम्भथास्त्वम् ।

अभ्रे तथाविधमुदिक्ष्य भवन्तमुच्चै -

र्विस्मेरतां विधिरगात् सह सूनुभिः स्वैः ॥४॥

कोऽसावचिन्त्यमहिमा किटिरुत्थितो मे

नासापुटात् किमु भवेदजितस्य माया ।

इत्थं विचिन्तयति धातरि शैलमात्रः

सद्यो भवन् किल जगर्जिथ घोरघोरम् ॥५॥

तं ते निनादमुपकर्ण्य जनस्तपःस्था

सत्यस्थिताश्र्च मुनयो नुनुवुर्भवन्तम् ।

तत्सतोत्रहर्षुलमनाः परिणद्य भूय -

स्तोयाशयं विपुलमूर्तिरवातरस्त्वम् ॥६॥

ऊर्ध्वप्रसारिपरिधूम्रविधूतरोमा

प्रोत्क्षिप्तवालधिरवाङ्मुखघोरघोणः ।

तूर्णप्रदीर्णजलदः परिघूर्णदक्ष्णा

स्तोतृन् मुनीन् शिशिरयन्नवतेरिथ त्वम् ॥७॥

अन्तर्जलं तदनु सङ्कुलनक्रचक्रं

भ्राम्यत्तिमिङ्गिलकुलं कलुषोर्मिमालम् ।

आविश्य भीषणरवेण रसातलस्था -

नाकम्पयन् वसुमतीमगवेषयस्त्वम् ॥८॥

दृष्टाथ दैत्यहतकेन रसातलान्ते

संवेशितां झटिति कूटकिटिर्विभो त्वम् ।

आपातुकानविगणय्य सुरारिखेटान्

दंष्ट्राङ्कुरेण वसुधामदधाः सलीलम् ॥९॥

अभ्युद्धरन्नथ धरां दशनाग्रलग्न -

मुस्ताङ्कुराङ्कित इवधिकपीवरात्मा ।

उद्धूतघोरसलिलाज्जलधेरुदञ्चन्

क्रीडावराहवपुरीश्र्वर पाहि रोगात् ॥१०॥

॥ इति वराहावतारवर्णनं द्वादशदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

तदनन्तर प्रजोत्पादनमें तत्पर स्वायम्भुव मनु असमयमें ही पृथ्वीको प्रलयार्णवमें निमग्न देखकर मुनिजनोंके साथ सत्यलोकमें स्थित ब्रह्माकी शरणमें गये । उस समय आपके चरणकमलकी उपासनासे ब्रह्माका मन संतुष्ट था ॥१॥

( मनु बोले —) कमलोद्भव ! बड़े कष्टकी बात है , मेरे प्रजाकी सृष्टि प्रारम्भ करते ही पृथ्वी प्रलय - जलमें निमग्न हो गयी , अतः अब आप जीवोंके लिये स्थानकी कल्पना कीजिये । कमलनयन ! मनुद्वारा यों कहे जानेपर वे स्वयम्भू ब्रह्मा आपके चरणयुगलका ध्यान करने लगे ॥२॥

( ब्रह्मा फिर बोले —) ‘ विभो ! महान् आश्र्चर्य एवं दुःख है , सुष्टिके आदिमें मैनें सारा जल पी लिया था ; परंतु यदि आज भी पृथ्वी डूब रही है तो मैं क्या करूँ ?’ यों कहते हुए आपके चरणयुगलके शरणागत ब्रह्माके नासापुटसे वराहके शिशुरूपमें आप प्रकट हो गये ॥३॥

पहले आप अङ्गमात्र परिमाणवाला शरीर ग्रहणकर उत्पन्न हुए , तत्पश्र्चात् पुनः बढ़कर हाथीके समान हो गये । इस प्रकार बढ़कर ऊँचे मेघेमार्गमें पहुँचे हुए आपको देखकर अपने (मरीचि आदि ) पुत्रोंसहित ब्रह्मा विस्मय -विभोर हो गये ॥४॥

उस समय ‘यह अचिन्त्य प्रभावशाली सूकर , जो मेरे नासापुटसे उत्पन्न हुआ है , कौन है ? यह अजेय भगवान् विष्णुकी माया तो नहीं है ?’ कहते हैं , ब्रह्माके यों विचार -विमर्श करते ही आपका शरीर तुरंत पर्वतसदृश हो गया तथा आपने अत्यन्त भयंकर गर्जना की ॥५॥

आपके उस गर्जन शब्दको सुनकर जनलोक , तपोलोक तथा सत्यलोकनिवासी मुनिगण आपकी स्तुति करने लगे । उस स्तवनसे आपका चित्त प्रसन्न हो गया । फिर तो आप पूर्वापेक्षा विशाल शरीर धारण करके गरजते हुए उस प्रलयाब्धिके जलमें उतर पड़े ॥६॥

उस समय आपके शरीरके कृष्ण -लोहित रंगके रोएँ ऊपर उठकर कुछ -कुछ हिल रहे थे , भयंकर नासिका (थूथुन ) अधोमुख हो गयी थी और पूँछ ऊपरको उठ रही थी । जिससे अनायास ही बादलोंके टुकड़े -टुकड़े हो गये थे । तब आप अपने परिघूर्णमान नेत्रोंद्वारा उन स्तवन करनेवाले मुनियोंको शीतलता (आनन्द ) प्रदान करते हुए उस जलमें विहार करने लगे ॥७॥

तदनन्तर जो ग्राह -समूहसे व्याप्त था , जिसमें तिमिङ्गिल नामक महामत्स्योंका समुदाय इधर -उधर भ्रमण कर रहा था तथा (जलके क्षुब्ध होनेके कारण ) जिसकी तरङ्गमालाएँ मटमैली हो गयी थीं , उस जलके भीतर घुसकर आप अपने भयंकर निनादसे रसातलमें स्थित जीवोंको सर्वथा कम्पित करते हुए पृथ्वीकी खोज करने लगे ॥८॥

विभो ! तत्पश्र्चात् असुराधम हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें रखी हुई पृथ्वीको देखकर मायावराहवपुधारी आपने आक्रमण करनेवाले नीच राक्षसोंकी अवहेलना करके शीघ्र ही उस वसुधाको अपनी दाढ़ोंके अग्रभागपर लीलापूर्वक धारण कर लिया ॥९॥

यों वसुधाका उद्धार करके अत्यन्त क्षुब्ध भयंकर जलवाले उस प्रलय -समुद्रसे बाहर निकलते समय आपकी वैसी ही शोभा हो रही थी , जैसी गढ़ैयोंमें मोथाकी जड़ खोदते समय दाढ़ोंके अग्रभागके मुस्ताङ्कुरसे चिह्नित होनेके कारण अन्य साधारण सूकरकी होती है । उस समय आपका शरीर अधिक स्थूल हो गया था । क्रीडार्थ सूकरका शरीर धारण करनेवाले ईश्र्वर ! आप इस रोगसे मेरी रक्षा कीजिये ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:47.8200000

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CENNĀSU NAṀBŪTIRI(चेन्नासु)

  • Cennās Nārāyaṇan Nambūtirippād was born and bred up in Kerala. He was born in Vanneri in Ponnāni Taluk in the year 1428 A.D. His father was Ravi Nambūtirippād of Bhārgava gotra. Besides his book ‘Tantrasamuccaya’ he has written a book ‘Mānavavāstulakṣaṇa’. This book is called ‘Manuṣyālayacandrikā’ also. 
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