TransLiteral Foundation
Don't follow traditions blindly or don't assume a superstition either.
Don't be intentionally ignorant. Ask us!! Make Informed Religious Decisions!!

संगीत सौभद्र

: Folder : Page : Word/Phrase : Person


Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.

पृथु (वैन्य)

  • n. पृथ्वी का पहला राजा एवं राजसंस्था का निर्माता [श.ब्रा.५.३.४];[ क.सं.३७.४];[ तै.ब्रा.२.७.५.१];[ पद्म. भू. २८.२१] । इसी कारण प्राचीन ग्रंथो में, ‘आदिराज’, ‘प्रथमनृप’, ‘राजेंद्र’, ‘राजराज’, ‘चक्रवर्ति’, ‘विधाता’, ‘इन्द्र’, ‘प्रजापति’ आदि उपाधियों से यह विभूषित किया गया है । महाभारत मे सोलह श्रेष्ठ राजाओं में इसका निर्देश किया गया है [म.द्रो.६९];[ म.शां.२९.१३२ परि.१];[ऋ.९] 
  • पृथ्वीदोहन अथवा समाजरचना n. इसने भूमि को अपनी कन्या मानकर उसका पोषण किया । इसी कारण ‘भू’ को ‘पृथुकन्या’ या पृथिवी’ कहते है [विष्णु.१.१३];[ मत्स्य.१०];[ पद्म. भू.२८];[ ब्रह्म.४];[ ब्रह्मांड.२.३७.];[ भा.४.१८];[ म.शां.२९.१३२] । पृथु के द्वारा पृथ्वी के दोहन की जाने की रुपात्मक कथा वैदिक वाङ्मय से लेकर पुराणो तक चली आ रही है। इस कथा की वास्तविकता यही है कि, इसने सही अर्थो में पृथ्वी का सृजन सिंचन कर, उसे धन-धान्य से पूरित किया । मानवीय संस्कृति के इतिहास में, कृषी एवं नागरी व्यवस्था का यह आदि जनक था । इसके पूर्व, लोग पशुपक्षियों के समान इधर उधर घूमतें रहते थे, प्राणियों को मार कर उनका मॉंस भक्षण करते थे । इस प्रकार पृथ्वी की प्राणि-सृष्टि का विनाश होता जा रहा था, एवं उनके हत्या का पाप लोगों पर लगे रहता था । इसे रोकने के लिए पृथु ने कृषि व्यवस्था को देकर लोगों को अपनी जीवकोपार्जन के लिए एक नए मार्ग का निर्देशन किया । यह पहला व्यक्ति था, जिसने भूमि को समतल रुप दिया, उसने अन्नादि उपजाने की कला से लोगों को परोचित कराया, एवं इस तरह एक नई संस्कृति एवं सभ्यता का निर्माण किया । कृषि-कला के साथ साथ पृथु ने लोगों को एक जगह बस कर रहना भी सिखाया । इस प्रकार, ग्राम, पुर, पत्तन, दुर्ग, घोष, व्रज, शिबिर, आक्र, खेट, खर्वट-आदी नए नए स्थानों का निर्माण होने लगा । इसके साथ ही साथ लोगों को पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुयी सकल औषधि, धान्य, रस, स्वर्णादि, धातृ, रत्नादि एवं दुग्ध आदि प्राप्त करने की कला से इसने बोध कराया [भा.४.१८] । इसने पृथ्वी के सारे मनुष्य एवं प्राणियों को हिंसक पशुओं, चोरों एवं दैहिक विपत्तियों से मुक्त कराया । अपनी शासन-व्यवस्था द्वारा यक्ष राक्षस, द्विपाद चतुष्पाद सारे प्रणियों, एवं धर्म अर्थादि सारे पुरुषार्थों के जीवन को सुखकर बनाया । इसने अपने राज्य में धर्म को प्रमुखता दी, एवं राज्यशासन के लिए दण्डनीति की व्यवस्था दी । प्रजा की रक्षा एवं पालन, करने के कारण इसे ‘क्षत्रिय’ तथा ‘प्रजारंजसम्राज्’ उपाधि से विभूषित किया गया [म.शां.५९.१०४-१४०] । पृथु के पृथ्वी पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यादि वर्गोकी प्रतिष्ठापना की, एवं हर एक व्यक्ति को अपनी वृत्ति के अनुसार उपजीविका का साधन उपलब्ध कराया । इसी कारण यह संसार में मान्य एवं पूज्य बना [ब्रह्मांड.२.३७.१-११] । महाभारत के अनुसार, कृतयुग में धर्म का राज्य था । अतएव दण्डनीति की आवश्यकता उस काल में प्रतीत न हुयी । कालान्तर में लोग मोहवश होकर राज्यव्यवस्था को क्षीण करने लगे । इसी कारण शासन के लिए राजनीति, शासनव्यवस्था एवं राजा की आवश्यकता पडी । पृथु ही पृथ्वी का प्रथम प्रशासक था । पृथु के ‘पृथ्वीदोह्न’ की कथा पद्मपुराण में इस प्रकार दी गयी है । प्रजा के जीवन-निर्वाह व्यवस्था के लिए यह धनुष-बाण लेकर पृथ्वी के पीछे दौडा । भयभीत होकर पृथ्वी ने गाय का रुप धारण किया । इससे विनती की, ‘तुम मूझे न मारकर, मेरा दोहन कर, सर्व प्रकार के वैभव प्राप्त कर सकते हो’। पृथ्वी की यह प्रार्थना पृथु ने मान ली एवं इसने पृथ्वी का दोहन किया [पद्म.सृ.८] 
  • दोहकगण n. पृथ्वी की नानविध वस्तुओं के दोहन करनेवाले देव, गंधर्व, मनुष्य, आदि की तालिका अथर्ववेद में एवं ब्रह्मादि पुराणों में दी गयी है । उनमें से अथर्ववेद में प्राप्त तालिका इस प्रकार है [अ.वे.८.२८]:---

    वर्ग - असुर
    दोहन करनेवाला - द्विमूर्धन्
    वत्स - विरोचन
    पात्र - लोह
    दूध - माया


    वर्ग - पितर
    दोहन करनेवाला - अंतक
    वत्स - यम
    पात्र - रौप्य
    दूध - स्वधा


    वर्ग - मनुष्य
    दोहन करनेवाला - पृथुवैन्य
    वत्स - वैवस्वतमनु
    पात्र - पृथ्वी
    दूध - कृषि एव सस्य


    वर्ग - ऋषि
    दोहन करनेवाला - बृहस्पति
    वत्स - सोम
    पात्र - छंदस्
    दूध - तप तथा वेद


    वर्ग - देव
    दोहन करनेवाला - रवि
    वत्स - इन्द्र
    पात्र - चमस्
    दूध - बल


    वर्ग - गंधर्व
    दोहन करनेवाला - वसुरुचि
    वत्स - चित्ररथ
    पात्र - कमल
    दूध - सुगंध


    वर्ग - यक्ष
    दोहन करनेवाला - रजतनाभि
    वत्स - कुबेर
    पात्र - मृण्मय
    दूध - अंतर्धान


    वर्ग - सर्प
    दोहन करनेवाला - धृतराष्ट्र
    वत्स - तक्षक
    पात्र - तूंबा
    दूध - विष


    वर्ग - राक्षस
    दोहन करनेवाला - जातुनाभ
    वत्स - सुमाली
    पात्र - परल
    दूध - रक्त

    १०
    वर्ग - वृक्ष
    दोहन करनेवाला - शाल ( जिसेस राल बनते हैं )
    वत्स - पिंपरी
    पात्र - पलस
    दूध - तोड जाने पर भी पुन निर्माण होना

    ११
    वर्ग - पर्वत
    दोहन करनेवाला - मेरु
    वत्स - हिमालय
    पात्र - पत्थर
    दूध - महौषधि तथा रत्न
    इस तालिका अनुसार, मानवों के जातियों में से असुर, पितर आदि ‘वर्गो’ ने पृथ्वी से माया,स्वधा आदि वस्तुओं का दोहन किया (प्राप्ति की), जिन पर उन विसिष्ट वर्गो का गुजारा होता है । इस तालिका में, मनुष्य जाति का प्रतिनिधि पृथु वैन्य को मानकर उसने पृथ्वी से ‘कृषि’ एवं ‘सत्य’ को प्राप्त किया ऐसा कहा गया है । पृथु वैन्य चाक्षुष मन्वन्तर में पैदा हुआ माना जाता है । ध्रुव उत्तानपाद राजा के पश्चात् एवं मरुतों के उत्पत्ति के अनंतर, पृथ वैन्य का युगारंभ होगा है । पृथ वैन्य के पश्चात् पृथ्वी वैवस्वत मनु एवं उसके वंश का राज्य शुरु होता है । एक उदारदाता, कृषि का आविष्कर्ता, एवं मनुष्य तथा पशुओं के आधिपति के रुप में वैदिक साहित्य में, इसका निर्देश प्राप्त है [ऋ.१०.९३.१४];[ वे.८.१०.२४];[ पं.ब्रा.१३.५.१९] । वेन का वंशज होने के कारण इसे ‘वैन्य’ उपाधि प्राप्त थी [ऋ. ८.९.१०] । शतपथ ब्राह्मण में इसका निर्देश ‘पृथु’ नाम से किया गया है, किन्तु सायणभाष्य में सर्वत्र इसे ‘पृथिन्’ कहा गया हैं । अथर्ववेद में भी ‘पृथिन्’ पाठ उपलब्ध है [अ.वे.८.२८.११]
     
  • राज्यभिषेक n. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, पृथ्वी में सर्वप्रथम पृथु का राज्याभिषेक हुआ । इसी कारण राज्याभिषेक का धार्मिक विधियों में किये जानेवाले ‘पूर्वात्तरांगभूत’ होम को ‘पार्थहोम’ कहते हैं । इस राज्याभिषेक के कारण ग्राम्य एवं आरण्यक व्यक्तियों एवं पशुओं का पृथु राजा हुआ [श.ब्रा.५.३.५.४] । इसने ‘पार्थ’ नामक साम कहकर समस्त पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त किया [पं.ब्रा.१३.५.२०] । एक ऋषि एवं तत्त्वज्ञानी के नाते भी इसका निर्देश प्राप्त है [जै.उ.ब्रा.१.१०.९];[ ऋ.१०.१४८.५] । इसका राज्यभिषेक महारण अथवा दंडकारण्य में संपन्न हुआ [म.शां.२९.१२९] । इसके राज्याभिषेक के समय, भिन्न भिन्न देवों ने इसे विभिन्न प्रकार के उपहार प्रदान किये । इन्द्र ने अक्षय्य धनुष्य एवं स्वर्ण मुकुट, कुबेर ने स्वर्णासन, यम ने दण्ड, बृहस्पति ने कवच, विष्णु सुदर्शन चक्र, रुद्र ने चन्द्रभिम्बांकित तलवार, त्त्वष्टु ने रथ एवं समुद्र ने शंख दिया । पुराणों में इसे वैन्य अथवा वेण्य कहा गया है । यह चक्षुर्मनु के वंश के वेन राजा का पुत्र था [पद्म. सृ.,२] । वेन राजा अत्यधिक दुष्ट था जिससे प्रजा बडी त्रस्त थी । उस समय के महर्षियो ने पूजा के साथ सद्‌व्यवहार करने के लिए बहु उपदेश दिया, पर उसका कोई प्रभाव न पडा । संतप्त होकर ऋषियों ने वेन को मार डाला । राजा के अभाव में अराजकता फैल गयी, जनता चोर, डाकुओं से पीडित हो उठी । पश्चात, सब ऋषियों ने मिलकर वेन की दाहिनी भुजा का, तथा विष्णु के अनुसार दाहिनी जंघा का मंथन किया । इस मंथन से सर्व प्रथम विन्घ्यनिवासी निषाद तथा धीवर उत्पन्न हुए । तत्पश्चात् वेन की दाहिनी भुजा से पृथु नामक पुत्र एवं अर्चि नामक कन्या उत्पन्न हुयी [भा.४.१५.१-२] । पृथु विष्णु का अंशावतार था एवं जन्म से ही धनुष एवं कवच धारण किये हुए उत्पन्न हुआ था । उसके अवतीर्ण होते ही महर्षि आदि प्रसन्न हुए तथा उन्होंने इसे सम्राट बनाया [पद्म. भू.२८] । राज्याभिषेक होने के उपरांत पृथु ने प्राचीन सरस्वती नदी के किनारे ब्रह्मावर्त में सौ अश्वमेध करने का संकल्प किया । निन्यायवे यज्ञ पूरे ही जाने के बाद इन्द्र को शंका हुई कि, कहीं यह मेरा इन्द्रासन न छील ले । अतएव उसने यज्ञ के अश्व को चुरा लिया । यही नहीं, कापालिक वेष धारण कर इन्द्र ने पृथु का यज्ञ न होने दिया । इस पर क्रोधित होकर पृथु इन्द्र का वध करने को उद्यत हुआ । दोनों में काफी संघर्ष न हो, इस भय से बृहस्पति तथा विष्णु ने मध्यस्थ होकर, दोनों में मैत्री की स्थापना कराई । भागवत के अनुसार अत्रि ऋषि की सहायता से पृथु-पुत्र विजिताश्व ने इन्द्र को पराजित किया [भा.४.१९] । इसने महर्षियों को आश्वासन दिया, ‘मैं धर्म के साथ राज्य करुँगा । आप मेरी सहायता कीजिये’। महर्षियो ने इस पर ‘तथास्तु’ कहा । तत्पश्चात् शुक्र इसका पुरोहित बना, एवं निम्नलिखित ऋषि इसके अष्टमंत्री बनेः--वालखिल्य-सारस्वत्य, गर्ग-सांवत्सर, अत्रि-वेदकारक, नारद-इतिहास, सूत,मागध,बंदि [म.शां.५९.११६ ११८, १३१] । पुरोहित, सारस्वत्य सांवत्सर, वेदकारक, इतिहास, और राजा ये छः नाम मिलते है । बाकी दो नाम का निर्देश नहीं है । सूत-मागध ये बंदिजन अलग है । सम्भव है मध्ययुगीन काल में, महाराष्ट्र के छत्रपति शिवाजी ने अष्टप्रधान की शासनव्यवस्था यही से अपनायी हो । 
More meanings
RANDOM WORD

Did you know?

श्रीयंत्र स्थापना व मुहूर्त याबद्दल माहिती द्यावी.
Category : Hindu - Puja Vidhi
RANDOM QUESTION
Don't follow traditions blindly or ignore them. Don't assume a superstition either. Don't be intentionally ignorant. Ask us!!
Hindu customs are all about Symbolism. Let us tell you the thought behind those traditions.
Make Informed Religious decisions.

Featured site

Ved - Puran
Ved and Puran in audio format.