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प्रथमस्कन्धपरिच्छेदः - द्वितीयदशकम्

श्रीनारायणके दूसरे रूप भगवान् ‍ श्रीकृष्णकी इस ग्रंथमे स्तुति की गयी है ।


भगवद्रूप तथा भगवद्भक्तिका वर्णन

सूर्यस्पर्धिकिरीटमूर्ध्वतिलकप्रोद्भासिफालान्तरं

कारुण्याकुलनेत्रमार्द्रहसितोल्लासं सुनासापुटम ।

गण्डोद्यन्मकराभकुण्डलयुगं कण्ठोज्ज्वलत्कौस्तुभं

त्वद्रूपं वनमाल्यहारपटलश्रीवत्सदीप्रं भजे ॥१॥

केयूराङ्गदकङ्कतगदाशङ्खरिपङ्केरुहाम् ।

कांचित् काञ्चनकाञ्चिलाञ्छतलसत्पीताम्बरालम्बिनी

मालम्बे विमलाम्बुजद्युतिपदां मूर्ति तवार्तिच्छिदम् ॥२॥

यत् त्रैलोक्यमहीयसोऽपि महितं सम्मोहनं मोहनात्

कान्तं कान्तिनिधानतोऽपि मधुरं माधुर्यधुर्यादपि ।

सौंन्दर्योत्तरतोऽपि सुन्दरतरं त्वद्रूपमाश्र्चर्यतो

ऽप्याश्र्चर्यं भुवने न कस्य कुतुकं पुष्णाति विष्णो विभो ॥३॥

तत्तादृङमधुरात्मकं तव वपुः सम्प्राप्य सम्पन्मयी

सा देवी परमोत्सुका चिरतरं नास्ते स्वभक्तेष्वपि ।

तेनास्या बत कष्टमच्युत विभो त्वद्रूपमानोज्ञक

प्रेमस्थैर्यमयादचापलबलाच्चापल्यवार्तोदभूत् ॥४॥

लक्ष्मीस्तावकरामणीयकहृतैवेयं परेष्वस्थिरे -

त्यस्मिन्नन्यदपि प्रमाणमधुना वक्ष्यामि लक्ष्मीपते ।

ये त्वद्ध्यानगुणानुकीर्तनरसासक्ता हि भक्ता जना -

स्तेष्वेषा वसति स्थिरैव दयितप्रस्तावदत्तादरा ॥५॥

एवंभूतमनोज्ञतानवसुधानिष्यन्दसंदोहनं

त्वद्रूपं परिचद्रसायनमयं चेतोहरं श़ृण्वताम् ।

सद्यः प्रेरयते मतिं मदयते रोमाञ्चयत्यङ्गकं

व्यासिञ्चत्यपि शीतबाष्पविसरैरानन्दमूर्च्छोद्भवैः ॥६॥

एवंभूततया हि भक्त्याभिहितो योगः स योगद्वयात्

कर्मज्ञानमयाद् भृशोत्तरतरो योगीश्र्वरैर्गीयते ।

सौन्दर्यैंकरसात्मके त्वयि खलु प्रेमप्रकर्षात्मिका

भक्तिर्निःश्रममेव विश्र्वपुरुषैर्लभ्या रमावल्लभ ॥७॥

निष्कामं नियतस्वधर्मचरणं यत्कर्मयोगाभिधं

तद्दूरेत्यफलं यदौपनिषदज्ञानोपलभ्यं पुनः।

तत्त्वव्यक्तया सुदुर्गमतरं चित्तस्य तस्माद् विभो

त्वत्प्रेमात्मकभक्तिरेव सततं स्वादीयसी श्रेयसी ॥८॥

अत्यायासकराणि कर्मपटलान्याचर्य निर्यन्मला

बोधे भक्तिपथेऽथवाप्युचिततामायान्ति किं तावता ।

क्लिष्ट्वा तर्कपथे परं तव वपुर्ब्रह्माख्यमन्ये पुन -

श्र्चित्तार्दत्वमृते विचिन्त्य बहुभिः सिद्ध्यन्ति जन्मान्तरैः ॥९॥

त्वद्भक्तिस्तु कथारसामृतझरीनिर्मज्जनेन स्वयं

सिद्ध्यन्ती विमलप्रबोधपदवीमक्लेशतस्तन्वती ।

सद्यःसिद्धिकरी जयत्ययि विभो सैवास्तु मे त्वत्पदप्रेमप्रौढिरसार्द्रता

द्रुततरं वातालयाधीश्र्वर ॥१०॥

॥ इति भगवद्रूपादिवर्णनं द्वितीयदशकं समाप्तम् ॥

Translation - भाषांतर

जिसका किरीट अपनी प्रभासे सूर्यकी भी स्पर्धा कर रहा है , जिसका भालप्रदेश ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलकसे उद्भासित हो रहा है , जिसके नेत्र करुणासिन्धुसे परिपूर्ण है , प्रेमार्द होनेके कारण जो मन्द मुसकानसे युक्त है , जिसकी नासिका परम मनोहर है , जिसके गण्डस्थलमें दो लटकते हुए मकराकृति कुण्डल प्रतिबिम्बित हैं , कण्ठप्रदेश कौस्तुभमणिकी प्रभासे जगमगा रहा है तथा जो वनमाला , हारसमूह और श्रीवत्ससे उद्दीप्त हो रहा है , आपके उस रूपका मैं ध्यान करता हूँ ॥१॥

जिसकी शोभायमान चारों भुजाएँ केयूर , अङ्गद , कङ्कण , बहुमूल्य हार तथा रत्ननिर्मित अँगूठियोंसे अलंकृत और गदा , खङ्ख , चक्र एवं कमल धारण किये हुए हैं , जो सुवर्णकी करधनीके चिह्नसे सुशोभित चमकीला पीताम्बर धारण करनेवाली है , जिसके चरणोंकी द्युति निर्मल कमलके सदृश है तथा जो भक्तोंकी पीड़ाका छेदन करनेवाली है , आपकी किसी ऐसी अनिर्वचनीय मूर्तिका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ ॥२॥

सर्वव्यापक विष्णो ! आपका रूप त्रिलोकीकी महत्तम वस्तुसे भी महनीय , मोहकसे भी अत्यन्त मोहक , शोभाकी निधिसे भी बढ़कर परम शोभायमान , अति माधुर्यसम्पन्न वस्तुसे भी अतिशय मधुर , लोकोत्तर सौन्दर्यशालीसे भी सुंदर और अद्भुत आश्र्चर्ययुक्त वस्तुसे भी बढ़कर आश्र्चर्यजनक है , वह भुवनमें किसकी उत्कण्ठाको नहीं बढ़ाता है ? अर्थात् वह सबके लिये अत्यन्त उत्सुकता या कौतूहलका जनक है ॥३॥

अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले विभो ! आपके ऐसे अनुपम एवं मायुर्ययुक्त श्रीविग्रहको पाकर वह महालक्ष्मीदेवी परमोत्सुक होनेके कारण अपने भक्तोंके समीप भी चिरकालतक नही होती हैं —— चञ्चल ही बनी रहती है । आपके रूपकी रमणीयताके कारण आपके प्रति जो लक्ष्मीजीका सुस्थिर प्रेम है वही उनकी अचपलता है , उसीके बलसे वे अन्यत्र स्थिर नही हो पातीं , जिसके कारण इस लक्ष्मीके लिये ‘यह चपला है ’ ऐसी दुष्कीर्ति उद्भूत हई है । यह कितने कष्टकी बात है ॥४॥

लक्ष्मीपते ! आपके लोकोत्तर सौन्दर्यपर लुट जानेके कारण ही यह लक्ष्मी दूसरोंके यहॉं स्थिर नहीं रह पाती है । इस विषयमें मैं दूसरा प्रमाण भी बतलाता हूँ । (वह यह है कि ) जो आपके ध्यान तथा गुणानुकीर्तनके आनन्दमें आसक्त रहनेवाले भक्तजन हैं , उनकें यहॉं यह लक्ष्मी आप प्रेमास्पदके प्रस्तावको आदर देती हुई स्थिररूपसे ही निवास करती हैं ॥५॥

इस प्रकार जो मनोज्ञतारूप अभिनव अमृतद्रवकी वर्षा करनेवाला आपका रूप है , वह परम चिदान्दमय रसका निलय है , आपकी चर्चा सुननेवालोंकें चित्तको हर लेनेवाला है , तत्काल ही बुद्धिको प्रेरणा देकर उन्मत्त बना देता है — उसे आन्दपरवश कर देता है , शरीरको पुलकित करके उसे आनन्दकी वृद्धिसे उद्भूत हुऐ शीतल अश्रुप्रवाहोंके द्वारा भलीभॉंति सींच भी देता हैं ॥६॥

रमावल्लभ ! इस प्रकार भक्तिद्वारा अभिहित जो योग है वह कर्ममय तथा ज्ञानमय -इन दोनों योगोंसे अत्यन्त उत्कृष्ट हैं , ऐसा व्यास -नारदादि योगीश्र्वरोंने पुराणोंमें वर्णन किया हैं अतः एकमात्र सौन्दर्य -रसस्वरूप आपमें अतिशय प्रेमस्वरूपा भक्ति अनायास ही सभी पुरषोंद्वारा प्राप्त की जा सकती है ॥७॥

निष्काम कर्मयोग नामक जो शास्त्रविहित स्वधर्मका अनुष्ठान है , वह दूरवर्ती कालान्तरमें फल प्रदान करनेवाले है तथा जो उपनिषत्सम्बन्धी ज्ञानद्वारा प्रापणीय मोक्षरूप फल है , वह अव्यक्त होनेके कारण चित्तके लिये किसी प्रकार भी प्राप्त होने योग्य नही हैं । इसलिये विभो ! आपकी प्रेमलक्षणा भक्ति ही सदा अतिशय आस्वादनीय तथा श्रेष्ठ है ॥८॥

अत्यन्त परिश्रमसाध्य कर्मसमूहोंका अनुष्ठान करनेसे जिनके रागद्वेष्दादि मल नष्ट हो गये हैं ऐसे कुछ लोग ज्ञानमार्ग अथवा भक्तिमार्गमें अधिकार प्राप्त कर पाते हैं तथा अन्य कुछ लोग रागरहित हुए बिना वेदान्तमार्गमें परम कष्ट सहन करके आपके ब्रह्मस्वरूपकी चिन्तना करते है । तत्पश्र्चात् अनेकों जन्मोंकें बाद उन्हें फलकी सिद्धि होती है ; परंतु हम भक्तिमार्गियोंके लिये इससे क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ भी नहीं ॥९॥

अयि विभो ! जो आपके कथारसरूपी अमृतद्रवमें निरन्तर मज्जन करनेसे स्वयं सिद्ध होनेवाली , अनायास ही निर्मल ब्रह्मज्ञानके मार्गका विस्तार करनेवाली तथा तुरंत ही सिद्धि प्रदान करनेवाली है , आपकी वह भक्ति (कर्ममय तथा ज्ञानमय - इन दोनों योगोंसे ) उत्कृष्ट हो रही है । अतः वातालयाधीश्र्वर ! मेरे लिये आपके चरणकमलोंमें अनपायिनी प्रीतिरूपी रससे आर्द्र हुई व भक्ति ही शीघ्र सिद्ध हो ॥१०॥


References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:54:46.7870000

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कुंभा

  • पु. १ एक पक्षी . २ एक रानझाड . याच्या पानाचें इरलें करतात व सालीचें दोरखंड करतात . हें झाड मोठें होतें . व फळ बेलफळांसारखें गोड असतें . ३ धोतरा ; एक औषधी झुडुप ; याची फुलें शंकराला वाहतात . पानें औषधोपयोगी आहेत . यास दुधाणी , शेतवड , शेताड हींहि नावें आहेत . ( सं . कुंभ ) 
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