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s shaikh mahammad

  • शेख महंमद
    शेख महंमदाना महाराष्ट्रात कबीराचा अवतार म्हणून ओळखले जाते.
  • शेख महंमद - परिचय
    शेख महंमदाना महाराष्ट्रात कबीराचा अवतार म्हणून ओळखले जाते.
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नारद II.

  • n. एक देवर्षि एवं ब्रह्माजी का मानसपुत्र । एक धर्मज्ञ तत्त्वज्ञ, वेदांतज्ञ, राजनीतिज्ञ एवं संगीतज्ञ के नाते, नारद का चरित्रचित्रण महाभारत में किया गया है [म.आ.परि.१.१११] । जी चाहे वहॉं भ्रमण करनेवाले से प्रवास करता था, एवं इसका संचार तीनोम लोकों में रहता था । यह वेद एवं वेदांत में पारंगत, ब्रह्मज्ञानयुक्त, एवं नयनीतिज्ञ था । राजाओं के घर में इसे बृहस्पति जैसा मान था । यह ‘नानार्थकुशल’, एवं लोगों के धर्म, राजनीति एवं नित्यव्यवहार आदि विषयों के संशय दूर करने में प्रवीण था । स्वभाव से यह पुण्यशील सीदासादा एवं मृदुभाषणे था । यह उत्कृष्ट प्रवचनकार एवं संगीतकार था । 
  • स्वरुपवर्णन n. नारद की शरीरकांति श्वेत एवं तेजस्वी थी । इंद्र ने प्रदान किये सफेद, मृदु एवं धूत वस्त्र यह परिधान करता था । कानों में सुवर्णकुंडले, कंधों पर वीणा, एं सिर पर, ‘श्लक्ष्ण शिखा’(मृदु चोटी)से, यह अलंकृत रहता था । 
  • जन्म n. नारद ब्रह्माजी का मानसपुत्र एवं विष्णु का तीसरा अवतार था [भा१.३.८];[ मत्स्य.३.६-८] । यह ब्रह्माजी की जंघा से उत्पन्न हुआ थ [भा.३.१२.२८] । यह नरनारायणों का उपासक था [भा.१.३], एवं दर्शन तथा जिज्ञासपूर्ति के हेतु, यह उनके पास हमेशा जाता था [म.शां.३२१.१३-१४०]। यह चाक्षुष मन्वन्तर के सप्तर्षिओं में से एक था । 
  • पुनर्जन्म n. नारद ने दक्ष के ‘हर्यश्व’ नामक दस हजार पुत्रों को सांख्यज्ञान का उपदेश दिया, जिस कारण वे सारे विरक्त हो कर घर से निकल गये [म.आ.७०.५-६] । अपने पुत्रों को प्रजोत्पादन से परावृत्त करने के कारण, दक्ष नारद पर अत्यंत क्रुद्ध हुआ, एवं उसने इसे शाप दिया [विष्णु.१.१५] । इस शाप के कारण, नारद ब्रह्मचारी रह क्रर हमेशा भटकता रहा, एवं सारी दुनिया मे झगडे लगाता रहा [भा.६.५.३७-३९] । दक्ष का शाप इसे जन्मजन्मांतर के लिये मिला था । इस कारण कश्यप प्रजापति के घर लिये अपने अगले जन्म में भी, दस के शाप की पीडा इसे पूर्ववत ही भुगतनी पडी । दक्ष के शाप की यही कहानी, अन्य पुराणों में कुछ अलग ढंग से दी गयी है । हरिवंश के मत में, दक्ष ने नारद को शाप दिया, ‘तुम नष्ट हो कर, पुनः गर्भवास का दुख सहन करोगे’ [ह.वं.१.१५] । परमेष्ठी ने अन्य ब्रह्मर्षियों को आगे कर, नारद को उःशाप देने की प्रार्थना दक्ष से की । फिर दक्ष ने परमेष्ठी से कहा, ‘मैं अपनी कन्या तुम्हें विवाह में दे दूँगा, एवं उस कन्या के गर्भ से नारद का पुनर्जन्म हो जायेगा [वायु.६६.१३५-१५०];[ब्रह्मांड.३.२.१८] । इस उःशाप के अनुसार, परमेष्ठी का विवाह दक्षकन्यों से होने के पश्चात् उन्हे नारद पुत्ररुप में प्राप्त हो गया [ब्रह्म.१२.१२-१५] । देवी भागवत के मत में, दक्ष ने नारद को शाप दिया, ‘तुम्हारा नाश हो कर, अगला जन्म तुम्हें मेरे ही पुत्र के नाते लेना पडेगा’ । इस शाप के अनुसार, नारद मृत हो गया एवं ‘दक्ष’ एवं वीरिणी के पुत्र के नाते, नया जन्म लेने पर विवश हो गया [दे.भा.७.१] । वायुपुराण के मत में, शिवजी के शाप के कारण जिन प्रजापतियों की मृत्यु हो गयी, उनमें नारद भी एक था [वायु.६६.९] । अपने अगले जन्म में, यह कश्यप प्रजापति का पुत्र एवं अरुंधती तथा पर्वत इन कश्यप संतति का भाई बन गया [वायु.७१.७८.८०] । महाभारत के मत में, पर्वत नारद का भाई न होइ कर, भतीजा था [म.शां.३०.५];[ दे. भा.६.२७] । ब्रह्मवैवर्तपुराण में, नारद के पुनर्जन्म की कहानी कुछ अलग ढंग से दी गयी है । दक्ष के शाप के कारण, एक शूद्रस्त्रीगर्भ से यह पुनः उत्पन्न हुआ । इस नये जन्म में, इसकी माता कलावती नामक शूद्र स्त्री थी । द्रमिल नामक शूद्र की वह पत्नी थी ।अपने पति की अनुमति से, कलावती ने पुत्रप्राप्ति के हेतु, कश्यप प्रजाप्ति का वीर्य प्राशन किया । बाद में द्रमिल ने देहत्याग किया, एवं कलावती एक ब्राह्मण के घर प्रसूत हो कर, उसे एक पुत्र हुआ । वही नारद है । बाद में इसे कश्यप ऋषि को अर्पन किया गया । कृष्णस्तव के कारण, यह शापमुक्त हुआ, एवं ब्रह्मदेव ने इसे सृष्टि उत्पन्न करने की अनुज्ञा भी दी । किंतु यह आजन्म ब्रह्मचारी ही रहा । महाभारत में, कश्यप एवं मुनि के पुत्र के रुप में, नारद ने पुनः जन्म लिया, ऐसा निर्देश प्राप्त है [म.आ.५९.४३] 
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