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रांडेसारखा रडणें

बायकांप्रमाणें दैन्य, दौर्बल्य दाखविणें. ‘ वैरी युद्धास आला आणि तूं रांडेसारखा रडतोस ! ’ -भाब १५.

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अंतर्यामीं रडणें   उशापायती रडणें   कंठ मोकळा करून रडणें   कानीं कपाळीं रडणें-ओरडणें   गळा मोठा करून रडणें   जन्मतांना रडणें, वाढतां चिंता वाहणें, मरतां निराशी होणें   जन्मास घालणारास रडणें   दैवास रडणें   दिवसां हांसणें आणि रात्रीं रडणें   धड कांठयावर घालून दैवास रडणें   धड कांठयांवर घालून दैवास रडणें   बुळबुळ रडणें   बारीक रडणें   मुळमुळ-मुळमुळ रडणें   मोकळा-मोकळा कंठ करणें-करुन रडणें   रडणें   रडणें-रडत राऊत (रडतराव) घोडयावर बसविणें   शिरा ताणणें-ताणून ओरडणें-बोलणें-भांडणें रडणें-वाद करणें   हंसत्याबरोबर हसणें रडत्याबरोबर रडणें   हिमटी काढून रडणें   हिमटी-हिमटी काढून रडणें   
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कपिल II.

  • n. कर्दम को देवहूति से उत्पन्न पुत्र । यह स्वायंभुव मन्वंतर का अवतार है । कर्दम ऋषि ने संन्यस्त होने का निश्चय किया । तब देवहूति ने पूछा, ‘संसारचक्र मे मेरी रक्षा कौन करेगा?’ श्री हरि के वचन---मैं तेरे घर जन्म लूंगा’ स्मरण होने के कारण, कर्दम ने कहा, ‘श्रीहरि तुम्हारी कोख से जन्म लेंगे तथा वे तुम्हें ब्रह्मज्ञान दे कर संसारचक्र से मुक्त करेंगे । श्रीहरि की आराधना करो जिससे वे तुम्हारे उदर में आवेगे ।’ तदनुसार उसने श्रीहरि की आराधना की, जिससे कपिल उत्पन्न हुआ. कपिल का जन्म सिद्धपुर में हुआ [दे. भा.९.२१] । यह हमेशा बिंदुसर पर रहता था [भा.३.२५.५] । ये दोनों स्थान समीप रहे होंगे । कालांतर में देवहूति को इसने ब्रह्मज्ञान बताया तथा उसे संसारचक्र से मुक्त कर पाताल में जा कर रहने लगा । वहॉं खोजते सगर पुत्र वहॉं आये । यह सो रहा था ऐसा हरिवंश में दिया गया है । [ह.वं. १.१४-१५.] यही चोर है, इसी ने हमारा अश्व चुराया है यों समझ कर उन्होंने कपिल पर शस्त्रास्त्रों से प्रहार किया । तब कपिल ने क्रोधयुक्त दृष्टि से देख कर उन्हें भस्म कर दिया । इनमें से चार लोग जीवित रहे (सगर देखिये) । भागवत में दिया है कि, सब लोग भस्म हो गये [भा.९.८.१२] । व्यक्ताव्यक्त तत्त्व पर आसुरि से इसका संभाषण हुआ था । जिसमें आसुरि पृच्छक था तथा कपिल निवेदिता था । इसका शिष्य आसुरि । आसुरि का शिष्य पंचशिख [नारद.१.४५] था । पंचशिख कपिल का अवतार है यें उसे सांख्यज्ञान के प्रभाव से लोगों को प्रतीत होता था [म. शां. २११] । नारदपुराण में दो कपिल दिये गये है । उनमें से एक ब्रह्मा का [नारद. १.४५] । तथा दूसरा विष्णु का अवतार था [नारद. १.४९] । आचार्यतर्पण में पंचशिखादि के साथ इसका उल्लेख है [मत्स्य. १२.९८]; कात्या. परि. । इनमें से कौन सा सांख्यशास्त्रज्ञ तथा कौन सा वेदांती था, यह समझ में नहीं आता । कपिल नामक किसी ऋषि ने स्यूमरश्मि से संवाद किया था । उनका संवाद कपिल के वेदविषयक कथन से शुरु हुआ । इसने यज्ञ में भी गाय अवध्य है, इसी विषय पर वादविवाद किया [म.शां. २६०] । भागवत में “सांख्यशास्त्र की रचना के लिये पंचम जन्म लोगे ऐसा कहा तथा मेरे घर में जन्म लिया," इस वचन के कारण भागवत का कपिल सांख्यशास्त्रज्ञ रहा होगा तथा यह विष्णु का अवतार ही है [भा.१.३.१०, ३. २४. ६९];[ विष्णु.२.१४] । सांख्यशास्त्रज्ञ कपिल की स्मृति ने निंदा की है, तथा श्रुति में एक कपिलमाहात्म्य वर्णित है [श्वे. उ.५.२]; ब्र. स.२. १-१ शांकरभाष्य । अर्थात् यह वेदांती कपिल रहा होगा । इसके वासुदेव [म.व. १०६.२] तथा चक्रधनु [म.उ. १०७. १७] नामांतर है । वासुदेव तथा चक्रधेनु दोनों कपिल सगरपुत्रघ्न अर्थात् एक ही है । कामरुप देश में इसने कपिलेश्वर की स्थापना की [स्कंद.१.२.४५] । ब्रह्मदेव से वरदान प्राप्त कर रावण पश्चिम तट पर गया । वहॉं उसने एक तेजस्वी पुरुष देखा । रावण ने उसे युद्ध के लिये चुनौती दी । तब उस पुरुष ने रावण को एक तमाचा लगाया, जिसके कारण वह चक्कर खा कर धरती पर गिर पडा । तदनंतर वहॉं उसने एक सुंदर स्त्री देखी तथा उसकी अभिलाषा की । तब इस पुरुष ने यह जान कर उसकी ओर केवल देखा, जिससे रावण फिर धरती पर गिर पडा । रावण ने उठ कर उससे फिर पूछा, “आप कौन हैं?" तब इसने बताया कि, मेरे हाथ से शीघ्र ही तेरी मृत्यु होगी । इससे यह पता चलता है कि, यह विष्णु का अवतार रहा होगा । राम के प्रश्न का उत्तर देते समय, वसिष्ठ ने बताया कि, यह पुरुष कपिल महर्षि है [वा.रा.उ. ५ प्रक्षिप्त] । वेनवध के पश्चात् इसी के कहने पर पृथु को उत्पन्न किया गया । पृथु ने कपिल को वत्स बना कर पृथ्वी को स्थिरस्थावर बनाया [भा.४.१८-१९] । गौतमीकपिलासंगम का माहात्म्य बताते समय, यह जानकारी दी गयी है [ब्रह्म. १४१] । आगे चल कर सांख्य का तत्त्वज्ञान बताया गया है, परंतु वहा कपिल का नामोल्लेख भी नहीं है [ब्रह्म २३९]; पंचशिख देखिये । इसके रचित ग्रंथः---१. सांख्यसूत्र, २. तत्त्वसमास, ३. व्यासप्रभाकर, ४. कपिलगीता (वेदांतविषयक), ५. कपिलपंचरात्र, ६. कपिलसंहिता (उल्कलतीर्थमाहात्म्य)७. कपिलस्तोत्र, ८. कपिलस्मृति । वाग्भट ने वैद्यविषयक ग्रंथरचयिता कह कर इसका उल्लेख किया है (C.C.)| 
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