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अध्याय एकतीसावा - श्लोक १ ते ५०

श्रीधरस्वामी रचित ’ श्रीरामविजय ’ ग्रंथाचे पारायण केल्याने जीवनातील वनवास संपून सुख प्राप्त होते .


श्लोक १ ते ५०

श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः ॥

जो रणरंगधीर रघुवीर ॥ रविकुळमंडण राजीवनेत्र ॥ रजनीचरांतक ॥ रमणीयगात्र ॥ राजेश्वर रमापति ॥१॥

आत्माराम अयोध्यानाथ ॥ आनंदरूप अक्षय अव्यक्त ॥ परात्पर अमल नित्य ॥ आद्य अनंत अनादि जो ॥२॥

जो कर्ममोचक कैवल्यदानी ॥ करुणासमुद्र कार्मुकपाणी ॥ बंधच्छेदक कल्मष जाळूनी ॥ करी कल्याण भक्तांचें ॥३॥

परमानंदा पुराणपुरुषा ॥ पद्मजातजनका पयोनिधिवासा ॥ पंकजनेत्रा परमहंसा ॥ पशुपतिहृदयजीवना ॥४॥

मनमोहना मंगलधामा मंगलधामा ॥ मुनिजनहृदया मेघश्यामा ॥ मायातीता मनविश्रामा ॥ मानववेषधारका ॥५॥

दीनदयाळा दशरथनंदना ॥ दशमुखांतका दुष्ट दलना ॥ दानवरिपुदरिद्रच्छेदना ॥ दशावतारवेषधारका ॥६॥

तिसावे अध्यायीं अनुसंधान ॥ सुलोचना प्रवेशली अग्न ॥ यावरी विंशतिनयन ॥ चिंताक्रांत शोक करी ॥७॥

बंधु पुत्र पडिले रणीं ॥ आतां पाठिराखा न दिसे कोणी ॥ तों विद्युज्जिव्ह ते क्षणीं ॥ प्रधान बोलता जाहला ॥८॥

म्हणे अहिरावण महिरावण ॥ पाताळीं राहती दोघेजण ॥ ते कापट्यविद्येंकरून ॥ राम सौमित्रां नेतील ॥९॥

कालिकापुढें तत्काळीं ॥ समर्पितील दोघांचे बळी ॥ ऐसें ऐकतां दशमौळी ॥ परम संतोष पावला ॥१०॥

रावणें पत्र पाठविलें लिहून ॥ तत्काळ प्रकटले दोघेजण ॥ कीं ते कामक्रोधचि येऊन ॥ अहंकारासी भेटले ॥११॥

त्या दोघांसी अलिंगून ॥ मयजापति करी रुदन ॥ इंद्रजिताचें वर्तमान ॥ दोघांप्रति निवेदिलें ॥१२॥

यावरी ते दोघे बोलत ॥ आतां गत शोक ते बहु असोत ॥ सौमित्र आणि रघुनाथ ॥ रजनीमाजी नेऊं तयां ॥१३॥

मग वरकड सेनेचा संहार ॥ करावया तुम्हां काय उशीर ॥ ऐकतां दशकद्वयनेत्र ॥ परम संतोष पावला ॥१४॥

तों बिभीषणाचे दोघे प्रधान ॥ गुप्तरूपें गोष्टी ऐकून ॥ तिहीं पवनवेगें जाऊन ॥ कथिलें रावणानुजासी ॥१५॥

तेणें नळ नीळ जांबुवंत ॥ मारुतीयांसी केलें श्रुत ॥ हनुमंतें पुच्छदुर्ग अद्भुत ॥ सेनेभोंवतां रचियेला ॥१६॥

वेढियावरी वेढे घालूनी ॥ वज्रदुर्ग उंचविला गगनीं ॥ वरी ठायीं ठायीं द्रुमपाणी ॥ गात बैसले सावध ॥१७॥

निशा गहन ते काळीं ॥ कीं काळपुरुषाची कांबळी ॥ कीं जगावरी खोळ घातली ॥ अज्ञानाची अविद्येनें ॥१८॥

निशीमाजी पक्षी बहुत ॥ वृक्षीं नानाशब्द करित ॥ रिसें वडवाघुळें तेथ ॥ लोळकंबती शाखेवरी ॥१९॥

भूतें आणि यक्षिणी ॥ गोंधळ घालिती महावनीं ॥ महाज्वाळरूप दावूनी ॥ गुप्त होती अप्सरा ॥२२॥

स्मशानीं मातले प्रेतगण ॥ भयानक रूपें दारुण ॥ छळिती अपवित्रालागोन ॥ पवित्र देखोनि पळती ते ॥२१॥

पिंगळे थोर किलबिलती ॥ भालवा दिवाभीतें बोभाती ॥ चक्रवाकांचे शब्द उमटती ॥ टिटवे बोलती ते वनीं ॥२२॥

कुमुदीं मिलिंद मिळती सवेग ॥ मस्तकमणी निघती उरग ॥ निधानें प्रकटली सांग ॥ येऊं म्हणती सभाग्या ॥२३॥

असो ऐसी निशा दाटली थोर ॥ तों पातले दोघे असुर ॥ दुर्गावरी गर्जती वानर ॥ मार्ग अणुमात्र दिसेना ॥२४॥

असुरकरीं तीक्ष्ण शूळ ॥ फोडू पाहती दुर्ग सबळ ॥ तों शूळ मोडले तत्काळ ॥ कोट अचळ वज्राहूनी ॥२५॥

मग ते ऊर्ध्वपंथे उडोनी ॥ दुर्गमर्यादा ओलांडूनी ॥ जेथें निजले लक्ष्मण कोदंडपाणी ॥ उतरले तेथें अकस्मात ॥२६॥

तों कनकहरिणचर्मावरी ॥ निद्रिस्थ दोघे लीलावतारी ॥ कीं शिव आणि विष्णु शेजारीं ॥ अवनीवरी निजेले ॥२७॥

आधींच निद्रासुख घन ॥ वरी राक्षसें घातलें मौन ॥ शय्येसहित उचलोन ॥ मस्तकीं घेऊन चालिले ॥२८॥

तेथेंच कोरिलें विवर ॥ लांब योजनें सप्त सहस्र ॥ सप्त घटिकेत यामिनीचर ॥ घेऊन गेले दोघांसी ॥२९॥

पुढें तेरा सहस्र योजन ॥ दधिसमुद्र ओलांडून ॥ तेथें महिकावती नगर पूर्ण ॥ लंकेहूनि विशेष ॥३०॥

काम क्रोध दोघेजण ॥ आत्मयासी घालिती आवरण ॥ तैसे निशाचरीं रामलक्ष्मण ॥ सदनीं दृढ रक्षिले ॥३१॥

नगरमध्यभागीं देऊळ ॥ एकवीस योजनें उंच सबळ ॥ तें भद्रकालीचें मुख्य स्थळ ॥ महाविशाळ भयानक ॥३२॥

असो दधिसमुद्रतीरीं जाण ॥ वीस कोटि पिशिताशन ॥ मकरध्वज बलाढ्य पूर्ण ॥ दृढ रक्षणा ठेविला ॥३३॥

महिकावतींत रामलक्ष्मण ॥ निद्रिस्थ आणि वरी मोहन ॥ त्यावरी नागपाशीं बांधोन ॥ बैसती रक्षण अहिमही ॥३४॥

असो हकडे सुवेळेसी जाण ॥ काय जाहलें वर्तमान ॥ निशी संपतां चंडकिरण ॥ उदयाचळा पातला ॥३५॥

घ्यावया रघुनाथदर्शन ॥ समस्त पावले वानरगण ॥ तों शय्येसहित पूर्ण ॥ दोन्ही निधानें न दिसती ॥३६॥

तंव देखिलें भयानक विवर ॥ घाबरे पाहती वानर ॥ सुग्रीवादिक कपी समग्र ॥ गजबजिले देखोनियां ॥३७॥

मग पाहती वानर ॥ तों द्वादश गांवें पाय थोर ॥ असुरांचे उमटले भयंकर ॥ रघुवीर भक्त पाहती ॥३८॥

या चराचराचें जीवन ॥ जें कमलोद्भवाचें देवतार्चन ॥चोरीं चोरिलें म्हणोन ॥ हृदय पिटी सुग्रीव ॥३९॥

सकळ वानर तैं आक्रंदती ॥ धरणीवरी अंगें घालिती ॥ एक नाम घेऊनि हाका फोडिती ॥ धांव रघुपते म्हणोनियां ॥४०॥

जगद्वंद्या राजीवनेत्रा ॥ कां उबगलासी आम्हां वानरां ॥ तूं परात्पर आदिसोयरा ॥ कोठें गेलासी उपेक्षोनि ॥४१॥

तों बिभीषण आला धांवोन ॥ म्हणे स्थिर असा अवघे जण ॥ ही गोष्ट जातां बाहेर पूर्ण ॥ येईल रावण युद्धासी ॥४२॥

रामाविण सेना समग्र ॥ जैसें प्राणाविण शरीर ॥ तरी फुटों न द्यावा समाचार पुढें विचार करा आतां ॥४३॥

पिंडब्रह्मांड तत्त्वांसहित ॥ शोधी जैसा सद्रुरुनाथ ॥ मग वस्तु निवडी शाश्वत ॥ सीताकांत शोधा तैसा ॥४४॥

कीं धुळींत हारपलें मुक्त ॥ झारी निवडी सावचित्त ॥ कीं वेदांतींचा अर्थ पंडित ॥ उकलोनियां काढी जेवीं ॥४५॥

कीं समुद्रीं पडले वेद ॥ ते मत्स्यरूपें शोधी मुकुंद ॥ तैसा सीताहृदयाब्जमिलिंद ॥ शोधोनियां काढावा ॥४६॥

तुम्हीं रघुपतीचे प्राणमित्र ॥ भगीरथप्रयत्न करूनि थोर ॥ तुमचा प्रतापरोहिणीवर ॥ निष्कलंक उदय पावूं द्या ॥४७॥

तुमचे भाग्यासी नाहीं पार ॥ सुखरूप आहे वायुकुमर ॥ तो क्षणमात्रें रघुवीर ॥ काढील आतां शोधूनियां ॥४८॥

मग मारुतीपुढें वानर ॥ घालिती कित्येक नमस्कार ॥ म्हणती तुजविण रघुवीर ॥ ठायीं न पडे सर्वथा ॥४९॥

रामप्राप्तीसी कारण ॥ तूं सद्रुरु आम्हांसी पूर्ण ॥ कामक्रोध अहिमही निवटून ॥ आत्माराम दाखवीं ॥५०॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2010-06-03T21:34:57.5670000

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द्रुपद

  • n. (सो. अज.) पांचाल देश का सुविख्यात राजा एवं द्रौपदी का पिता । उत्तर पांचाल देश के सोमक राजवंश के पृषत् राजा का यह पुत्र था । इस लिये, इसे ‘सौमकि’ नामांतर भी प्राप्त था [म.आ.परि.१.७५.२७] । पांचालाधिपति पृषत् राजा को काफी वर्षो तक पुत्र नहीं हुआ, पुत्रप्राप्ति के लिये उसने तपस्या की । तप करते समय, एक बार मेनका नामक अप्सरा वहॉं आयी । उसका लावण्य देख कर पृषत् मोहित हो गया, एवं उसका वीर्य स्खलित हो गया । उस वीर्य से एक बालक का जन्म हुआ । वही द्रुपद है [म.आ.परि.१ क्र. ७९, पंक्ति १५२-१७५] । यह मरुद्‌गणों के अंश से हुआ [म.आ.६१.७४] । द्रुपद को यज्ञसेन [म.आ.१२२.२६], पांचाल, तथा पार्षत नामांतर भी प्राप्त थे । 
  • द्रोणविरोध n. द्रुपद ने अस्त्रशिक्षा तथा धनुर्विद्याशिक्षा, द्रोणाचार्य के पिता भरद्वाज के निरीक्षण में प्राप्त की थी । इसलिये द्रोण द्रुपद का गुरुबंधु था । धनुर्विद्या पूर्ण होने पर द्रुपद ने भरद्वाज को गुरु दक्षिणा दी, एवं वचन दिया, ‘मेरे राज्यारुढ होने पर यदि तुम या तुम्हारा पुत्र द्रोण मेरे पास सहायता मॉंगने आओगे, तो मैं तुम्हें अवश्य सहायता करुँगा’। बाद में द्रुपद अपने राज्य में चला गया । द्रुपद को राज्याधिकार प्राप्त होने के बाद, पूर्ववचना नुसार इसकी सहायता मॉंगने के लिये, द्रोण इसके पास आया । परन्तु मदांध हो कर, द्रुपद ने सहायता की जगह द्रोण का अत्यंत उपहास किया । इस अपमान का बदला लेने के लिये, द्रोन ने पांडवों का आचार्यत्व मान्य किया, एवं उनके द्वारा द्रुपद से प्रतिशोध लिया (द्रोण देखिये) । बाद में द्रोण ने इसका आधा (उत्तर पांचाल) राज्य स्वयं ले कर, दूसरा आधा (दक्षिण पांचाल) राज्य वापस दे दिया । द्रुपद गंगातट पर दक्षिण पांचाल में माकंदी में राज्य करने लगा [म.आ.१२८.१५] । प्राचीन पांचाल ही आधुनिक रोहिलखंड है । सोमक एवं सृंजय राजवंश के लोग भी इसके साथ दक्षिण पांचाल पधारे । ये सारे लोग भारतीय युद्ध में द्रुपद के साथ पांडवों के पक्ष में शामिल थे । 
  • धृष्टद्युम्नजन्म n. द्रोण ने अपने शिष्यों के द्वारा इसकी दुर्दशा करने के कारण, द्रुपद द्रोण पर अत्यंत क्रोधित हुआ, तथा उसके नाश के लिये उपाय ढूँढने लगा । द्रोणविनाशक पुत्र की प्राप्त के लिये यह ऋषियों के एवं ब्राह्मणों के आश्रम में घूमने लगा । एक बार उपयाज ऋषि के कहने पर, याज नामक काश्यपगोत्रीय ब्राह्मण के आश्रम में यह गया । वह ब्राह्मण अत्यंत लोभी होने के कारण, कौनसा भी असूक्त कर्म करने के लिये सदा तैयार रहता था । द्रुपद ने उसे पुत्रप्राप्ति का उपाय पूछा, एवं पुत्र होने पर एक अर्बुद धेनु दान देने का प्रलोभन उसे दिखाया [म.आ.१६.२१] । उसपर पुत्रप्राप्ति के लिये, यज्ञ करने की सलाह याज ने इसे दी । उपयाज के उस सलाह के अनुसार, उपयाज तथा उसका भाई याज दोनों को अपने साथ नगर में ला कर, इसने यज्ञ किया । यज्ञसमाप्ति पर सिद्ध किया गया चरु खाने के लिये, याज ने द्रुपद की पत्नी सौत्रामणि को बुलाया । परन्तु उसके आने में विलंब होने पर, याज ने वह चरु अग्नि में झोंक दिया । तत्काल अग्नि में से एक कवचकुंडलधारी दिव्य पुरुष, तथा एक श्यामवर्णा स्त्री प्रकट हुई । उन्हें अपने पुत्र एवं पुत्री मान मान कर, इसने उनके नाम धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी रख दिये [म.आ.१५५] 
  • द्रौपदीस्वयंवर n. द्रौपदी उपवर होते ही द्रुपद ने उसके स्वयंवर की तैयारी की । मत्स्ययंत्र का, धनुष्य द्वारा वेध करने वाले को ही द्रौपदी दी जायेगी, ऐसी शर्त इसने रखी थी । ब्राह्मण भेष में पांडव इस स्वयंवर में आये थे । अर्जुन ने शर्त पूरी की । इसे द्रुपद ने द्रौपदी दी । ‘क्षत्रियों को छोड कर द्रुपद ने एक ब्राह्मण को अपनी कन्या दी, एवं हमारा अपमान किया,’ ऐसी सारे क्षत्रिय राजाओं की कल्पना हुई । उस कारण वें द्रुपद से लडने के लिये प्रवृत्त हो गये । किंतु पांडवों ने उन सब का पराजय किया । बाद में द्रुपद ने अपना पुरोहित पांडवों के निवासस्थान पर भेजा । द्रौपदीस्वयंवर का प्रण जीतने वाले पांडव ही हैं, यह जान कर इसे अत्यंत आनंद हुआ । बाद में बडे ही समारोह के साथ, इसने पॉंच पांडवों के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया [म.आ.१९०] । भारतीय युद्ध में द्रुपद, पांडवों के पक्ष में प्रमुख था । इसने पांडवों की ओर से मध्यस्थता करने के लिये, अपने पुरोहित को धृतराष्ट्र के पास भेजा था । परंतु समझौते के सारे प्रयत्न निष्फल हो कर युद्ध प्रारंभ हुआ । तब अपने पुत्र, बांधव तथा सेना के सहित द्रुपद, पांडवो की सहायता के लिये, युद्ध में शामिल हुआ । भारतीय युद्ध में इसने काफी पराक्रम दर्शाया । भारतीय युद्ध के पंद्रहवे दिन हुए, रात्रियुद्ध में, मार्गशीर्ष वद्य एकादशी के दिन प्रभात समय में, द्रोण के हाथों इसकी मृत्यु हुई [म.द्रो.१६१.३४]; भारत-सावित्री । द्रौपदी तथा धृष्टद्युम्न के सिवा, द्रुपद को शिखंडी, सुमित्र, प्रियदर्शन, चित्रकेतु, सुकेतु, ध्वजकेतु [म.आ.परि.१.क्र.१०३. पंक्ति.१०८-११०], वीरकेतु [म.द्रो.९८.३३], सुरथ एवं शत्रुंजय [म.द्रो.१३१. १२६], नामक अन्य पुत्र थे । धृष्टकेतु नामक पौत्र भी इसे था । इसके पुत्रों में से शिखंडी जन्म के समय स्त्री था । बाद में एक यक्ष के प्रसाद से उसे पुरुषत्व प्राप्त हुआ । द्रुपद ने उसे शंकर से भीष्म के वध के लिये मॉंग लिया था (सौत्रामणि देखिये) । 
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श्रीयंत्र स्थापना व मुहूर्त याबद्दल माहिती द्यावी.
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