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भृगु (वारुणि)

  • n. ब्रह्मा के आठ मानस पुत्रों में से एक, जिससे आगे चल कर ब्राह्मण कुलों का निर्माण हुआ । ब्रह्मा के आठ मानस पुत्र इस प्रकार हैः 
  • जन्म n. महाभारत एवं पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा के द्वारा किये गये यज्ञ से भृगु सर्वप्रथम उत्पन्न हुआ, एवं शिव ने वरुण का रुप धारण कर इसे पुत्र रुप में धारण किया । इसलिए इसे ‘वारुणि’ उपाधि प्राप्त हुये [म.,आ.५.२१६];[ अनु.१३२.३६];[ ब्रह्मांड.३.२.३८] । कई पुराणॊं के अनुसार, ब्रह्ममानस पुत्रों में से कवि नामक एक और पुत्र का निर्देश प्राप्त है, उसे भी वरुणरुपधारी शिव ने पुत्र रुप में स्वीकार किया, जिसके कारण कवि को भी भृगु का भाई कहा जाता है । ब्राह्मण ग्रन्थों में भी इसे ‘वारुणि भृगु’ कहा गया है । किन्तु वहॉं इस प्रजापति का पुत्र कहा गया है । एवं इसकी जन्मकथा कुछ अलग ढंग से दी गयी है । इन ग्रन्थों के अनुसार, प्रजापति ने एक बार अपना वीर्य स्खलित किया, जिसके तीन भाग हो गये, एवं इन भागों से आदित्य, भृगु एवं अंगिरस् की उत्पत्ति हुयी [ऐ.ब्रा.३.३४] । पंचविंश ब्राह्मण में इसे वरुण के वीर्यस्खलन से उत्पन्न हुआ कहा गया है [पं.ब्रा.१८.९.१] । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, यह वरुण द्वारा उत्पन्न किया गया, एवं उसी के द्वारा इसे ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हुये, जिस कारण इसे ‘भृगु वारुणि’ नाम प्राप्त हुआ [श.ब्रा.११.६.१.१];[ तै.आ.९.१];[ तै.उ.१.३.१.१] । गोपथ ब्राह्मण के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति के लिए जिस समय ब्रह्म-तपस्या में लीन था, उस समय उसके शरीर से स्वेदकर्ण पृथ्वी पर गिरे । उन स्वेदकणों में अपनी परछाई देखने के कारण ही, ब्रह्मा का वीर्य स्खलन हुआ । उस वीर्य के दो भाग हुए---उनमें से जो भाग शान्त, पेय एवं स्वादिष्ट था, उससे भृगु की उत्पत्ति हुयी; एवं जो भाग खारा, अपेय एवं अस्वादिष्ट था, उससे अंगिरस् ऋषि की उत्पत्ति हुयी । जन्म लेते ही इसने अपने मुँह से जो नाद निसृत किया, उसी कारण इसका नाम ‘अथर्वन्’ हुआ । आगे चल कर अथर्वन् एवं अंगिरस् से दस दस, मिल कर बीस ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्हे ‘अथर्वन् आंगिरस’ नाम प्राप्त हुआ । 
  • वेदोत्पत्ति n. अथर्वन् ऋषि के द्वारा ब्रह्मा को जो वेदमंत्र दृष्टिगत हुए, उन्हीं के द्वारा ‘अथर्ववेद’ की रचना हुयी, एवं अंगिरस ऋषि के द्वारा दृष्टिगत हुए मंत्रो से ‘आंगिरसवेद’ का निर्माण हुआ । ब्रह्मा के द्वारा पुष्कर क्षेत्र में किये गये यज्ञ में यह ‘होता’ था, एवं देवों के द्वारा तुंगक आरण्य में किये गये यज्ञ में यह आचार्य था । इन्हीं दोनों यज्ञों के समय, इसने ‘भीष्मपंचकव्रत’ क्रिया था [पद्म. सृ.३४];[ स्व.३९]; उ.१२४ । इसे संजीवनी विद्या अवगत थी, जिसके बल से इसने जमदग्नि को पुनः जीवित किया था [ब्रह्मांड.१.३०] 
  • नहुष को शाप n. नहुष के अविवेकी व्यवहारों से देवतागण एवं सारी प्रजा त्रस्त थी । उसे देख कर अगस्त्य ऋषि भृगु ऋषि से मंत्रणा लेने के लिए आया । इसने उसे राय दी कि, तुम सभी सप्तऋषि नहुष के रथ के वाहन बनो । इस प्रकार सभी सप्तऋषियों ने नहुष के रथ को खींचा । रथ धीमा चल रहा था, अतएव नहुष ने क्रोध में आकर तेज चलन के लिए ‘सर्प-सर्प’ कहा, तथा लात अगस्त्य को मारी । इस समय अगस्त्य की जटाओं में भृगु विराजमान था, अतएव लात इसे लगी, तथा इसने नहुष को सर्प (नाग) बन जाने के लिए शाप दिया, तथा उसे इन्द्रपद से च्युत किया [म.अनु.९९]; नहुष देखिये । एक बार हिमालय तथा विंध्य पर्वतों में अकाल पडा । उस समय यह हिमालय पर गया । वहॉं पर इसने एक विद्याधर दम्पति को देखा, जिसमें पति का मुख किसी शाप के कारण व्याघ्र का था । उस दम्पति के द्वारा प्रार्थना किये जाने पर, इसने उस पुरुष को पौष शुद्ध एकादशी का व्रत करने के लिए कहा, जिसके द्वारा वह शाप से मुक्त हो सका [पद्म.उ.१२५] 
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