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तृतीयस्कन्धपरिच्छेदः - अष्टमदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


प्रलयान्तर जगत्‍की सृष्टिका वर्णन

एवं तावत् प्राकृतप्रक्षयान्ते

ब्राह्मे कल्पे ह्यादिमे लब्धजन्मा ।

ब्रह्मा भूयस्त्वत्त एवाप्य वेदान्

सृष्टिं चक्रे पूर्वकल्पोपमानाम् ॥१॥

सोऽयं चतुर्युगसहस्त्रमितान्यहानि

तावन्मिताश्र्च रजनीर्बहुशो निनाय ।

निद्रात्ससौ त्वयि निलीय समं स्वसृष्टै -

नैमित्तिकप्रलयमाहुरतोऽस्य रात्रिम् ॥२॥

अस्मादृशां पुनरहर्मुखकृत्यतुल्यां

सृष्टिं करोत्यनुदिनं स भवत्प्रसादात् ।

प्राग्ब्राह्मकल्पजनुषां च परायुषां तु

सुप्तप्रबोधनसमस्ति तदापि सृष्टिः ॥३॥

पञ्चशदब्दमधुना स्ववयोऽर्धरूपमेकं

परार्धमतिवृत्य हि वर्ततेऽसी ।

तत्रान्त्यरात्रिजनितान् कथयामि भूमन्

पश्र्चाद्दिनावतरणे च भवद्विलासान् ॥४॥

दिनावसानेऽथ सरोजयोनिः सुषुप्तिकामस्त्वयि

संनिलिल्ये । जगन्ति च त्वज्जठरं समीयुस्तदेदमेकार्णवमास विश्र्वम् ॥५॥

ततैव वेषे फणिराजशेषे जलैकशेषे भुवने स्म शेषे ।

आनन्दसान्द्रानुभवस्वरूपः स्वयोगनिद्रापरिमुद्रितात्मा ॥६॥

कालाक्ष्यशक्तिं प्रलयवसाने प्रबोधयेत्यादिशता किलादौ ।

त्वया प्रसुप्तं परिसुप्तशक्तिव्रजेन तत्राखिलजीवधाम्ना ॥७॥

चतुर्युगाणां च सहस्त्रमेवं त्वयि प्रसुप्ते पुनरद्वितीये ।

कालाख्यशक्तिः प्रथमप्रबुद्धा प्राबोधयत्त्वां किल विश्र्वनाथ ॥८॥

विबुध्य च त्वं जलगर्भशायिन्

विलोक्य लोकानखिलान् प्रलीनान् ।

तेष्वेव सूक्ष्मात्मतया निजान्तः -

स्थितेषु विश्र्वेषु ददाथ दृष्टिम् ॥९॥

ततस्त्वदीयादयि नाभिरन्ध्रादुदञ्चितं किंचन दिव्यपद्मम् ।

निलीननिश्शेषपदार्थ मालासंक्षेपरूपं मुकुलायमानम् ॥१०॥

तदेतदम्भोरुहकुड्मलं ते कलेवरात्तोयपथे प्ररूढम् ।

बहिर्निरीतं परितः स्फुरद्भिः स्वधामभिर्ध्वान्तमलं न्यकृन्तत् ॥११॥

सम्फुल्लपत्रे नितरां विचित्रे तस्मिन् भवद्वीर्यधृते सरोजे ।

स पद्मजन्मा विधिराविरासीत् स्वयम्प्रबुद्धखिलवेदराशिः ॥१२॥

अस्मिन् परात्मन् ननु पाद्मकल्पे त्वमित्थमुत्थापितपद्मयोनिः ।

अनन्तभूमा मम रोगराशिं निरुन्धि वातालयवास विष्णो ॥१३॥

॥ इति प्रलयजगत्सृष्ट्योर्वर्णनमष्टमदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

भगवन् ! यों प्राकृत प्रलयके अन्तमें आदिम ब्राह्म -क्ल्पमें पुनः जन्म ग्रहण करके ब्रह्माजीनें आपसे ही ऋृगादि वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया और पुनः पूर्वकल्पके अनुसार सृष्टिकी रचना की ॥१॥

उन ब्रह्माका एक दिन एक सहस्र चतुर्युगीके परिमाणवाला होता है तथा उनकी रात्रिका भी परिमाण उतना ही है । इस प्रकार उन्होंने बहुत -से दिन और रातें व्यतीत कीं ; तदनन्तर वे स्व -रचित समस्त चराचर जगत्के साथ अपने -आपको नारायणमें विलीन करके जब निद्राके वशीभूत हो जाते हैं , तब ब्रह्माजीकी उस रात्रिको नैमित्तिक प्रलय कहा जाता है ॥२॥

जैसे हमलोग प्रतिदिन प्रातःकालिक कृत्योंका अनुष्ठान करते हैं , उसी प्रकार ब्रह्मा आपकी कृपासे प्रत्येक दिनके प्रारम्भमें सृष्टि करते रहते हैं ; जिनका जन्म ब्राह्म कल्पकेपूर्व हुआ है तथा जिनकी आयु दो परार्धके परिमाणकी (अर्थात् ३१ ,१० ,४० ,०० ,०० ,०० ,००० मानव वर्षोंकी ) है ऐसे ब्रह्माओंके लिये यह सृष्टि सोनेके बाद जागरणके समान होती है ॥३॥

भूमन् ! वही ब्रह्मा इस समय अपनी आयुके अर्धभागरूप पचास वर्षको , जो एक परार्ध कहलाता है , व्यतीत कर चुके हैं । अब मैं उस प्रथम परार्धकी अन्तिम रात्रि तथा द्वितीय परार्धके दिवसारम्भमें घटित होनेवाली आपकी सृष्टि -प्रलयसम्बन्धिनी लीलाओंका वर्णन करता हूँ ॥४॥

तदनन्तर दिनकी समाप्तिके समय जब कमलयोनि ब्रह्माको शयन करनेकी इच्छा हुई , तब वे आप नारायणमें विलीन हो गये । फिर तो उनके साथ ही सारे लोक आपके उदरमें समा गये । उस समय यह विश्र्व एकार्णव (केवल जल ) मात्र शेष रह गया ॥५॥

इस प्रकार सम्पूर्ण भुवनके एकार्णवमें विलीन हो जानेपर आनन्दघनानुभवस्वरूप आप अपने ही अङ्गभूत नागराज शेषपर शयन करने लगे। उस समय आपने अपने स्वरूपको योगनिद्राके आवरणद्वारा सब ओरसे आवृत कर लिया था ॥६॥

उस समय प्रलयके आरम्भमें जिनमें शक्तियोंका समूह विलीन हो गया है तथा जो अखिल जीवोंके विश्रामस्थान हैं , ऐसे आप कालनाम्नी शक्तिको ‘प्रलयके अवसान होनेपर मुझे जगा देना ’, यों आदेश देकर (उस कालशक्तिके साथ ही )

सो गये ॥७॥

विश्र्वनाथ ! इस प्रकार आप अद्वितीय परमेश्र्वरके एक सहस्र चतुर्युगीके समयतक शयन करते रहनेपर कालशक्तिकी निद्रा पहले भङ्ग हुई। तब , कहते हैं , उसने आपको जगाया ॥८॥

एकार्णवके मध्यमें शयन करनेवाले भगवन् ! जागनेपर जब आपने समस्त लोकोंको अपनेमें ही विलीन देखा , तब सूक्ष्मरूपसे अपने अंदर ही स्थित इन लोकोंकी ओर दृष्टिपात किया ॥९॥

अयि भगवन् ! तत्पश्र्चात् आपके नाभि -छिद्रसे एक दिव्य कमल उद्भुत हुआ , जो अभी मुकुलित -अवस्थामें ही था । वह आपमें विलीन समस्त पदार्थसमूहोंका मानो संक्षेपरूप (बीजभूत ) था ॥१०॥

वह कमलका कुड्मल उस जलावृत प्रदेशमें आपके शरीरसे अङ्कुरित होकर जलके बाहर निकला । तत्पश्र्चात् उसने चतुर्दिक् चमकते हुए अपने तेजःपुञ्चसे अन्धकारका पूर्णतः विनाश कर दिया ॥११॥

आपके योगबलसे धारित वह कमल अत्यन्त विचित्र था , उसके दल भलीभॉंति विकसित हो रहे थे ; उसी कमलपर पूर्वोक्त पद्मजन्मा ब्रह्माका अविर्भाव हुआ , जिन्हें सम्पूर्ण वेद -समूहका ज्ञान (आपकी कृपासे ) स्वयं ही हो गया था ॥१२॥

परमात्मन् ! इस प्रकार पाद्मकल्पमें आपने पद्मयोनि ब्रह्माको आविर्भूत किया था । विष्णो ! आपकी महिमा अनन्त है । गुरुवायुपुरके वासी भगवन् ! मेरे रोगसमूहका नाश कीजिये ॥१३॥


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Last Updated : 2016-11-11T11:54:47.6000000

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ध्रुवपदीं बसविणें

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  • अढळ, कायमस्थानीं ठेवणें. 
  • वैभवशाला चढविणें. 
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