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अध्याय ८७

श्रीवामनपुराण - अध्याय ८७

श्रीवामनपुराणकी कथायें नारदजीने व्यासको, व्यासने अपने शिष्य लोमहर्षण सूतको और सूतजीने नैमिषारण्यमें शौनक आदि मुनियोंको सुनायी थी ।


पुलस्त्यजी बोले - मुने ! अब मैं आपसे पापोंका निवारण करनेवाला दूसरा स्तोत्र कहूँगा; जिसका भलीभाँति अध्ययन ( पाठ ) करनेसे पाप विनष्ट हो जाता है । मैं मत्स्य एवं कच्छपका रुप धारण करनेवाले देवेश गोविन्दभगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं हयशीर्ष, भव और त्रिविक्रम विष्णुभगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं माधव, ईशान, हषीकेश और कुमारको नमस्कार करता हूँ । मैं नारायणको नमस्कार करता हूँ । मैम गरुडासन भगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं ऊर्ध्वकेश तथा नरसिंहका रुप धारण करनेवाले एवं कुरुध्वज, कामपाल, अखण्ड और ब्राह्मणप्रिय देवको नमस्कार करता हूँ । मैं अजित, विश्वकर्मा, पुण्डरीक, द्विजप्रिय, हंस, शम्भु तथा प्रजापतिके सहित ब्रह्माको नमस्कार करता हूँ । मैं शूलबाहु, चक्रधरदेव, शिव, विष्णु, सुवर्णाक्ष और गोपति तथा पीतवासाको प्रणाम करता हूँ । मैं गदा धारण करनेवाले गदाधर भगवानको नमस्कार करता हूँ और कुशेशयको नमस्कार करता हूँ । मैं पापका नाश करनेवाले अर्धनारीश्वर देवको नमस्कार करता हूँ । मैं वैकुण्ठसहित गोपाल तथा अपराजितको नमस्कार करता हूँ । मैं विश्वरुप, सौगन्धि और सदाशिवको प्रणाम करता हूँ ॥१ - ८॥

मैं पाञ्चालिक, हयग्रीव, स्वयम्भुव, अमरेश्वर, पुष्कराक्ष, पयोगन्धि और केशवको नमस्कार करता हूँ । मैं अविमुक्त, लोल, ज्येष्ठेश, मध्यम, उपशान्त तथा जम्बुकसहित मार्कण्डेयको नमस्कार करता हूँ । मैं पद्मकिरणको नमस्कार करता हूँ । मैं वडवामुखको नमस्कार करता हूँ । मैं कार्तिकेय, बाह्लीक तथा शिखीको प्रणाम करता हूँ । मैं स्थाणु एवं अनघको नमस्कार करता हूँ तथा वनमालीको नमस्कार करता हूँ । मैं लाङ्गलीश तथा लक्ष्मीपतिको नमस्कार करता हूँ । मैं त्रिनेत्रको प्रणाम करता हूँ तथा हव्यवाहनको नमस्कार करता हूँ । मैं त्रिसौवर्णको नमस्कार करता हूँ तथा धरणीधरको नमस्कार करता हूँ । मैं त्रिणाचिकेत, ब्रह्मेश तथा शशिभूषणको प्रणाम करता हूँ । मैं सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करनेवाले कपर्दीभगवानको प्रणाम करता हूँ । मैं चन्द्र, सूर्य, ध्रुव तथा महान् ओजस्वी रुद्रभगवानको प्रणाम करता हूँ । मैं पद्मनाभ, हिरण्याक्ष तथा अव्यय स्कन्दको प्रणाम करता हूँ । मैं भीम और हंसको प्रणाम करता हूँ । मैं हाटकेश्वरको प्रणाम करता हूँ । मैं सदाहंसको प्रणाम करता हूँ और प्राणोंको तृप्त करनेवालेको प्रणाम करता हूँ ॥९ - १६॥

मैं रुक्म - कवच धारण करनेवाले महायोगी ईश्वरको नमस्कार करता हूँ और पुरुषोत्तम श्रीनिवासभगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं चार भुजा धारण करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ । मैं पृथ्वीके अधिपतिको प्रणाम करता हूँ । मैं वनस्पति, पशुपति और अव्यय प्रभुको प्रणाम करता हूँ । मैं श्रीकण्ठ वासुदेव, दण्डसहित नीलकण्ठ, सर्व, अनघ, गौरीश तथा नकुलीश्वरभगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं मनको हरण करनेवाले कृष्णकेश चक्रपाणि भगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं भूधर, छादितगद, सुनेत्र, शूलशड्खी, भद्राक्ष, वीरभद्र तथा शड्कुकर्णिकको नमस्कार करता हूँ । मै वृषध्वज, महेश, विश्वामित्र, शशिप्रभ, उपेन्द्र, गोविन्द तथा पड्कजप्रियको नमस्कार करता हूँ । मैं सहस्त्रशीर्षा तथा कुन्दमाली देवको नमस्कार करता हूँ । मैं कालाग्नि, रुद्रदेवेश तथा कृत्तिवासाको प्रणाम करता हूँ मैं छागलेशको नमस्कार करता हूँ तथा पड्कजासनको नमस्कार करता हूँ । मैं सहस्त्राक्ष, कोकनद तथा हरिशंकरको नमस्कार करता हूँ ॥१७ - २४॥

मैं अगस्त्य, गरुड़, विष्णु, कपिल, ब्रह्मवाड्मय, सनातन, ब्रह्मा तथा ब्रह्मतत्प्रको नमस्कार करता हूँ । मैं अनुमानसे परे, चार भुजाधारी, सहस्त्रांशु, तपोमूर्ति, धर्मराज गरुड़वाहन देवको नमस्कार करता हूँ । मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त, शान्तस्वरुप, निर्मल, समस्त लक्षणोंसे युक्त, महान् योगी, अव्यक्तस्वरुप एवं पाप नाश करनेवाले भगवानको नमस्कार करता हूँ । मैं निरञ्जन, निराकार, गुणोंसे रहित, निर्मलपदस्वरुप, पाप हरण करनेवालेको नमस्कार करता हूँ तथा शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें जाता हूँ ।

महर्षि अगस्त्यने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्रको कहा था । इसके कथन, स्मरण तथा श्रवण करनेसे अनेक पापोंका विनाश हो जाता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी हो जाता है ॥२५ - २९॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सतासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥८७॥

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Last Updated : January 24, 2012

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