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श्रीज्ञानदेवतेहत्तिशी - अभंग १४

"श्रीज्ञानदेवतेहत्तिशी" या पुस्तकात श्रीज्ञानेश्वरांनी तेहतीस अभंगांतून जगाला अध्यात्मज्ञान दिले.


अभंग १४

खेचरीचेनि लागवेगीं । उल्लंघोनि पश्चिममार्गे ।

घेतला चिन्मयाचा दुर्ग । परहोनि परता जो ॥१४॥

टीकाः

खेचरी राहिली लागोन । उर्ध्व चालिलें जीवन । उलट पश्चिममार्ग गहन । ओलांडिला ॥१॥

पहातां हा सुक्ष्म मार्ग । ऐल केले एकवीस स्वर्ग । स्वरोतोनि गमन सांग । होवोनि ठेले ॥२॥

मग चिन्मय दुर्ग अलक्ष । घेतला ज्ञानराजें प्रत्यक्ष । होवोनियां अतिदक्ष । एकसरा ॥३॥

हे तो दुर्ग अति सान पहातां दिसे अणुप्रमाण । सत्पसिंधुचें आवरण । जयावरी ॥४॥

वीर समुद्र पहातां नेत्र । सत्रावी ते क्षीरसमुद्र । नाकीं दथि खारा शरीर । रत्‍नाकार नाभिय ॥५॥

माथ सिंधु तो मदन । हृदयीं पहातां विस्तीर्ण मन । ऐसे दुर्ग अति कठिण । योगिया गवसे ॥६॥

दुर्ग अलक्ष परेपर । खेचरी जरी कां तत्पर । लक्ष्या लक्ष मिळतां सत्वर । प्रत्यय गोठी ॥७॥

जया गुरुकृपें ज्ञान । ऐसा योगिराज आपण । घेई दुर्ग ते कठिण । सत्य सत्य ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2010-10-15T15:02:44.7370000

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शल

  • n. (सू. इ.) अयोध्या का एक राजा, जो परिक्षित् एवं सुशोभना के तीन पुत्रों में से एक था । इसके अन्य दो भाइयों के नाम दल एवं बल थे । 
  • वामदेव का शाप n. एक बार यह शिकार करने वन में गया । वहाँ इसके रथ के अश्व थक गये, जिस कारण वहाँ समीप ही स्थित वामदेव ऋषि के आश्रम में यह गया, एवं उसके अश्व इसने थोडे समय के लिए माँग लिये। वामदेव ने इसे यह शर्त बतायी थी कि, अश्वों का काम होते ही वे उसे वापस मिलने चाहिये। आगे चल कर वचनभंग कर, इसने वामदेव के अश्व वापस करने से इन्कार किया । इतना ही नहीं, वे अश्व वामदेव के न हो कर, स्वयं के है, ऐसा मिथ्या वचन यह कहने लगा। इस कारण क्रुद्ध हो कर वामदेव ने चार राक्षस निर्माण किये, एवं उन्हींके द्वारा इसका वध करवाया । इसके वध के पश्चात् इसका भाई दल अयोध्या का राजा बन गया [म. व. १९०.६-९] 
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