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अध्याय १३

बृहत्संहिताः - अध्याय १३

’बृहत्संहिता’ ग्रंथात वास्तुविद्या, भवन निर्माण कला, वायुमंडळाची रचना, वृक्ष आयुर्वेद इ. विषय अंतर्भूत आहेत.


सप्तर्षिचाराध्यायः

सैकावलीव राजति ससितोत्पलमालिनी सहासेव ॥ नाथवतीव च दिग् यैः कौवेरी सप्तभिः मुनिभिः ॥१॥

ध्रुवनायकोपदेशान् नरिनर्ती ( नर्त्ती) वोत्तरा भ्रमद्भिश्च ॥ यैश्चारमहं तेषां कथयिष्ये वृद्धगर्गमतात् ॥२॥

आसन् मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ ॥ षड्द्विकपंचद्वियुतः शककालः तस्य राज्ञश्च ॥३॥

एकैकस्मिन्न् ऋक्षे शतं शतं ते चरन्ति वर्षाणाम् ॥ प्रागुदयतोऽपि अविवराद् र्जून् नयति तत्र संयुक्ताः ( प्रागुत्तरतश्च एते सदा उदयन्ते ससाध्वीकाः) ॥४॥

पूर्वे भागे भगवान् मरीचिः अपरे स्थितो वसिष्ठोऽस्मात् ॥ तस्यांगिराः ततोऽत्रिः तस्यासन्नः पुलस्त्यश्च ॥५॥

पुलहः क्रतुः इति भगान् आसन्ना अनुक्रमेण पूर्वाद्यात् ( पूर्वाद्याः) ॥ तत्र वसिष्ठं मुनिवरमुपाश्रितारुन्धती साध्वी ॥६॥

उल्काशनिधूमाद्यैः हता विवर्णा विरश्मयो ह्रस्वाः ॥ हन्युः स्वं स्वं वर्गं विपुलाः स्निग्धाश्च तद्वृद्ध्यै ॥७॥

गन्धर्वदेवदानवमन्त्रौषधिसिद्धयक्षनागानाम् ॥ पीडाकारो मरीचिः ज्ञेयो विद्याधराणां च ॥८॥

शकयवनदरदपारतकांबोजां तापसान् वनोपेतान् ॥॥ हन्ति वसिष्ठोऽभिहतो विवृद्धिदो रश्मिसंपन्नः ॥९॥

अंगिरसो ज्ञानयुता धीमन्तो ब्राह्मणाश्च निर्दिष्टाः अत्रेः ॥ कान्तारभवा जलजानि अंभोनिधिः सरितः ॥१०॥

रक्षःपिशाचदानवदैत्यभुजंगाः स्मृताः पुलस्त्यस्य ॥ पुलहस्य तु मूलफलं क्रतोः तु यज्ञाः सयज्ञभृतः ॥११॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2012-01-16T20:51:02.9370000

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अजामिल

  • n. कान्यकुब्ज देश का एक ब्राह्मण । यह प्रथम सदाचारी था । परन्तु बाद में किसी वेश्या के मोह में फँसकर, इसने वृद्ध मातापिता तथा विवाहिता पत्नी का भी त्याग कर दिया । राहगीरों को लूटना, द्यूत खेलना, धोखा देना तथा चोरी करना इ.साधनों से यह चरितार्थ चलाता था । इस प्रकार इसने अठठयासी वर्ष बिताये । इस वेश्या से इसे दस पुत्र हुए । उनमें से सबसे छोटे नारायण पर इसकी अधिक प्रीति थी । मरणसमय आने पर यह उसी को पुकारता रहा । केवल नामस्मरण के माहात्म्य से यमदूतो के हाथों से विष्णुदूतों ने इसे मुक्त किया । तब विष्णुदूत तथा यमदूतों का वार्तालाप इसने सुना । यमदूतों द्वारा कथित, वेदप्रतिपादित गुणाश्रित धर्म तथा विष्णुदूतो दारा प्रतिपादित शुद्ध भागवतधर्म सुन कर इसे कृतकर्म का पश्चात्ताप हुआ तथा हरि के प्रति भक्ति इसके मन में उत्पन्न हुई । अन्त में विरक्त हो कर, यह हरिद्वार को गया तथा गंगा में देहत्याग कर के मुक्त हो गया [भा.६.१-२] 
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