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दिव्यादेवी

  • n. प्लक्षद्वीप के दिवोवास राजा की कन्या । दिवोदास ने इसका विवाह रुपदेश का चित्रसेन राजा से निश्चित किया । विवाहविधि शुरु होते ही चित्रसेन मृत हो गया । तब विद्वान् ब्राह्मणों के कथनानुसार, इसने रुपसेन से विवाह किया । परंतु वह भी मृत हो गया । इस प्रकार इसके इक्कीस पति मृत हो गये । बाद में मंत्रियों की सलाह के अनुसार, इसका स्वयंवर रचा गया । किंतु स्वयंवर के लिये आये हुएँ सारे राजा, आपस में लड कर मर गये । इस अनर्थपरंपरा से इस को अत्यंत दुख हुआ, एवं यह अरण्य में चली गई [पद्म.भू.८५] । एक बार उज्वल नामक शुक, प्लक्षद्वीप में आया । शोकमग्न दिव्यादेवी को उसने ‘अशून्यशयन’ व्रत बताया । मनोभाव से यह व्रत चार वर्षो तक करने पर, विष्णु ने इसे दर्शन दिया, तथा वह इसे विष्णुलोक ले गया [पद्म.भू.८८] । पूर्वजन्म में यह चित्रा नामक वैश्य की स्त्री थी (चित्रा४. देखिये) । 
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कोणत्याही पूजेसाठी गणपती म्हणून चिकणी सुपारीला महत्व आहे, मग बाकीच्यांना कां नाही?
Category : Hindu - Puja Vidhi
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