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  • गुरुसंस्था व परंपरा
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    मंत्रशास्त्राकार जगन्नाथपुरीचे ब्रह्मीभूत पूज्य श्रीशंकराचार्य योगेश्वरानंदतीर्थ ह्यांचा हा मंत्रसाठा सिद्ध आहे ,
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शुक VIII.

  • n. एक ऋषि, जो दक्षिण पांचाल के अणुह एवं ब्रह्मदत्त राजा का समकालीन था । यह व्यास पाराशर्य ऋषि के पुत्र शुक वैयासकि से काफ़ी पूर्वकालीन था । पौराणिक साहित्य में शुक ऋषि की अनेकानेक पत्‍नीयाँ एवं विस्तृत वंशक्रम प्राप्त है । पार्गिटर के अनुसार, यह सारा परिवार व्यास ऋषि के पुत्र वैयासकि का न हो कर अणुह एवं ब्रह्मदत्त राजा के समकालीन शुक ऋषि का था । शुक वैयासकि जन्म से ही अत्यंत विरागी एवं ब्रह्मचारी था । 
  • परिवार n. इसकी निम्नलिखित दो पत्‍नीयाँ थीः---१. पीवरी, जो विभ्राज अथवा बर्हिषद पितरों की मानसकन्या थी । हरिवंश में इसे सुकाल पितरों की कन्या कहा गया है [ह. वं. १.१८.५८], २. गो (एकशृंगा) । हरिवंश में एकशृंगा गो की नहीं, बल्कि पीवरी का नामांतर बताया गया है । इसके निम्नलिखित पुत्र थेः-- १. भूरिश्रवस् (भूरिश्रुत, भूरि); २. शंभु; ३. प्रभु; ४. कृष्ण; ५. गौर (गौरप्रभ); ६. देवश्रुत [ब्रह्मांड. ३.८.९३];[ वायु. ७०.८४- दे. भा. १.१४];[ नारद. १.५८] । इसकी कन्या का नाम कृत्वी (कीर्तिमती, योगमाता, योगिनी) था, जो अणुह राजा की पत्‍नी थी [ह. वं. १.२३.६];[ वायु. ७३.२८-३०] । अणुह राजा से उसे ब्रह्मदत्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था [मत्स्य. १५] 
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